गुरु ग्रंथ साहिब 3 · Jap · Guru Nanak Dev Ji
1परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व दुष्कर्मो का नाश होता हैII ९ II
2नाम सुनने से मनुष्य को सत्य, संतोष व ज्ञान जैसे मूल धमों की प्राप्ति होती है।
3नाम को सुनने मात्र से समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ अठसठ तीथों के स्नान का फल प्राप्त हो जाता है।
4निरंकार के नाम को सुनने के बाद बार-बार रसना पर लाने वाले मनुष्य को उसके दरबार में सम्मान प्राप्त होता है।
5नाम सुनने से परमात्मा में लीनता सरलता से हो जाती है, क्योंकि इससे आत्मिक शुद्धि होकर ज्ञान प्राप्त होता है।
6हे नानक ! प्रभु के भक्तों को सदैव आत्मिक आनंद का प्रकाश रहता है।
7परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व दुष्कर्मो का नाश होता है॥ १०॥
8नाम सुनने से गुणों के सागर श्री हरि में लीन हुआ जा सकता है।
9नाम-श्रवण के प्रभाव से ही शेख, पीर और बादशाह अपने पद पर शोभायमान हैं।
10अज्ञानी मनुष्य प्रभु-भक्ति का मार्ग नाम-श्रवण करने से ही प्राप्त कर सकते हैं।
11इस भव-सागर की अथाह गहराई को जान पाना भी नाम-श्रवण की शक्ति से सम्भव हो सकता है।
12हे नानक ! सद्-पुरुषों के अंतर में सदैव आनंद का प्रकाश रहता है।
13परमात्मा का नाम सुनने से समस्त दुखों व दुष्कर्मो का नाश होता है।॥ ११॥
14उस अकाल पुरुष का नाम सुनने के पश्चात उसे मानने वाले अर्थात् उसे अपने हृदय में बसाने वाले मनुष्य की अवस्था कथन नहीं की जा सकती।
15जो भी उसकी अवस्था का बखान करता है तो उसे अंत में पछताना पड़ता है क्योंकि यह सच कर लेना सरल नहीं है, ऐसी कोई रसना नहीं जो नाम से प्राप्त होने वाले आनन्द का रहस्योद्घाटन कर सके।
16ऐसी अवस्था को यदि लिखा भी जाए तो इसके लिए न कागज़ है, न कलम और न ही लिखने वाला कोई जिज्ञासु,
17जो वाहिगुरु में लिवलीन होने वाले का विचार कर सकें।
18परमात्मा का नाम सर्वश्रेष्ठ व मायातीत है।
19यदि कोई उसे अपने हृदय में बसा कर उसका चिन्तन करेII १२ ॥
20परमात्मा का नाम सुनकर उसका चिन्तन करने से मन और बुद्धि में उत्तम प्रीति पैदा हो जाती है।
21चिन्तन करने से सम्पूर्ण सृष्टि का ज्ञान-बोध होता है।
22चिन्तन करने वाला मनुष्य कभी सांसारिक कष्टों अथवा परलोक में यमों के दण्ड का भोगी नहीं होता।
23चिन्तनशील मनुष्य अंतकाल में यमों के साथ नरकों में नहीं जाता, बल्कि देवगणों के साथ स्वर्ग-लोक को जाता है।
24परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है।
25यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे॥ १३॥
26निरंकार के नाम का चिन्तन करने वाले मानव जीव के मार्ग में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं आती।
27चिन्तनशील मनुष्य संसार में शोभा का पात्र होता है।
28ऐसा व्यक्ति दुविधापूर्ण मार्ग अथवा साम्प्रदायिकता को छोड़ धर्म-पथ पर चलता है।
29चिन्तनशील का धर्म-कार्यों से सुदृढ़ सम्बन्ध होता है।
30परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है।
31यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करेII १४ II
32प्रभु के नाम का चिन्तन करने वाले मनुष्य मोक्ष द्वार को प्राप्त कर लेते हैं।
33चिन्तन करने वाले अपने समस्त परिजनों को भी उस नाम का आश्रय देते हैं।
34चिन्तनशील गुरसिख स्वयं तो इस भव-सागर को पार करता ही है तथा अन्य संगियों को भी पार करवा देता है।
35चिन्तन करने वाला मानव जीव, हे नानक ! दर-दर का भिखारी नहीं बनता।
36परमात्मा का नाम बहुत ही श्रेष्ठ एवं मायातीत है।
37यदि कोई उसे अपने हृदय में लीन करके उसका चिन्तन करे II १५II
38जिन्होंने प्रभु-नाम का चिन्तन किया है वे श्रेष्ठ संतजन निरंकार के द्वार पर स्वीकृत होते हैं, वे ही वहाँ पर प्रभुख होते हैं।
39ऐसे गुरुमुख प्यारे अकाल पुरुष की सभा में सम्मान पाते हैं।
40ऐसे सद्-पुरुष राज दरबार में शोभावान होते हैं।
41सद्गुणी मानव का ध्यान उस एक सतगुरु (निरंकार) में ही दृढ़ रहता है।
42यदि कोई व्यक्ति उस सृजनहार के बारे में कहना चाहे अथवा उसकी रचना का लेखा करे
43तो उस रचयिता की कुदरत का आकलन नहीं किया जा सकता।
44निरंकार द्वारा रची गई सृष्टि धर्म रूपी वृषभ (धौला बैल) ने अपने ऊपर टिका कर रखी हुई है जो कि दया का पुत्र है (क्योंकि मन में दया-भाव होगा तभी धर्म-कार्य इस मानव जीव से सम्भव होगा।)
45जिसे संतोष रूपी सूत्र के साथ बांधा हुआ है।
46यदि कोई परमात्मा के इस रहस्य को जान ले तो वह सत्यनिष्ठ हो सकता है।
47यदि कोई ईश्वर के इस कौतुक को नहीं मानता तो उसके मन में यही शंका उत्पन्न होगी कि उस शरीर धारी बैल पर इस धरती का कितना बोझ है, वह कितना बोझ उठाने की समर्था रखता है।
48क्योंकि इस धरती पर सृजनहार ने जो रचना की है वह परे से परे है, अनन्त है।
49फिर उस बैल का बोझ किस शक्ति पर आश्रित है।
50सृजनहार की इस रचना में अनेक जातियों, रंगों तथा अलग-अलग नाम से जाने जाने वाले लोग मौजूद हैं।
51जिनके मस्तिष्क पर परमात्मा की आज्ञा में चलने वाली कलम से कर्मो का लेखा लिखा गया है।
52किन्तु यदि कोई जन-साधारण इस कर्म-लेख को लिखने की बात कहे तो
53वह यह भी नहीं जान पाएगा कि यह लिखा जाने वाला लेखा कितना होगा।
54लिखने वाले उस परमात्मा में कितनी शक्ति होगी, उसका रूप कितना सुन्दर है।
55उसकी कितनी दात है, ऐसा कौन है जो उसका सम्पूर्ण अनुमान लगा सकता है।
56अकाल पुरुष के मात्र एक शब्द से समस्त सृष्टि का प्रसार हुआ है।
57उस एक शब्द रूपी आदेश से ही सृष्टि में एक से अनेक जीव-जन्तु, तथा अन्य पदार्थों के प्रवाह चल पड़े हैं।
58इसलिए मुझ में इतनी बुद्धि कहाँ कि मैं उस अकथनीय प्रभु की समर्था का विचार कर सकूं।
59हे अनन्त स्वरूप ! मैं तुझ पर एक बार भी कुर्बान होने के लायक नहीं हूँ।
60जो तुझे भला लगता है वही कार्य श्रेष्ठ है।
61हे निरंकार ! हे पारब्रह्म ! तू सदा शाश्वत रूप हैं ॥ १६॥
62इस सृष्टि में असंख्य लोग उस सृजनहार का जाप करते हैं, असंख्य ही उसको प्रीत करने वाले हैं।
63असंख्य उसकी अर्चना करते हैं, असंख्य तपी तपस्या कर रहे है।
64असंख्य लोग धार्मिक ग्रंथों व वेदों आदि का मुंह द्वारा पाठ कर रहे हैं।
65असंख्य ही योग-साधना में लीन रह कर मन को आसक्तियों से मुक्त रखते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं