सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 400 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1गुरु की सेवा करने से (प्रभु-चरणों में) निवास मिल जाता है और इस विषम जगत-समुद्र से पार हुआ जाता है॥ २॥

2हे भगवान् ! तेरी दया-दृष्टि से आत्मिक सुख उपलब्ध होता है और नाम का भण्डार हृदय में बस जाता है।

3जिस पर तू कृपालु हो जाता है वह सेवक स्वीकार हो जाता है।॥ ३॥

4हरि का कीर्तन अमृत रस है, पर कोई विरला ही इस रस को पीता है।

5हे नानक ! यदि मुझ गोविन्द के चाकर को वैतन के रूप में उसका एक नाम मिल जाए तो मैं अपने हृदय में नाम जप-जप कर जीवन जीता रहूँ॥ ४॥ १४॥ ११६॥

6आसा महला ५ ॥

7हे सखियो ! मैं जिस परमात्मा की सेविका हूँ वह सबसे ऊँचा है।

8मेरे पास जो कुछ भी थोड़ा बहुत है, उसका दिया हुआ ही कहलाता है॥१॥

9हे सखियो ! यह शरीर, प्राण एवं धन इत्यादि मालिक प्रभु की दी हुई देन मानती हूँ।

10जिसके नाम से मैं उज्ज्वल हुई हूँ, मैं खुद को उसकी सेविका ही गिनती हूँ॥ १॥ रहाउ ॥

11हे स्वामी ! तू बेपरवाह एवं आनंदमय है। तेरा नाम मेरे लिए माणिक एवं हीरा है।

12जिस जीव-स्त्री का तू मालिक है, वह हमेशा संतुष्ट रहती है और सदा सुख मानती है॥२॥

13हे मेरी संगी सखी-सहेलियो ! मैं आपको एक सुमति समझाती हूँ।

14आप श्रद्धा से साधुओं की सेवा करो व नाम रूपी निधि हरि को पा लो॥ ३॥

15सब जीव-स्त्रियों ठाकुर जी की दासियाँ हैं और सब उसे मेरा मालिक कहती हैं।

16हे नानक ! परमेश्वर जिस जीवात्मा का जीवन सुन्दर बना देता है, उनका बसेरा सदैव सुखद है॥ ४॥ १५ ॥ ११७॥

17आसा महला ५ ॥

18हे सुन्दर आत्मा ! तू यह आचरण सीख ले कि तू संतजनों की दासी बनी रहे।

19समस्त गुणों में सर्वोत्तम गुण यही है कि तू अपने प्राणनाथ को कहीं दूर मत देख॥ १॥

20हे सुन्दरी ! तू अपने इस सुन्दर मन को मजीठ जैसे पक्के हरि-नाम के रंग से रंग ले।

21अपने अन्तर्मन से बुद्धिमता एवं चतुराई को छोड़कर जगत पालक प्रभु को अपने साथ समझ ॥ १॥ रहाउ॥

22हे आत्मा ! प्राणनाथ प्रभु जो हुक्म करता है, उसे मानना चाहिए। इसे ही अपना श्रृंगार बना।

23प्रभु के अतिरिक्त दूसरा प्रेम भूल जा। तू यह पान खाया कर॥ २॥

24हे आत्मा ! गुरु के शब्द को अपना दीपक बना। इस सत्य की सेज बिछा।

25जो जीव-स्त्री हाथ जोड़कर आठ पहर उसके सम्मुख खड़ी रहती है, उसे जगत का बादशाह हरि मिल जाता है।॥ ३॥

26केवल उसके पास ही शुभ-आचरण एवं सभी श्रृंगार हैं और वही अपार रूपवान है।

27हे नानक ! वही जीवात्मा सुहागिन है, जो करतार को प्यारी लगती है॥ ४॥ १६ ॥ ११८ ॥

28आसा महला ५ ॥

29जब तक मेरे मन में भ्रम बने रहे, तब तक विकारों में गिरता और मोह में फंसकर डावांडोल होता रहा।

30जब गुरु ने मेरे भ्रम निवृत्त कर दिए तो मुझे सुख उपलब्ध हो गया ॥ १॥

31वे विवादास्पद कामादिक वैरी, सभी गुरु की कृपा से मुझ से दूर हो गए हैं।

32मैंने अब उनसे मुक्ति प्राप्त कर ली है, वे सब हमारा पीछा छोड़ गए हैं।॥ १॥ रहाउ॥

33जब तक मैं भेदभाव की वृति को अपनाता रहा तो विकारों के बन्धन में फॅसता रहा।

34लेकिन जब गुरु ने अज्ञानता मिटा दी तो मोहिनी के बन्धनों से मुक्ति हो गई॥ २॥

35जब तक मैं प्रभु के हुक्म को नहीं समझता था, तब तक मैं बहुत दुखी होता रहा।

36जब से गुरु को मिलकर मैंने उसके हुक्म को पहचान लिया है, तब से मैं सुखी हूँ॥ ३॥

37मेरा कोई दुश्मन अथवा बुरा चाहने वाला नहीं, न ही कोई बुरा है।

38हे नानक ! जो सेवक गुरु की श्रद्धा से सेवा करता है, वह प्रभु का बन्दा है॥ ४॥ १७ ॥ ११६॥

39आसा महला ५ ॥

40मैं हरि का भजन-कीर्तन गाता रहता हूँ, जिससे मेरे मन में सहज सुख एवं आनंद बना रहता है।

41गुरु ने अपना नाम देकर नौ ग्रहों के संकट को दूर कर दिया है॥ १॥

42मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ, सदैव उस पर कुर्बान हूँ।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं