गुरु ग्रंथ साहिब 399 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1हरि-प्रभु का नाम बहुत शीतल है, इसका सुमिरन करने से जलन बुझ जाती है॥ ३॥
2हे नानक ! जो मनुष्य संतजनों की चरण-धूलि हो जाता है, उसे सहज सुख एवं आनन्द प्राप्त हो जाता है।
3पूर्ण गुरु को मिलने से तमाम कार्य सिद्ध हो जाते हैं॥ ४॥ १०॥ ११२ ॥
4आसा महला ५ ॥
5जगत का मालिक गोबिंद गुणों का भण्डार है और उसे गुरु के समक्ष होकर ही जाना जाता है।
6जब दयालु प्रभु कृपालु हो जाता है तो जीव उसकी प्रीति का आनंद प्राप्त करता है॥ १॥
7हे संतजनो ! आओ हम मिल बैठकर हरि की कथा-कहानियों का गुणगान करें।
8लोगों की नुक्ताचीनी को छोड़कर हम रात-दिन प्रभु-नाम का सुमिरन करें ॥ १॥
9मैं प्रभु का नाम जप-जपकर ही जीवित रहता हूँ और इस तरह बड़ा आनंद प्राप्त होता है।
10इस संसार का मोह मिथ्या है, झूठा होने के कारण यह अति शीघ्र ही नष्ट हो जाता है॥ २॥
11कुछ विरले पुरुष ही प्रभु के सुन्दर चरण कमलों से नेह लगाते हैं।
12वह मुख धन्य एवं सुहावना है, जो हरि का ध्यान करता है ॥ ३॥
13भगवान का सिमरन करने से जन्म-मरण एवं काल (मृत्यु) का दुःख मिट जाता है।
14जो प्रभु को भला लगता है, वही नानक के लिए सुख-आनंद है॥ ४॥ ११॥ ११३॥
15आसा महला ५ ॥
16हे मित्रजनो ! आओ हम सब मिलकर हर प्रकार के स्वादिष्ट पदार्थ खाएँ।
17हम मिलकर हरि-परमेश्वर के नामामृत का जाप करें एवं अपने पापों को मिटाएँ॥ १॥
18हे संतजनो ! परम तत्व का विचार करो, इससे कोई विघ्न पैदा नहीं होता।
19गुरुमुख जन हमेशा सचेत रहते हैं और कामादिक पाँच विकारों का नाश कर देते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
20बुद्धि एवं विनम्रता को अपनी जीवन-यात्रा के खर्च के तौर पर प्राप्त करके अहंत्व के विष को जला दो।
21गुरु की दुकान सच्ची है, जहाँ नाम रूपी पूरा सौदा मिलता है। आप नाम रूपी सौदे का ही व्यापार करो ॥ २ ॥
22जो अपने प्राण, शरीर एवं धन को गुरु के समक्ष अर्पण करते हैं, वे प्रतिष्ठित हैं।
23ऐसे मनुष्य अपने प्रभु को भले लगते हैं, और सदैव आनंद प्राप्त करते हैं।॥ ३॥
24जो लोग दुर्मति रूपी शराब को पीने लगते हैं, वे विकारग्रस्त होकर पागल हो जाते हैं।
25हे नानक ! जो मनुष्य राम नाम रूपी रस में मस्त रहते हैं, वही सच्चे नशेड़ी हैं॥ ४॥ १२ ॥ ११४॥
26आसा महला ५ ॥
27मैंने नाम जपने का उद्यम किया है पर यह उद्यम गुरु ने करवाया है।
28गुरु ने मेरे शुभ कार्य की शुरुआत कर दी है। गुरु ने मुझे यही मंत्र दृढ़ करवाया है कि मैंने नाम जप-जपकर ही जीना है॥ १॥
29मैं अपने सतिगुरु के चरण स्पर्श करता हूँ, जिन्होंने मेरी दुविधा निवृत्त कर दी है।
30प्रभु ने अपनी कृपा करके मुझे सत्य से संवार कर मेरा जीवन सुन्दर बना दिया है॥ १॥ रहाउ॥
31अपनी इच्छा से प्रभु ने मेरा हाथ पकड़कर अपने हुक्म से मुझे अपने चरणों में लीन कर लिया है।
32जो प्रभु ने मुझे नाम की देन प्रदान की है, वह मेरे लिए पूर्ण प्रशंसा है॥ २॥
33हे भाई ! प्रभु के नाम को जप कर मैं सदैव ही उसका गुणगान करता रहता हूँ।
34प्रभु ने मुझ पर कृपा की है और सतिगुरु की दया से मेरा संकल्प सम्पूर्ण हो गया है॥ ३॥
35मैं नाम धन प्राप्त करने के लिए प्रभु के गुण गाता हूँ। पूर्ण गुरु ने मुझे नाम-धन का लाभ दिया है।
36हे नानक ! संतजन व्यापारी हैं और अनन्त प्रभु उनका साहूकार है॥ ४॥ १३॥ ११५॥
37आसा महला ५ ॥
38हे प्रभु ! जिस मनुष्य का एक तू ही ठाकुर है, वह बड़ा भाग्यशाली है।
39वह जीवन में सदैव सुखी एवं प्रसन्नचित्त रहता है और उसका सब भ्रम एवं डर दूर हो जाता है॥ १॥
40(हे बन्धु !) हम गोबिन्द के सेवक है, मेरा ठाकुर सबसे बड़ा है।
41जो समस्त विधियों से स्वयं ही करने वाला और कराने वाला है, वही हमारा सच्चा गुरु है॥ १॥ रहाउ॥
42सृष्टि में ईश्वर के बराबर दूसरा कोई नहीं, जिसका भय माना जाए।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं