सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 394 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1हीरे-जवाहरातों से मेरे भण्डार भरे हुए हैं।

2निरंकार प्रभु का जाप करने से वह कम नहीं होते।

3हे नानक ! कोई भक्तजन ही नाम-अमृत का पान करता है

4उसकी परमगति हो जाती है॥ २॥ ४१ ॥ ६२ ॥

5आसा घरु ७ महला ५ ॥

6मैं नित्य ही अपने हृदय में हरि का नाम स्मरण करता रहता हूँ।

7इस तरह मैं अपने समस्त संगी-साथियों को बचा लेता हूँ॥ १॥

8गुरु सदैव ही मेरे साथ एवं निकट है।

9मैं उस भगवान को सदा याद करके अपने हृदय में बसाकर रखता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

10हे भगवान् ! तेरा किया हुआ प्रत्येक कार्य मुझे मीठा लगता है।

11नानक तुझसे हरिनाम रूपी पदार्थ ही माँगता है॥ २॥ ४२॥ ६३॥

12आसा महला ५ ॥

13साधु की संगति करने से सारी दुनिया ही भवसागर से पार हो चुकी है।

14हरि का नाम मन का सहारा है॥ १॥

15हे प्यारे गुरुदेव ! तेरे चरण कमल बड़े कोमल हैं।

16हरि के संतजन बड़े प्रेम से तेरे चरणों की पूजा करते हैं।॥ १॥ रहाउ ॥

17हे नानक ! जिसके मस्तक पर सौभाग्य लिखा हुआ है,

18उसका सुहाग अटल है॥ २॥ ४३॥ ६४ ॥

19आसा महला ५ ॥

20प्राणनाथ प्रभु की आज्ञा मुझे बहुत मीठी लगती है।

21मेरे पति-परमेश्वर ने मेरी सौतन (माया) को हृदय-घर से बाहर निकाल दिया है।

22मेरे प्रियवर ने मुझे सुहागिन बनाकर सुन्दर बना दिया है।

23उसने मेरे मन की जलन को शीतल कर दिया है॥ १॥

24भला हुआ कि मैंने अपने प्रियतम प्रभु का कहना मान लिया।

25मैंने इस घर में सहज सुख की अनुभूति कर ली है ॥रहाउ ॥

26मैं अपने प्रिय-प्रभु की दासी एवं सेविका हूँ।

27वह अविनाशी, अगम्य एवं अपार है।

28मैं अपने हाथ में पंखा लेकर एवं उसके चरणों में बैठकर अपने प्रियतम को पंखा करती हूँ।

29मुझे काटने वाले पाँच शत्रु-काम, क्रोध, लोभ, मोह, अभिमान भाग गए हैं।॥ २॥

30न ही मैं उच्च वंश से हूँ और न ही शोभावान हूँ।

31मैं क्या जानती हूँ कि मैं क्यों अपने प्राणनाथ को भली लगने लग गई हूँ।

32मैं अनाथ, गरीब एवं मानहीन हूँ।

33लेकिन पकड़ कर मेरे स्वामी ने मुझे अपनी रानी बना लिया है॥ ३॥

34जब से मुझे मेरा साजन प्रीतम मिला है,

35मुझे सहज सुख प्राप्त हो गया है और मेरा सुहाग धन्य हो गया है।

36हे नानक ! मेरी अभिलाषा पूर्ण हो गई है।

37सतिगुरु ने मुझे गुणों के भण्डार प्रभु से मिला दिया है॥ ४ ॥ १॥ ६५ ॥

38आसा महला ५ ॥

39उसके माथे पर त्रिकुटी और दृष्टि भी बहुत करुर है।

40उसकी वाणी भी कड़वी है और जिव्हा भी फूहड़ है।

41वह सदैव भूखी रहती है और अपने प्रिय-प्रभु को दूर समझती है॥ १॥

42हे मेरे भाई !राम ने एक ऐसी माया रूपी स्त्री सृष्टि में उत्पन्न की है।

43उसने समूचा जगत निगल लिया लेकिन गुरु ने मेरी रक्षा की है॥ रहाउ॥

44उस माया-स्त्री ने ठग-बूटी खिलाकर सारी दुनिया को वश में कर लिया है।

45उसने ब्रह्मा, विष्णु एवं महादेव को भी अपने मोह में फँसाकर मोहित कर लिया है।

46जो गुरुमुख प्रभु-नाम से संलग्न हुए हैं, वह सुन्दर दिखाई देते हैं।॥ २॥

47मनुष्य व्रत, नियम एवं प्रायश्चित कर्म करते हुए थक चुके हैं।

48वह समूचे जगत के पवित्र तीर्थों एवं तटों पर भटकते फिरते हैं।

49जो सतिगुरु की शरण में आए हैं, वे भवसागर से पार हो गए हैं।॥ ३॥

50माया के मोह में सारा जगत फँसा हुआ है।

51मनमुख मूर्ख मनुष्य अहंकार में दुखी होते हैं।

52हे नानक ! गुरु ने बाँह से पकड़ कर मुझे बचा लिया है॥ ४॥ २॥ ६६ ॥

53आसा महला ५ ॥

54जब मनुष्य को परमात्मा भूल जाता है तो हर प्रकार के दुख घेर लेते हैं।

55ऐसा प्राणी लोक-परलोक में किसी काम का नहीं ॥ १॥

56हरि-परमेश्वर का ध्यान करते हुए संतजन तृप्त हो गए हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं