गुरु ग्रंथ साहिब 392 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1उसने धन संचय करके खजाना भर लिया परन्तु
2आखिरकार परमात्मा ने उसकी धन-दौलत उससे छीनकर किसी दूसरे को दे दी है॥ १॥
3यह मानव-शरीर कच्ची मिट्टी की गागर के समान है जो जल में ही गल जाता है।
4अभिमान एवं घमण्ड कर करके यह उस जल में ही डूब जाता है।॥ १॥ रहाउ ॥
5मनुष्य मृत्यु के भय से निडर होकर निर्भीक बन जाता है लेकिन
6जगत के रचयिता परमात्मा को याद नहीं करता जो सदा उसके साथ है।
7वह फौजें भर्ती करता और हथियार संग्रह करता है।
8जब उसके प्राण निकल जाते हैं तो वह राख बन जाता है॥ २॥
9उसके पास ऊँचे मन्दिर, महल, महारानियाँ,
10मन को लुभाने वाले हाथी-घोड़े, सुन्दर वस्त्र एवं
11पुत्र व पुत्रियों का बड़ा परिवार था परन्तु
12उनके मोह में लीन हुआ ज्ञानहीन मनुष्य दु:खी होकर प्राण त्याग देता है॥ ३॥
13जिस विधाता ने उसे पैदा किया था, उसने ही उसे मार दिया है।
14भोगविलास एवं स्वाद स्वप्न की भांति है
15उसे ही मोक्ष मिलता है तथा उसके पास ही शासन एवं धन-ऐश्वर्य है,
16हे दास नानक ! जिस पर प्रभु दयालु होता है ॥ ४॥ ३५ ॥ ८६॥
17आसा महला ५ ॥
18आदमी इस माया (धन) से बहुत ज्यादा प्रेम करता है।
19जैसे-जैसे यह (धन) मिलता जाता है वैसे ही इसके साथ मोह बढ़ता जाता है।
20गले से चिपकी हुई यह माया किसी भी तरह आदमी को छोड़ती नहीं परन्तु
21सच्चे गुरु के चरण-स्पर्श करने से इससे छुटकारा मिल जाता है॥ १॥
22जगत को मुग्ध करने वाली माया हमने त्याग कर खुद से दूर कर दी है।
23अब हमें निर्गुण प्रभु मिल गया है और सब ओर से शुभ कामनाएँ मिल रही है॥ १॥ रहाउ ॥
24माया इतनी सुन्दर है कि यह मन को आकर्षित कर लेती है।
25यह मनुष्य के पथ, घाट, घर एवं वन-वन में दृष्टि लगाकर प्रभावित करती है।
26मन एवं तन को यह बहुत मीठी लगती है।
27गुरु की दया से मैंने देख लिया है कि यह माया बहुत खोटी है॥ २॥
28उस माया के आगे काम करने वाले काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार इत्यादि विकार बड़े ठग हैं।
29(और तो और) यह अपने माता-पिता को भी नहीं छोड़ते।
30अपने मेल-मुलाकात करने वाले लोगों को भी इन्होंने भलीभांति फँसा लिया है।
31परन्तु गुरु की कृपा से मैंने उन सब ठगों को वश में कर लिया है॥ ३॥
32अब मेरे हृदय में आनंद है।
33मेरा भय मिट गया है और मेरे तमाम बन्धन कट गए हैं।
34हे नानक ! जब से मुझे सच्चा गुरु मिला है,
35तब से मैंने अपना सारा घर सुखी बसा लिया है अर्थात् मेरे शरीर रूपी घर में बसने वाली ज्ञानेन्द्रियाँ सुखी हो गई हैं॥ ४॥ ३६ ॥ ८७ ॥
36आसा महला ५ ॥
37संतजन आठों प्रहर प्रभु को अपने निकट बसता समझते हैं।
38प्रभु के किए हरेक काम को मीठा समझकर मानते हैं।
39प्रभु का एक नाम ही संतों के जीवन का आधार है और
40सन्तजन सबकी चरण-धूलि बने रहते हैं।॥ १॥
41हे मेरे भाई ! संतों का जीवन-आचरण ध्यानपूर्वक सुनो।
42उनकी महिमा कथन नहीं की जा सकती ॥ १॥ रहाउ॥
43उनका कार्य-व्यवहार केवल प्रभु का नाम है।
44आनंद स्वरूप प्रभु का भजन-कीर्तन उनका सच्चा सुख विश्राम है।
45मित्र एवं शत्रु उनके लिए एक समान हैं।
46अपने प्रभु के बिना वह किसी को नहीं जानते॥ २॥
47संतजन करोड़ों ही पाप मिटाने वाले हैं।
48वह जीवों के दुःख को निवृत्त कर देते हैं और मनुष्य को आत्मिक जीवन प्रदान करने में सक्षम हैं।
49वे काम, क्रोध, इत्यादि विकारों को जीतने वाले शूरवीर एवं वचन के बली हैं।
50इस तुच्छ माया को भी संतों ने छल लिया है॥ ३॥
51संतों की संगति देवते भी चाहते हैं।
52उनके दर्शन बड़े सफल हैं और उनकी सेवा बड़ी फलदायक है।
53हाथ जोड़कर नानक एक यही प्रार्थना करता है कि
54हे गुणों के भण्डार प्रभु ! मुझे संतों की सेवा की देन प्रदान कीजिए॥ ४॥ ३७॥ ८८ ॥
55आसा महला ५ ॥
56भगवान का एक नाम जपने से ही सर्व सुख मिल जाते हैं।
57श्रीहरि का गुणगान करने से तीर्थ, तप, दान-पुण्य एवं दया इत्यादि सभी धर्मो का फल भी मिल जाता है।
58साधु की संगति महापवित्र है,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं