गुरु ग्रंथ साहिब 39 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1प्रभु-भक्तों की धर्मराज स्वयं उनकी लगन से सेवा करता है, वे प्राणी धन्य हैं और उनका सृजनहार प्रभु धन्य-धन्य है॥ २॥
2जिन प्राणियों ने मन के विकार मन से त्याग दिए हैं, वे मोह-अभिमान इत्यादि से मुक्त होकर निर्मल हो जाते हैं।
3वे प्राणी आत्मा में ही परमात्मा को पहचान लेते हैं और सहज ही हरि नाम में लीन हो जाते हैं।
4किन्तु सतिगुरु के बिना प्राणी को मोक्ष प्राप्त नहीं होता, वह मनमुखी प्राणी दीवानों की तरह दर-दर भटकता रहता है।
5वह प्राणी उस प्रभु के शब्द का चिंतन नहीं करता अपितु व्यर्थ ही वाद-विवाद करता रहता है और पापों में ग्रस्त होने के कारण उस जीव की मुक्ति नहीं होती।॥ ३ ॥
6पारब्रह्म स्वयं ही सर्वस्व है और इसके अलावा अन्य कोई नहीं।
7पारब्रह्म जैसे प्राणी को स्वयं बुलाता है, प्राणी वैसे ही बोलता है और प्राणी उसके बुलाने पर ही बोलते हैं।
8गुरु की वाणी स्वयं ब्रह्म है और गुरु के शब्द द्वारा ही प्रभु से मिलन होता है।
9हे नानक ! तू उस अकाल पुरुष का नाम सिमरन कर जिसकी आराधना से तुझे शांति एवं सुख उपलब्ध होगा ॥ ४॥ ३० ॥ ६३॥
10श्रीरागु महला ३ ॥
11समूचा जगत् मोह-माया में लिप्त होने के कारण अहंकार की मैल से बहुत दुखी है।
12सांसारिक ममत्व के कारण ही अहंकार की मैल लगती है। यह अहंकार की मैल किसी भी विधि द्वारा निवृत्त नहीं होती, चाहे प्राणी सैंकड़ों तीर्थों का भी स्नान कर ले।
13अनेकों कर्मकाण्डों द्वारा भी यह मैल दुगुणी हो जाती है और प्राणी के साथ कर्मों के फलस्वरूप लगी ही रहती है।
14धर्म ग्रंथों के अध्ययन द्वारा भी यह मलिनता दूर नहीं होती, इस बारे चाहे ब्रह्मवेताओं से पता कर लो॥ १॥
15हे मेरे मन ! यद्यपि तू गुरु साहिब के आश्रय में आ जाओ तो इस मलिनता से निवृत्त हो सकते हो। गुरु की शरण में आने से प्राणी निर्मल हो सकता है।
16मनमुख प्राणी हरि के नाम का उच्चारण भले ही कितना भी करते रहे, वे इससे थक गए हैं किन्तु उनकी मलिनता निवृत नहीं हुई ॥ १॥ रहाउ ॥
17मन अशुद्ध होने के कारण भगवान की भक्ति नहीं होती और न ही नाम (प्रभु) प्राप्त होता है।
18मनमुख प्राणी मलिन ही जीवन व्यतीत करते हैं और फिर मलिन ही इस संसार से प्राण त्याग कर चले जाते हैं। वह अपना मान-सम्मान गंवा कर संसार से कूच कर जाते हैं।
19यदि गुरु की कृपा-दृष्टि हो तो प्राणी की मलिनता नाश हो जाती है और पारब्रह्म प्राणी के ह्रदय में वास करता है।
20जैसे दीपक जलाने से अंधकार में प्रकाश होता है, वैसे ही सतिगुरु की कृपा-दृष्टि से अज्ञान का नाश होकर ज्ञान का आगमन होता है। सतिगुरु के ज्ञान द्वारा अज्ञान रूपी अँधेरा दूर हो जाता है।॥ २॥
21जो प्राणी कहते फिरते हैं कि हमने किया या हम करेंगे, वे अहंकार के कारण मूर्ख तथा गंवार हैं।
22वे प्राणी कर्ता परमेश्वर को भूलकर गए हैं तथा ईष्या-द्वेष में लिप्त रहते हैं, जिसके कारण उन्हें दुख भोगने पड़ते हैं।
23प्राणी के लिए कोई पीड़ा इतनी बड़ी नहीं जितनी माया की है, इसलिए प्राणी सारा संसार भ्रमण करके सुख संचय के प्रयास में ही लगा रहता है और धन के लोभ में भ्रष्ट होकर सारे जगत् से थक-हार कर चूर हो जाता है।
24लेकिन सतिगुरु के उपदेश द्वारा सत्य-नाम को ह्रदय में बसा कर परमात्मा मिलन का सुख प्राप्त करता है॥ ३॥
25जिस पुण्यात्मा को परमात्मा प्राप्त हो जाता है, वही परमेश्वर से मिलन करवाता है, मैं उस पर कुर्बान हूँ।
26इस मन के ईश्वर-भक्ति में लीन होने से सत्यवाणी द्वारा जीव निज स्वरूप में स्थिर रहता है।
27मन के लीन होने से जिव्हा भी सत्यस्वरूप परमात्मा की महिमा गायन करती है।
28हे नानक ! जिन्हें भगवान का नाम विस्मृत नहीं होता, वहीं सत्य में लीन होते हैं।॥ ४॥ ३१॥ ६४॥
29श्रीरागु महला ੪ घरु १॥
30मेरी आत्मा व देह विरह की दुख अग्नि में अत्यंत जल रही है। अब मेरा प्रियतम प्रभु किस तरह मेरे हृदय रूपी गृह में आकर मिलेगा।
31जब मुझे प्रियतम (प्रभु) के दर्शन प्राप्त होते हैं, तो उसके दर्शन-मात्र से ही समस्त दुख निवृत हो जाते हैं।
32जीवात्मा को अपने स्वामी (प्रभु) के दर्शनों की आकांक्षा है और वह कहती है कि मैं साधु-संतों के पास जाकर निवेदन करती हूँ कि किस विधि से मुझे प्रियतम प्रभु के दर्शन प्राप्त हो सकते हैं।॥ १॥
33हे मेरे सतिगुरु ! आपके बिना मेरा अन्य कोई नहीं।
34मैं मूर्ख एवं नासमझ हूँ, इसलिए आपकी शरण में आई हूँ, मुझ पर कृपा करके उस प्रीतम-प्रभु से मिलन करवा दीजिए॥ १॥ रहाउ॥
35सतिगुरु ही प्रभु के नाम का दाता है। सतिगुरु ही आत्मा का परमात्मा से सुमेल करवाता है, इसलिए सतिगुरु महान् है।
36सतिगुरु ने ही अकाल पुरुष को जान लिया है, गुरु के बिना जगत् में अन्य कोई बड़ा नहीं।
37जीवात्मा कहती है कि मैं गुरु की शरण में नतमस्तक हूँ। अतः गुरु जी की कृपा-दृष्टि द्वारा मेरा मिलन उस परमात्मा से अवश्य होगा ॥ २॥
38मन के हठ के कारण गुरु विहीन जीव को अकाल पुरुष कदापि प्राप्त नहीं होगा। समस्त लोग प्रत्येक उपाय करके हार गए हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं