गुरु ग्रंथ साहिब 404 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1हे मेरे सज्जनो ! मित्रो एवं संतजनो ! हरि-परमेश्वर के नाम के बिना सब कुछ नश्वर है।
2जिस व्यक्ति ने भी साधु की संगति में मिलकर भगवान का गुणगान किया है उसने यह अमूल्य मानव जन्म जीत लिया है॥ १॥ रहाउ॥
3त्रिगुणात्मक माया ब्रह्म ने उत्पादित की है बताओ, हे भाई ! किस युक्ति से इससे पार हुआ जा सकता है ?
4इसमें विषय-विकारों के अनेक भैवर पड़ गए हैं। यह माया अथाह एवं विषम है। गुरु के शब्द द्वारा ही इससे पार हुआ जा सकता है॥ २॥
5हे नानक ! जिसने निरन्तर खोज, तलाश एवं चिन्तन करने से यह यथार्थ जान लिया है
6कि प्रभु का नाम तमाम गुणों का भण्डार है, जिसके तुल्य मोल का कोई पदार्थ नहीं, उसे सुमिरन करने से मन मोती जैसा हो जाता है और नाम-स्मरण में लीन हो जाता है। ३॥ १॥ १३० ॥
7आसा महला ५ दुपदे ॥
8गुरु की कृपा से प्रभु मेरे मन में बस गया है और जो कुछ मैं माँगता हूँ वही मुझे मिल जाता है।
9नाम के रंग से यह मन तृप्त हो गया है और दोबारा कहीं ओर नहीं जाता॥ १॥
10हमारा ठाकुर सबसे ऊँचा है। इसलिए मैं रात-दिन उसका ही गुणगान करता रहता हूँ।
11मेरा प्रभु क्षण भर में उत्पन्न करके नाश करने की शक्ति रखने वाला है। मैं तुझे उसके भय में रखना चाहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
12जब मैं अपने प्रभु स्वामी को देख लेता हूँ तो किसी दूसरे को अपने हृदय में नहीं बसाता।
13दास नानक को प्रभु ने स्वयं ही प्रतिष्ठा की पोशाक पहनाई है। मैं अपना भ्रम एवं भय को मिटा कर प्रभु की महिमा लिख रहा हूँ॥ २॥ २॥ १३१॥
14आसा महला ५ ॥
15हे बन्धु ! चार वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र हैं परन्तु कामादिक विकार-काम, क्रोध, मोह लोभ एवं अभिमान इन चार वर्णो के लोगों का मर्दन करने वाले हैं। षट्दर्शन वाले साधुओं को भी हथेली पर नचाते हैं।
16सुन्दर, बांके, मनोहर एवं बुद्धिमान सब को कामादिक पाँचों विकारों ने मोहित करके छल लिया है॥ १ ॥
17ऐसा महाबली कौन है ? जिसने पाँचों कामादिक शूरवीरों को मार लिया है।
18वही मनुष्य इस कलियुग में पूर्ण है, जिसने पाँचों विकारों को मारकर टुकड़े-टुकड़े करके अपना जीवन बिताया है॥ १॥ रहाउ ॥
19कामादिक पाँचों विकारों का बड़ा शक्तिमान वंश है, ये न किसी के वश में आते हैं और न किसी से भयभीत होकर भागते हैं। इनकी सेना बड़ी सशक्त एवं दृढ़ इरादे वाली हठी है।
20हे नानक ! उस मनुष्य ने ही इन्हें प्रताड़ित करके कुचल दिया है, जिसने साधु की संगति में शरण ली है।॥ २॥ ३॥ १३२॥
21आसा महला ५ ॥
22हरि की उत्तम कथा ही जीव के लिए सर्वोत्तम है, दूसरे तमाम स्वाद नीरस हैं ॥ १ ॥ रहाउ॥
23अनेक गुणी, ज्ञानी, राग विद्या वाले लोग मुनिजन एवं षट्दर्शन के ज्ञाता हरि कथा के सिवाय अन्य पदार्थों को जीव के लिए लाभदायक नहीं समझते ॥ १॥
24हरि की यह कथा विषय-विकारों का नाश करने वाली, निराली, अनूप एवं सुखदायक है। हे नानक ! हरि कथा रूपी अमृत-धारा सत्संगति में ही पान की जा सकती है॥ २॥ ४॥ १३३॥
25आसा महला ५ ॥
26गुरुवाणी मुझे बहुत मीठी लगती है। यह अमृत की धारा है। गुरु ने एक निमिष मात्र भी अमृत-धारा का बहना मेरे मन से दूर नहीं किया ॥ १॥ रहाउ॥
27इस वाणी द्वारा भगवान के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं, प्रभु चरणों का स्पर्श मिल जाता है, मुरझाया हुआ मन खिल जाता है और मन में आनंद पैदा हो जाता है। यह वाणी करतार प्रभु के प्रेम से रंगी हुई है॥ १॥
28इस वाणी का एकक्षण भर भी पाठ करने से मनुष्य गुरु के चरणों तक पहुँच जाता है। हरदम इसका जाप करने से जीव यमदूत के जाल में नहीं फँसता। हरि ने नानक के कण्ठ एवं हृदय में गुरुवाणी का हार पहनाया है॥ २॥ ५ ॥ १३४॥
29आसा महला ५ ॥
30मनुष्य हेतु साधु की संगत अति शुभ है॥ रहाउ ॥
31वहाँ आठ प्रहर, हर पल एवं घड़ी गोविन्द का ही गुणगान होता रहता है और गोविन्द की गुणस्तुति की बातें होती रहती हैं॥१॥
32उठते-बैठते एवं सोते समय वहाँ हरि का यशोगान होता है और उनके मन-तन में भगवान आ बसता है॥ २॥
33नानक का कथन है कि हे ठाकुर जी ! मैं गुणविहीन हूँ पर तू मेरा गुणसम्पन्न स्वामी है और मैंने तेरी शरण लेनी ही उपयुक्त समझी है॥ ३ ॥ ६ ॥ १३५ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं