गुरु ग्रंथ साहिब 382 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1वह मूर्ख है जो कहता है कि मैं जानता हूँ। जानने वाला छिपा हुआ नहीं रहता।
2हे नानक ! गुरु ने मुझे अमृतरस पिलवाया है। प्रभु के प्रेम-रस में भीगकर अब मैं आनंदित हो गया हूँ॥ ४॥ ५॥ ४४॥
3आसा महला ५ ॥
4परमात्मा ने मेरे (माया संबंधी) बन्धन काट दिए हैं, मेरे अवगुण भुला दिए हैं और इस प्रकार अपने विरद् की पालना की है।
5वह माता-पिता की भाँति मुझ पर कृपालु हुए हैं और उन्होंने अपनी संतान की भाँति मेरा पालन-पोषण किया है॥ १॥
6गुरु-परमेश्वर ने अपने सिक्खों की रक्षा की है और
7अपनी दया-दृष्टि से देखकर उन्हें विषम संसार-सागर में से बाहर निकाल लिया है॥ १॥ रहाउ॥
8जिस परमात्मा का सुमिरन करने से हमें मृत्यु से मुक्ति मिल जाती है और लोक-परलोक में सुख मिलता है,
9हे भाई ! प्रत्येक सांस एवं ग्रास द्वारा प्रभु नाम का रसना से जाप जपते रहना चाहिए और नित्य ही उसका गुणगान करना चाहिए॥ २॥
10प्रभु की प्रेम-भक्ति से मुझे परम पद मिल गया है और साधु की संगति से दुख दूर हो गए हैं।
11मैंने निर्मल हरि नाम रूपी धन अपनी गांठ में बांध लिया है। इस हरि नाम रूपी धन का कभी नाश नहीं होता, न ही यह कहीं गुम होता है और न ही इसे चोर इत्यादि का डर होता है॥ ३॥
12लोक-परलोक में रक्षा करने वाला प्रभु अन्तकाल तक सहायक होता है।
13प्रभु ही मेरे प्राण, मित्र, शुभचिंतक एवं धन-दौलत है। हे नानक ! मैं सदा ही उस पर कुर्बान जाता हूँ॥ ४॥ ६॥ ४५॥
14आसा महला ५ ॥
15हे परमपिता ! जब तू मेरा मालिक है तो फिर मुझे डर कैसा ? तेरे अलावा मैं किसकी स्तुति करूँ?
16जब एक तू ही मेरा है, तो मेरे पास सब कुछ है तेरे सिवाय मेरा अन्य कोई नहीं॥ १॥
17हे बाबा ! मैंने देख लिया है कि यह संसार विष रूप है।
18हे गुसाई ! मेरी रक्षा कीजिए, तेरा नाम ही मेरे जीवन का आधार है॥ १॥ रहाउ॥
19हे नाथ ! तुम मेरे मन की हरेक अवस्था जानते हो। इसलिए, मैं किसके पास जाकर इसे कहूँ एवं सुनाऊँ ?
20नाम के बिना समूचा जगत बावला हो गया है। यदि प्रभु नाम मिल जाए तो यह सुख पाता है॥ २॥
21मैं क्या कहूँ? मैं अपनी अवस्था किसे बताऊँ ? जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ, वह मैं अपने प्रभु जी के पास कहता हूँ।
22हे मालिक ! जो कुछ तुमने किया है, जगत में सब कुछ तेरा किया ही हो रहा है। मुझे सदैव ही तेरी आशा है॥ ३॥
23यदि तुम मान-प्रतिष्ठा प्रदान करते हो तो यह तेरी मान-प्रतिष्ठा है। लोक-परलोक में मैं तुझे ही याद करता हूँ।
24नानक का प्रभु सदैव ही सुखदाता है। मेरा बल एक तेरा ही नाम है॥ ४॥ ७॥ ४६ ॥
25आसा महला ५ ॥
26हे मेरे ठाकुर ! तेरा नाम अमृत है और यह महा रस तेरे सेवक ने पान किया है।
27मेरे जन्म-जन्मांतरों के पापों का भयानक बोझ नाश हो गया है और छैतवाद की दुविधा भी चली गई है॥ १॥
28हे मालिक ! तेरे दर्शन करके मैं जीवित रहता हूँ।
29हे मेरे सच्चे गुरु ! तेरे वचन सुनने से मेरा मन एवं तन शीतल हो गए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
30हे परमेश्वर ! तेरी कृपा से मुझे साधसंगत मिली है और यह शुभ कार्य तूने स्वयं ही किया है।
31मैंने तेरे चरण कसकर पकड़ लिए हैं और माया का विष सहज ही दूर हो गया है॥ २॥
32हे प्रभु! तेरा नाम सुखों का भण्डार है। यह अमर मंत्र मैंने गुरदेव से प्राप्त किया है।
33अपनी कृपा करके सतिगुरु ने मुझे यह (मंत्र) प्रदान किया है और मेरा ताप-संताप एवं शत्रु नाश हो गए हैं।॥ ३॥
34यह मानव-शरीर जो मुझे मिला है वह धन्य है, क्योंकि इसकी बदौलत ही मेरे प्रभु ने मुझे अपने साथ मिला लिया है।
35यह कलियुग का समय धन्य है जिसमें साधसंगत में प्रभु का भजन किया जाता है। हे नानक ! प्रभु का नाम ही मेरे हृदय का आधार है॥ ४ ॥ ८॥ ४७ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं