गुरु ग्रंथ साहिब 402 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1पुत्र, पत्नी, गृह एवं घर की सारी सामग्री इन सबका मोह झूठा है॥ १॥
2हे मन ! तू क्यों खिलखिला कर मुस्कराता हुआ आहा ! आहा! करता है?
3अपने नेत्रों से देख कि यह वस्तुएँ तो राजा हरिचंद की नगर की भाँति हैं इसलिए एक राम के भजन का लाभ प्राप्त कर ले॥ १॥ रहाउ ॥
4हे मन ! जैसे शरीर पर पहने हुए वस्त्र दो-चार दिनों में पुराने हो जाते हैं, वैसे ही यह शरीर है।
5दीवार पर कहाँ तक भागा जा सकता है ? अन्तत: उसका अन्तिम छोर आ ही जाता है॥ २॥
6हे मन ! जैसे कुण्ड में रखे हुए जल में गिर कर नमक गल जाता है, वैसे ही यह शरीर है।
7जब परब्रहा की आज्ञा आती है तो एक क्षण एवं पल में ही प्राणी दुनिया छोड़ कर चला जाता है॥ ३॥
8हे मन ! तुम अपनी गिनी-चुनी सांसों के भीतर ही संसार में चलते-फिरते हो और भगवान के लिखे लेख अनुसार ही तुम सांस लेते हो।
9हे नानक ! सदैव ही भगवान की कीर्ति करो। जिन्होंने सच्चे गुरु की शरण ली है, वे भवसागर में डूबने से बच गए हैं।॥ ४॥ १॥ १२३॥
10आसा महला ५ ॥
11अपुष्ट बात सीधी हो गई है और कट्टर कामादिक शत्रु भी सज्जन बन गए हैं।
12मेरे मन के अज्ञानता रूपी अन्धकार में ज्ञान रूपी रत्न आलोकित हो गया है और मलिन बुद्धि भी अब निर्मल हो गई है॥ १ ॥
13जब जगतपालक गोबिन्द कृपालु हो गया तो
14सतिगुरु से मिलकर मुझे सुख, सम्पति एवं हरि-नाम का फल प्राप्त हो गए॥ १॥ रहाउ॥
15मुझ कृपण को कोई नहीं जानता था लेकिन अब मैं तमाम लोकों में लोकप्रिय हो गया हूँ।
16पहले कोई भी मुझे अपने पास बैठने नहीं देता था परन्तु अब सारा संसार मेरे चरणों की सेवा करता है॥ २॥
17पहले मैं आधे-आधे पैसे की खोज में भटकता रहता था परन्तु अब मेरे मन की तृष्णा बुझ गई है।
18पहले मैं किंसी का एक कटु बचन भी सहन नहीं कर पाता था, पर अब सत्संगति के प्रभाव से सहनशील हो गया हूँ॥ ३॥
19प्रभु के कौन-कौन से गुण एक जिव्हा से व्यक्त करूँ? क्योंकि वह तो अगम्य एवं अपरंपार है।
20नानक एक-यही प्रार्थना करता है कि हे हरि ! मैं तेरी शरण में आया हूँ, इसलिए मुझे अपने दासों का दास बना दे ॥ ४ ॥ २ ॥ १२४ ॥
21आसा महला ५ ॥
22हे मूर्ख ! अपने लाभ के लिए तू बहुत ही आलसी है परन्तु अपने नुक्सान हेतु तू शीघ्र ही भाग कर जाता है।
23हे पापी ! तुम प्रभु नाम रूपी सस्ता सौदा नहीं लेते और विकारों के ऋण से बैंधे हुए हो।॥ १॥
24हे मेरे सतिगुरु ! मुझे तेरी ही आशा है।
25हे परब्रह्म ! तेरा नाम पतितों को पावन करने वाला है। केवल यही मेरी ओट है॥ १॥ रहाउ ॥
26हे मूर्ख ! अश्लील गीत सुनकर तुम मस्त हो जाते हो परन्तुं प्रभु का नाम-स्मरण करने में तुम आलस्य करते हो।
27किसी की निन्दा की कल्पना से तुम बहुत प्रसन्न होते हो परन्तु तेरी यह बुद्धि विपरीत है॥ २॥
28हे मूर्ख ! तुम पराया धन, पराया तन, पराई स्त्री एवं परनिन्दा में उलझे हो एवं पागल हो गए हो इसलिए अभक्ष्य का भक्षण करते हो।
29हे मूर्ख ! सच्चे धर्म के साथ तुम्हारी कोई रुचि नहीं और सत्य को सुनकर तुम क्रुद्ध हो जाते हो ॥ ३॥
30हे दीनदयालु ! हे कृपालु प्रभु-ठाकुर ! तेरे भक्तों को तेरे हरि नाम का ही सहारा है।
31हे प्रभु ! नानक ने बड़े चाव से तेरी शरण ली है, उसे अपना बनाकर उसकी लाज रख लो॥ ४॥ ३ ॥ १२५ ॥
32आसा महला ५ ॥
33मनुष्य नश्वर पदार्थों तथा कुसंगति में लिपटा हुआ है। वह माया के मोह में फँसा रहता है।
34जहाँ उसने जाना है, उसे वह स्मरण ही नहीं करता। वह अपनी अहंबुद्धि के कारण अन्धा बना रहता है॥ १॥
35हे मेरे वैरागी मन ! तू प्रभु का सिमरन क्यों नहीं करता ?
36तू काया रूपी कच्ची कोठरी में रहता है। तेरे साथ तमाम पापों के रोग लिपटे हुए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
37मेरा-मेरा करते-करते दिन-रात बीत जाते हैं। प्रत्येक पल एवं क्षण तेरी उम्र बीतती जा रही है ।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं