सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 397 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1जिसके अन्तर्मन में गुरु का शब्द मौजूद होता है केवल वही महाजाल से छूट सकता है॥ २॥

2गुरु की महिमा मैं क्या वर्णन करूँ ? (क्योंकि) गुरु विवेक एवं सत्य का सरोवर है।

3वह आदि, युगों के आरंभ एवं युगों-युगांतरों में पूर्ण परमेश्वर है॥ ३॥

4सदैव हरि-नाम का ध्यान करते रहो और अपने मन को प्रभु के प्रेम रंग में रंगो ।

5गुरु ही मेरी आत्मा, प्राण एवं धन है और वह सदा नानक के साथ रहता है॥ ४॥ २॥ १०४ ॥

6आसा महला ५ ॥

7हे मेरी माता ! यदि अलख एवं अपार मेरा मालिक प्रभु एक क्षण भर के लिए भी मेरे मन में बस जाए तो

8मेरे दुःख, दर्द एवं रोग सब दूर हो जाते हैं।॥ १॥

9मैं अपने मालिक पर कुर्बान जाती हूँ।

10उसका सुमिरन करने से मेरे मन-तन में बड़ा आनंद उत्पन्न होता है॥ १॥ रहाउ॥

11उस सच्चे प्रभु के बारे में मैंने थोड़ी-सी बात सुनी है।

12हे मेरी माता! मैं बहुत सुखी हूँ और सुख पाकर भी मैं उसका मूल्यांकन नहीं कर सकती॥ २॥

13वह प्राणनाथ प्रभु मेरे नयनों को बहुत अच्छा लगता है। उसके दर्शन करके मैं मुग्ध हो गई हूँ।

14हे मेरी माता! मैं गुणहीन हूँ, (फिर भी) उसने स्वयंही मुझे अपने दामन के साथ लगा लिया है॥ ३॥

15यह प्रभु वेद, कतेब एवं समूचे जगत से अलग है।

16नानक का पातशाह हर जगह प्रगट दिखाई देता है॥४॥३॥१०५॥

17आसा महला ५ ॥

18हे भगवान ! तेरे लाखों ही भक्त तेरी आराधना करते रहले हैं और मुंह से प्रिय-प्रिय' जपते रहते हैं।

19फिर किस युक्ति से तुम मुझ गुणहीन एवं विकारी पुरुष को अपने साथ मिलाओगे॥ १॥

20हे गोविन्द गोपाल ! हे दयालु प्रभु ! मुझे तेरी ही टेक है।

21तू सब जीवों का मालिक है, सारी सृष्टि तेरी पैदा की हुई है॥ १॥ रहाउ॥

22तू सदैव ही संतों का सहायक है, जो तुझे सदैव प्रत्यक्ष देखते हैं।

23जो नाम विहीन मनुष्य हैं, वे दुःख एवं प्रायश्चित करते मरते हैं॥ २॥

24जो सेवक दास भावना से प्रभु की सेवा करते हैं, उनका जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है।

25जिन्होंने प्रभु नाम को भुला दिया है, उनका क्या हाल होगा ?॥ ३॥

26जैसे पराए खेत में हरियाली खाने हेतु पशु जाता है और अपनी पिटाई करवाता है वैसे ही यह सारा संसार है।

27हे प्रभु ! नानक के बन्धन काट कर उसे अपने साथ मिला लोll ४ ॥ ४॥ १०६॥

28आसा महला ५ ॥

29हे भाई ! दुनिया के समस्त पदार्थ भुलाकर एक ईश्वर का ही चिन्तन करो।

30अपने झूठे अभिमान को छोड़कर अपना मन-तन प्रभु के समक्ष अर्पण कर दो॥ १॥

31तू आठ प्रहर जग के रचयिता परमात्मा की स्तुति किया कर।

32हे मेरे मालिक ! मैं तेरी नाम की देन से जीवित हूँ, मुझ पर कृपा धारण कीजिए। १॥ रहाउ॥

33हे भाई ! वही कर्म कर जिससे तेरा मुख लोक-परलोक मेंउस हृदय घर को सुन्दर बना,

34जो कभी ध्वस्त नहीं होता।

35एक परमात्मा को अपने हृदय में बसाकर रख,

36वह अमर है, जो कभी मरता नहीं ॥ ३॥

37जो लोग प्रभु को अच्छे लगते हैं, उन्हें प्रभु प्यारा लगने लग जाता है

38गुरु की कृपा से ही नानक ने अकथनीय परमात्मा का वर्णन किया है ॥४॥५॥१०७॥

39आसा महला ५ ॥

40जो प्रभु-नाम को कभी विस्मृत नहीं करते, वे लोग कैसे होते हैं ?

41वे मालिक-प्रभु जैसे ही होते हैं, उनमें तथा प्रभु में बिल्कुल ही कोई भेद मत समझो॥ १॥

42हे प्रभु ! तुझे मिलने से मन-तन आनंदित हो जाते हैं।

43प्रभु-भक्त की कृपा से मैंने सुख पाया है और उसने मेरा सारा दुख मिटा दिया है॥ १॥ रहाउ॥

44हे मालिक ! जितने भी खण्ड-ब्रह्मण्ड में तेरे भक्त रहते हैं, उनका तूने उद्धार कर दिया है।

45जिनके मन में तू स्वयं निवास करता है, वही पूर्ण भक्त होते हैं।॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं