गुरु ग्रंथ साहिब 387 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1मैं केवल राम जी के गुण गाता हूँ।
2हे भाई ! संतों के प्रताप एवं गुरु की संगति में मिलकर मैं हरेि नाम का ध्यान करता रहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
3जिस परमात्मा के सूत्र में जगत की सारी सामग्री पिरोई हुई है,
4वह हरेक शरीर में मौजूद है॥ २॥
5प्रभु एक क्षण में ही सृष्टि की उत्पति एवं प्रलय कर देता है।
6लेकिन निर्गुण प्रभु स्वयं निर्लिप्त रहता है। ३ ॥
7अन्तर्यामी प्रभु सब कुछ करने एवं जीवों से कराने में समर्थ है।
8नानक का स्वामी सदैव आनंद में रहता है॥ ४॥ १३॥ ६४॥
9आसा महला ५ ॥
10अब मेरे करोड़ों जन्मों के चक्र नष्ट हो गए हैं।
11दुर्लभ मानव-देहि को पाकर जीवन-बाजी को जीत लिया है। मैंने माया के हाथों यह बाजी हारी नहीं ॥ १॥
12शुभ-आचरण से सारे पाप नष्ट होगए हैं और दुःख-दर्द दूर हो गए हैं।
13संतों की चरण-धूलि से हम पावन हो गए हैं। ॥१॥रहाउ ॥
14प्रभु के संत दुनिया का उद्धार करने में समर्थ हैं।
15ऐसे संत उसे मिलते हैं, जिसे उनका संयोग प्रारम्भ से लिखा होता है॥ २॥
16गुरु के दिए नाम-मंत्र से मन आनंदित हो गया है।
17तृष्णा बुझ गई है और मन स्थिर हो गया है॥ ३॥
18हरि का नाम रूपी पदार्थ ही नवनिधियों एवं सिद्धियों के तुल्य है।
19हे नानक ! यह सुमति मुझे गुरु से प्राप्त हुई है॥ ४॥ १४॥ ६५॥
20आसा महला ५ ॥
21अज्ञानता के अँधकार के कारण मेरे मन में पैदा हुई तृष्णा मिट गई है।
22संतों की सेवा करने से अनेक पाप मिट चुके हैं।॥ १॥
23मुझे सहज सुख एवं बड़ा आनंद प्राप्त हो गया है।
24गुरु की सेवा से मेरा मन निर्मल हो गया है। मैंने तो गुरु से श्रीहरि का ‘हरि-हरि' नाम ही सुना है॥ १॥ रहाउ ॥
25मेरे मन की मूर्खता एवं ढीठता मिट गई है।
26प्रभु की रज़ा मुझे बड़ी मीठी लगती है॥ २॥
27मैंने पूर्ण गुरु के चरण पकड़ लिए हैं और
28मेरे करोड़ों जन्मों के पाप मिट गए हैं।॥ ३॥
29मेरा यह रत्न जैसा अमूल्य जन्म सफल हो गया है।
30हे नानक ! प्रभु ने मुझ पर दया धारण की है॥ ४॥ १५॥ ६६ ॥
31आसा महला ५ ॥
32अपने सतिगुरु को हमेशा ही याद करते रहना चाहिए और
33गुरु के चरणों को अपने बालों से झाड़ना चाहिए ॥ १॥
34हे मेरे जागने वाले मन ! मोह-माया की नींद में से जाग जाओ अर्थात् सचेत हो जाओ।
35हरि के बिना तेरे कोई भी काम नहीं आएगा। परिवार का मोह झूठा है एवं माया का प्रसार नाशवान है॥ १॥ रहाउ॥
36गुरु की वाणी से प्रेम लगाओ।
37यदि गुरु कृपालु हो जाए तो दु:ख दूर हो जाता है।॥ २॥
38गुरु के सिवाय दूसरा कोई स्थान सुखदायक नहीं। ३॥
39क्योंकेि गुरु दाता है और गुरु ही नाम प्रदान करता है॥
40गुरु स्वयं ही परब्रह्म परमेश्वर हैं।
41इसलिए हे नानक ! आठों प्रहर गुरु को जपते रहना चाहिए॥ ४॥ १६॥ ६७ ॥
42आसा महला ५ ॥
43प्रभु स्वयं ही पेड़ है और जगत रूपी शाखाएँ उसका विस्तार हैं।
44अपनी जगत रूपी फसल की वह स्वयं ही रक्षा करता है॥ १॥
45जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ, मुझे प्रभु ही नज़र आता है।
46यह स्वयं ही प्रत्येक शरीर के भीतर मौजूद है॥ १॥ रहाउ॥
47प्रभु स्वयं ही सूर्य है और यह जगत समझो उसकी किरणों का विस्तार है।
48वह स्वयं ही अदृष्ट है और स्वयं ही साक्षात् है॥ २॥
49निर्गुण एवं सगुण नाम इन दोनों रूपों ने
50मिलकर ईश्वर में ही स्थान बनाया हुआ है॥ ३॥
51हे नानक ! गुरु ने मेरा भ्रम एवं डर दूर कर दिया है और
52मैं आनंद रूप परमेश्वर को ही अब अपने नयनों से हर जगह देखता हूँ॥ ४ ॥ १७ ॥ ६८ ॥
53आसा महला ५ ॥
54हे भगवान् ! मैं कोई उक्ति एवं चतुराई नहीं जानता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं