गुरु ग्रंथ साहिब 406 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1अपने तुच्छ कीड़े पर दया करो, केवल यही मेरा मनोरथ एवं प्रयोजन है॥ २॥
2हे मेरे प्रभु ! तू मेरा मालिक है और मेरा तन एवं धन सब तेरे ही दिए हुए हैं। मेरे वश में कुछ भी नहीं है।
3जैसे तुम रखते हो, वैसे ही मैं रहता हूँ। मैं वही खाता हूँ जो तुम मुझे देते हो॥ ३॥
4हरि के भक्तजनों की चरण-धूलि में किया हुआ स्नान जन्म-जन्मांतर के पाप काट देता है।
5प्रभु की प्रेम-भक्ति के कारण दुविधा एवं भय नष्ट हो जाते हैं। हे नानक ! ईश्वर सदैव जीव के साथ ही रहता है॥ ४॥ ४॥ १३६॥
6आसा महला ५ ॥
7हे परमपिता, तेरे दर्शन अगम्य और अगोचर हैं। इसलिए तेरे दर्शन वही करता है जिसके मस्तक पर भाग्य उदय हुआ हो।
8कृपालु प्रभु ने स्वयं मुझ पर कृपा की है, इसलिए सतिगुरु ने मुझे हरि का नाम प्रदान किया है॥ १॥
9गुरुदेव ने कलियुग का भी उद्धार कर दिया है।
10हे प्रभु ! मूर्ख एवं बेवकूफ जो मल-मूत्र की भाँति दूषित थे, सब तेरी सेवा में जुट गए हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
11तू जगत का रचयिता है, सारी सृष्टि को स्थापित करने वाला है और तू सब में समा रहा है।
12समूचा जगत तेरी चरण-सेवा में लगा हुआ है और यह देख कर धर्मराज आश्चर्यचकित हो गया है॥ २॥
13सतियुग, त्रैता एवं द्वापर को भला युग कहा जाता है परन्तु कलियुग सब युगों से उत्तम है।
14क्योंकि इस युग में मनुष्य इस हाथ से जैसा कर्म करता है, उसे वैसे ही उस हाथ से फल मिलता है। कोई भी निर्दोष व्यक्ति दूसरे दोषी इन्सान के पापों के परिणामस्वरूप नहीं पकड़ा जाता॥ ३॥
15हे पूजनीय हरि ! तुम वही करते हो जो तेरे भक्त तुझसे मॉगते हैं। यही तेरा विरद् है।
16हे हरि ! नानक भी हाथ जोड़कर तुझसे एक यही दान माँगता है कि मुझे अपने संतों के दर्शन प्रदान करो॥४॥५॥१४०॥
17रागु आसा महला ५ घरु १३
18ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
19हे सतगुरु ! तेरे वचनों ने
20निर्गुण जीव भी भवसागर से पार कर दिए हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
21तेरी संगति में महा क्रूर, दुष्ट एवं अपवादी भी पवित्र-पावन बन गए हैं। १ ॥
22जो मनुष्य योनियों में भटकते थे और नरक में डाले जाते थे, उनके वंश का भी तूने उद्धार कर दिया है।॥ २॥
23जिन्हें कोई नहीं जानता था और जिनका कोई सम्मान नहीं करता था, वह हरि के द्वार पर लोकप्रिय हो गए हैं।॥ ३॥
24नानक का कथन है कि हे मेरे सतगुरु ! मैं कौन-सी उपमा एवं कौन-सी बड़ाई तुझ पर अर्पित करूँ, मैं क्षण-क्षण तुझ पर न्यौछावर होता हूँ॥ ४॥ १ ॥ १४१॥.
25आसा महला ५ ॥
26बावले मनुष्य माया मोह की निद्रा में सो रहे हैं।॥ १॥ रहाउ॥
27वे कुटुंब के मोह एवं विषय-विकारों के रसों में मस्त हुए हैं और झूठी उपलब्धियों प्राप्त करते हैं। १॥
28मिथ्या मनोरथ एवं स्वप्न के आनन्दों एवं उल्लासों को मनमुख मनुष्य सत्य कहते हैं। २॥
29अमृत रूपी हरि-नाम ही सदैव साथ देने वाला पदार्थ है। लेकिन मनमुख मनुष्य हरि-नाम का भेद तिलमात्र भी नहीं समझते॥ ३॥
30हे नानक ! परमात्मा ने अपनी कृपा करके जिन लोगों को सत्संगति में रखा हुआ है, वही उसकी शरण में आए हैं।॥ ४ ॥ २॥ १४२ ॥
31आसा महला ५ तिपदे ॥
32मुझे तो उस प्रिय-प्रभु का ही प्रेम चाहिए॥ १॥ रहाउ॥
33सोना, माणिक्य, गज मोती एवं लाल नहीं, नहीं मुझे नहीं चाहिए॥ १॥
34न राज्य, न धन-दौलत, न प्रभुसत्ता और न ही स्वाद
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं