सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 401 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1जिन से मिलकर मेरा सच्चा प्रभु मुझे मिल गया है। १॥ रहाउ॥

2जिसे प्रभु याद नहीं आता उसे ही शुभ-अशुभ शगुन प्रभावित करते हैं।

3जो मनुष्य हरि-प्रभु को भला लगता है, यमदूत उसके निकट नहीं आता ॥ २॥

4दान-पुण्य, जप-तप इत्यादि जितने भी शुभ कर्म हैं, ईश्वर का नाम इनसे सर्वश्रेष्ठ कर्म है।

5जो प्राणी अपनी रसना से परमेश्वर के नाम का जाप करता है उसके तमाम कार्य पूर्ण हो जाते हैं।॥ ३॥

6उसका भय विनष्ट हो गया है, उसकी दुविधा एवं मोह भी भाग गए हैं और प्रभु के बिना वह किसी दूसरे को नहीं देखता।

7हे नानक ! यदि परब्रह्म स्वं रक्षा करे तो फिर मनुष्य को कोई दुःख नहीं सताता ॥४॥१८॥१२०॥

8आसा घरु ९ महला ५

9ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

10मैं अपने चित्त में प्रभु का सिमरन करता रहता हूँ और उसका सिमरन करके सर्व सुख पाता हूँ। मैं नहीं जानता कि आगे मैं उसको अच्छा लगूंगा अथवा नहीं।

11सब जीवों का दाता एक प्रभु ही है और शेष सभी उसके याचक हैं। प्रभु के अलावा मैं किसके पास माँगने के लिए जाऊँ॥ १॥

12प्रभु के अतिरिक्त किसी दूसरे से माँगने पर मुझे लज्जा आती है।

13एक परमात्मा ही सृष्टि का छत्रपति राजा है, किसी दूसरे को उसके बराबर का सोच नहीं सकता॥ १॥ रहाउ ॥

14उठते-बैठते मैं उसके बिना रह भी नहीं सकता, उसके दर्शनों हेतु मैं बार-बार खोज करता हूँ।

15ब्रह्मा जैसे बड़े-बड़े देवते, सनक, सनंदन, सनातन एवं सनतकुमार जैसे ऋषि (जो ब्रह्मा के पुत्र कहलाए) प्रभु का महल तो उनके लिए भी दुर्लभ रहा ॥ २ ॥

16प्रभु अगम्य, अनन्त एवं अगाध बोध वाला है। उसकी उपमा का मूल्यांकन नहीं हो सकता।

17मैंने उस सद्पुरुष की शरण ली है और उस महापुरुष सतगुरु को ही स्मरण करता हूँ॥ ३॥

18मेरा ठाकुर-प्रभु मुझ पर कृपालु एवं दयालु हो गया है, उसने मेरे गले से मोह-माया की फाँसी काट दी है।

19हे नानक ! अब जब मुझे साधु की संगति मिल गई है तो मैं फिर से जन्म नहीं लूंगा ॥ ४॥ १॥ १२१॥

20आसा महला ५ ॥

21मैं अपने हृदय-घर में प्रभु का गुणानुवाद करता रहता हूँ और हृदय-घर से बाहर भी उसका ही यशोगान करता हूँ। सोते-जागते भी मैं उसका ही गुणगान करता हूँ।

22मैं गोविन्द के नाम का व्यापारी हूँ। मेरे साथ चलने हेतु उसने मुझे अपने नाम का यात्रा-खर्च दिया है॥ १॥

23भगवान के अलावा दूसरी तमाम वस्तुएँ मैंने भुला दी हैं।

24पूर्ण गुरु ने मुझे प्रभु-नाम का दान दिया है और यह नाम ही मेरा जीवन का आधार है॥ १॥ रहाउ॥

25दुःख में भी मैं प्रभु का गुणगान करता हूँ, सुख में भी मैं उसका ही यशोगान करता हूँ और मार्ग पर चलते हुए यात्रा में भी मैं उसको ही याद करता हूँ।

26गुरु ने मेरे मन में नाम को बसा दिया है और मेरी प्यास बुझा दी है॥ २॥

27मैं दिन में भी प्रभु की गुणस्तुति करता हूँ और रात को भी उसका ही गुणानुवाद करता हूँ और अपनी रसना से मैं उसको श्वास-श्वास से याद करता हूँ।

28सत्संगति में रहने से यह विश्वास कायम हो जाता है कि प्रभु जीवन एवं मृत्यु में भी हमारे साथ रहता है॥ ३॥

29हे प्रभु ! अपने दास नानक को यह दान दीजिए कि वह संतों की चरण-धूलि प्राप्त करके तेरी स्मृति को अपने मन में बसाकर रखे।

30मैं अपने कानों से तेरी ही कथा सुनु अपने नयनों से तेरे ही दर्शन करूँ और अपना माथा गुरु के चरणों पर रखूं ॥ ४॥२॥ १२२॥

31ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

32आसा घरु १० महला ५ ॥

33हे मानव ! यह शरीर जिसे तू शाश्वत मानता है, वह तो केवल दो दिनों का अतिथि है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं