गुरु ग्रंथ साहिब 38 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1जीव रूपी मुग्ध स्त्री! तू झूठ द्वारा तगी हुई झूठी बन रही है।
2सत्य व सुन्दर पति-परमात्मा गुरु के उपदेश द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है ॥ १॥ रहाउ॥
3स्वेच्छाचारी जीव रूपी स्त्रियों पति-परमेश्वर को नहीं पहचानती, इसलिए उनकी जीवन रूपी रात कैसे व्यतीत हो ?
4अहंकार में पूर्ण रूप से भरी हुई वह स्त्री, तृष्णाग्नि में जलती है तथा द्वैत-भाव में दुख पाती है।
5जो सुहागवती स्त्रियाँ गुरु-उपदेश में रत हैं, उनके हृदय में से अहंत्व नष्ट हो जाता है।
6वह अपने पति-परमेश्वर के आनंद को सदैव भोगती हैं, इसलिए उनका जीवन पूर्ण सुख में व्यतीत होता है॥ २॥
7जो स्त्रियाँ (जीव) ज्ञान-रहित हैं, उनको पति-परमात्मा द्वारा परित्यक्त किया हुआ है और वह पति-परमात्मा का प्रेम ग्रहण नहीं कर पाती।
8उनकी बुद्धि में अज्ञानता का अंधकार है, परमात्मा को देखे बिना भौतिक पदार्थों की भूख नहीं जाती।
9हे सत्संगिनों ! सत्संग में आओ और मिल कर विनती करो कि मुझे भी परमात्मा से मिला दो।
10जिस जीव रूपी स्त्री को सौभाग्य से सतिगुरु की प्राप्ति होती है, उसने ही पति-परमात्मा को प्राप्त किंया है और वह सत्य स्वरूप में समा जाती है ॥ २॥
11वे सखियाँ सुहागिन होती हैं, जिन पर परमात्मा कृपा-दृष्टि करता है।
12वह अपना तन-मन अर्पण करके अपने पति-परमात्मा को पहचानती हैं।
13गुरु कृपा द्वारा अहंकार दूर करके अपने हृदय रूपी घर में पति-परमात्मा पा लेती हैं।
14गुरु जी कथन करते हैं कि वह यशस्वी सुहागिनें होती हैं जो प्रतिदिन पति-परमात्मा का चिन्तन करती है ॥ ४॥ २८ ॥ ६१ ॥
15श्रीरागु महला ३ ॥
16कई जीव रूपी स्त्रियाँ अपने पति-परमेश्वर के साथ सुख मान रही हैं परन्तु मैं किसके द्वार पर जाकर प्रभु-मिलन की युक्ति पूंछू ?
17गुरु जी कथन करते हैं कि हे प्राणी ! तू श्रद्धापूर्वक सच्चे हृदय से अपने सतिगुरु की सेवा कर और सतिगुरु तुझ पर अपार कृपा करके तेरा परमेश्वर-पति से मिलन करवा देगा।
18अकाल पुरुष समस्त जीवों का रक्षक है और उसके लिए कोई निकट एवं दूर नहीं।
19जिस प्राणी ने अपने पति-परमेश्वर को पा लिया है, वह उसकी संगति का सदैव आनंद प्राप्त करता है॥ १॥
20हे ज्ञानहीन प्राणी ! तू अपने गुरु की आज्ञानुसार कर्म करता रह, गुरु के उपदेशानुसार चलने से हे प्राणी !
21तुझे परमात्मा का रात-दिन सुख अनुभव होगा और तू प्रभु के ह्रदय में समा जाएगा ॥ १II रहाउ॥
22जो जीवात्माएँ गुरु-शब्दों में लीन हैं, वही सुहागिनें हैं। वे सत्यनाम से श्रृंगार करती हैं।
23वे गुरु के साथ प्रेम में रहने से अपने अन्तर में हरि-रूपी वर प्राप्त कर लेती हैं।
24उनकी सेज अति सुन्दर है, जिस पर परमात्मा रूपी पति से उनका मिलन होता है और उनके पास भक्ति के अमूल्य भण्डार विद्यमान होते हैं।
25वह प्रीतम प्रभु जो संसार के समस्त जीवों का आश्रय है, वह उनके हृदय में निवास करता है॥ २॥
26गुरु जी कथन करते हैं कि मैं उन जीवात्माओं (प्रभु-भक्तों) पर बलिहारी जाता हूँ, जो अपने स्वामी की प्रशंसा करती हैं।
27मैं उन प्रभु-भक्तों पर अपना तन-मन समर्पित करता हूँ और अपना शीश निवाता(झुकता) हूँ।
28जिन्होंने विषय-विकार एवं द्वैत भावना त्यागकर एक पारब्रह्म को पहचान कर अपना लिया है, वह द्वैतवाद के प्रेम को अस्वीकृत कर देते हैं।
29गुरु जी वचन करते हैं कि हे नानक ! गुरु-उपदेश से ही पारब्रह्म का ज्ञान प्राप्त होता है और गुरु की कृपा से वह ईश्वर में लीन हो जाता है।॥ ३॥ २६॥ ६२॥
30श्रीरागु महला ३ ॥
31हे पूज्य-परमेश्वर ! तू ही सत्य है और सब कुछ तेरे ही वश में है।
32चौरासी लाख योनियों में प्राणी गुरु-मिलन के बिना सर्वत्र भटकता रहता है और प्रभु प्राप्ति के लिए डगमगाता फिरता है।
33परमात्मा की कृपा-दृष्टि हो तो क्षमा करने पर मनुष्य देह दुखों से निवृत्त होकर सदा सुख सागर में रहती है।
34गुरु की दया-दृष्टि से ही प्राणी सच्चे, गहर, गंभीर परम सत्य को प्राप्त करता है॥ १॥
35इसलिए हे मेरे मन ! भगवान के नाम में मग्न होने से सुख की उपलब्धि होती है।
36गुरु उपदेशानुसार परमात्मा के नाम का यश गान करता जा, क्योकि इसके अतिरिक्त और कोई अन्य उपाय नहीं ॥ १॥ रहाउ॥
37धर्मराज को सच्चे न्याय का उपदेश उसी परमात्मा ने प्रदान किया था केि सबके साथ बैठ कर एक सच्चा-न्याय कर।
38उस महान् परमात्मा ने धर्मराज को अधिकार प्रदान किया था कि दुष्ट आत्माएँ जो लोभ, मोह, अहंकार इत्यादि विकारों में ग्रस्त हैं वह तेरे नरकों की प्रजा है।
39आध्यात्मिक प्राणी जो गुणों के भण्डार से ओतप्रोत हैं तथा परमेश्वर का सिमरन करते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं