सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 393 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1जिसके मिलन से प्रभु से प्रेम हो जाता है॥ १॥

2गुरु की कृपा से वह सुख पा लेता है।

3जिसका सिमरन करने से मन में प्रकाश हो जाता है, उसकी गति एवं अनुमान वर्णन नहीं किए जा सकते॥ १॥ रहाउ ॥

4उसकी पूजा करने से व्रत, नियम, तीर्थ-स्नान,

5वेदों, पुराणों एवं स्मृतियों के सुनने का भी फल मिल जाता है।

6उसका हृदय रूपी स्थान भी महापवित्र एवं निर्मल हो जाता है

7जो व्यक्ति साधु की संगति करता है, उसके हृदय में परमात्मा का हरि-नाम बस जाता है ॥ २ ॥

8ऐसा भक्तजन सारे विश्व में लोकप्रिय हो जाता है।

9उसकी चरण-धूलि से पापी भी पवित्र हो जाते हैं।

10जिस मनुष्य को हरि-परमेश्वर बादशाह मिल गया है,

11उसकी गति एवं महत्ता वर्णन नहीं किए जा सकते॥ ३॥

12मैं निशदिन हाथ जोड़कर प्रभु का ध्यान करता हूँ और

13उन संतों के दर्शन प्राप्त करता हूँ।

14हे प्रभु ! मुझ गरीब को अपने साथ मिला लीजिए।

15नानक ने आकर तेरी शरण ले ली ॥४॥३८॥८९॥

16आसा महला ५ ॥

17हे पण्डित जी ! तुम तो अपने शालग्राम को किसी-किसी समय ही स्नान कराते हो लेकिन हमारा शालग्राम आठों प्रहर ही जल में स्नान करने वाला है,

18मन को लुभाने वाला ज्ञानी हरि-शालग्राम सदैव भोग लगाता रहता है।

19वह किसी के भी दुःख-दर्द को नहीं रहने देता।

20हम उस हरि शालग्राम के बार-बार चरण स्पर्श करते हैं। ॥१॥

21हमारे हृदय में प्रभु की सेवा ही शालग्राम की पूजा है।

22प्रभु का नाम-सुमिरन ही पूजा अर्चना एवं वन्दना है॥ १॥ रहाउ ॥

23मेरे शालग्राम हरि की इच्छा का घण्टा चारों दिशाओं सारे विश्व में सुनाई देता है।

24उसका आसन सदैव ही वैकुंठ में है।

25उसका चंवर समस्त जीवों पर झूलता है और

26जिसकी होम-सामग्री (धूप) सदैव महकती रहती है॥ २॥

27हे पण्डित ! तू अपने शालग्राम को डिब्वे में रखता है लेकिन हमारे शालग्राम का डिब्बा प्रत्येक जीव का हृदय है।

28संतों की संगति उसकी अटल सभा है।

29सदैव आनंद प्रदान करने वाला उसका कीर्तन ही उसकी आरती है।

30उसकी महिमा बहुत सुन्दर एवं सदैव ही अनन्त है॥ ३॥

31जिसकी किस्मत में उसकी प्राप्ति का लेख लिखा होता है केवल वही शालग्राम प्रभु को पाता है

32वह मनुष्य संतों के चरणों की शरण में आता है ।

33हरि शालग्राम मेरे हाथ में आ गया है अर्थात् मुझे मिल गया है।

34हे नानक ! गुरु ने मुझे यह दान किया है॥ ४॥ ३६ ॥ ६० ॥

35आसा महला ५ पंचपदा ॥

36जिस पथ पर विषय-विकारों में फँसी हुई पनिहारी जीवन की पूँजी लुटा बैठी है,

37वह मार्ग संतजनों से दूर है॥ १॥

38पूर्ण सतिगुरु ने सत्य कहा है।

39हे प्रभु ! तेरा नाम मोक्ष का मार्ग है और यमदूतों का मार्ग इससे बहुत दूर रह जाता है॥ १॥ रहाउ॥

40जहाँ पर लालची कर लेने वालों का घाट है,

41वह पथ भक्तजनों से दूर रह जाता है।॥ २॥

42जिस जीवन सफर में अनेकों ही काफिले पीड़ित होते रहते हैं,

43उस सफर में साधजन परब्रह्म के सत्संगी बने रहते हैं।॥ ३॥

44चित्रगुप्त समस्त जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा लिखते रहते हैं परन्तु

45भक्तजनों की तरफ दृष्टि उठाकर भी नहीं देखते॥ ४॥

46हे नानक ! जिसका सतिगुरु पूर्ण है,

47उसके लिए भगवान के गुणानुवाद के निरन्तर बाजे बजते रहते हैं॥ ५॥ ४० ॥ ६१ ॥

48आसा महला ५ दुपदा १ ॥

49साधु की संगति ने मुझे भगवान का नाम-सिमरन सिखा दिया है,

50जिसके फलस्वरूप सारे मनोरथ एवं कार्य पूरे हो गए हैं।

51हरि यश गाने से मेरी तृष्णा बुझ गई है और मैं तृप्त हो गया हूँ।

52सारिंगपानि भगवान का नाम जप-जपकर मैं आत्मिक जीवन जीता हूँ॥ १॥

53सबकुछ करने एवं करवाने में समर्थ प्रभु की मैंने शरण ली है।

54गुरु की कृपा से मुझे सहज घर मिल गया है, अन्धकार दूर हो गया है और ज्ञान का चन्द्रमा उदय हो गया है॥ १॥ रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं