गुरु ग्रंथ साहिब 391 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1जीवात्मा कहती है कि परमात्मा न तो मरता है और न ही हम मृत्यु से भयभीत होते हैं।
2वह परमात्मा न ही कभी नाश होता है, न ही हम मृत्यु के डर से दु:खी होते हैं।
3भगवान न तो निर्धन है और न ही हम भूखे हैं।
4न उसे कोई दुख है और न ही हम दुखी होते हैं। ॥१॥
5भगवान के अलावा अन्य कोई मारने वाला नहीं।
6मेरा जीवनदाता भगवान है, वह मुझे जीवन प्रदान करता है॥ १॥ रहाउ॥
7उसे कोई बंधन नहीं और न ही हम बंधन में फंसे हुए हैं।
8न ही उसे कोई कर्म का धंधा है, न ही हम किसी धन्धे में ग्रस्त हैं।
9न ही उसे कोई मैल है और न ही हम मेले हैं।
10वह सदैव आनन्द में है तो हम भी सदैव प्रसन्न हैं।॥ २॥
11न उसे कोई फिक्र है और न ही हमें कोई फिक्र है।
12उसमें कोई माया का लेप नहीं और न ही हम में कोई अवगुण है।
13न ही कोई उसे भूख है और न ही हम में कोई तृष्णा है।
14जब वह निर्मल है तों हम भी उस जैसे निर्मल लगते हैं। ॥३॥
15हम कुछ भी नहीं केवल वही सब कुछ है।
16वह परमात्मा ही वर्तमान काल से पूर्व भूतकाल में भी था और भविष्यकाल में भी एक वही होगा।
17हे नानक ! गुरु ने मेरे सारे भ्रम एवं भेदभाव दूर कर दिए हैं।
18वह और हम मिलकर एक ही रंग के हो चुके हैं।॥ ४॥ ३२॥ ८३॥
19आसा महला ५ ॥
20अनेक प्रकार से भगवान की सेवा-भक्ति करनी चाहिए।
21अपने प्राण, आत्मा एवं धन को उसके समक्ष अर्पण कर देना चाहिए।
22अपना अभिमान त्याग कर जल एवं पंखे की सेवा करनी चाहिए।
23अनेक बार उस पर कुर्बान होना चाहिए॥ १॥
24हे मेरी माता ! केवल वही सुहागिन है जो अपने प्राणनाथ प्रभु को अच्छी लगती है।
25मैं उसकी संगति में उठती-बैठती हूँ॥ १॥ रहाउ ॥
26मैं उसकी दासों की दासी की पानी भरने वाली हूँ।
27मैं अपने मन में उनकी चरण-धूलि प्रेमपूर्वक रखती हूँ।
28यदि मेरे माथे पर भाग्योदय हो जाएँ तो मैं उनकी संगति को प्राप्त होती हूँ।
29अपनी प्रसन्नता द्वारा स्वामी मुझे मिल गया है॥ २ ॥
30मैं सभी जप, तप एवं धार्मिक संस्कार उसे अर्पण करती हूँ।
31तमाम धर्म कर्म, यज्ञ एवं होम मैं उसको अर्पित करती हूँ।
32अभिमान एवं मोह को त्याग कर मैं उसकी चरण-धूलि हो गई हूँ।
33मैं उनकी संगति में प्रभु को अपने नेत्रों से देखती हूँ॥३॥
34क्षण क्षण में इस तरह भगवान की आराधना करती हूँ।
35दिन-रात मैं इस तरह भगवान की सेवा करती हूँ।
36अब गोपाल गोबिंद मुझ पर कृपाल हो गया है।
37हे नानक ! साधसंगत में वह जीव को क्षमा कर देता है ॥४॥ ३३॥ ८४॥
38आसा महला ५ ॥
39प्रभु की प्रीति से सदैव सुख मिलता है।
40इससे कोई दु:ख स्पर्श नहीं कर सकता।
41प्रभु की प्रीति से अहंत्व की मैल दूर हो जाती है और
42मनुष्य सदैव निर्मल हो जाता है॥ १॥
43हे मित्र ! सुन, भगवान का प्रेम प्यार ऐसा है कि
44यह हरेक जीव के शरीर, जीवन एवं प्राणों का आधार है॥ १॥ रहाउ॥
45प्रभु की प्रीति से समस्त भण्डार मिल जाते हैं।
46इससे निर्मल नाम मन में बस जाता है।
47प्रभु की प्रीति से मैं हमेशा के लिए शोभा वाला बन गया हूँ ।
48प्रभु की प्रीति से सारी चिन्ता मिट गई है॥ २॥
49प्रभु की प्रीति से मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है।
50प्रभु की प्रीति से जीव मृत्यु से नहीं डरता।
51प्रभु की प्रीति सबका उद्धार कर देती है और
52परलोक में उनके साथ जाती है। ॥३॥
53अपने आप न कोई मनुष्य (प्रभु-चरणों में) मिला रह सकता है और न कोई कुमार्गगामी होता है।
54जिस पर प्रभु कृपालु होता है, वह साधुओं की संगति में मिलता है।
55नानक का कथन है कि हे प्रभु ! मैं तुझ पर कुर्बान जाता हूँ,
56तू ही संतों का सहारा एवं उनका बल है॥ ४॥ ३४॥ ८५ ॥
57आसा महला ५ ॥
58किसी (इन्सान) ने राजा बनकर लोगों पर राज किया है और
59बहुत सारे अनर्थ-जुल्म करके धन संचय किया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं