गुरु ग्रंथ साहिब 380 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1अपने मुँह से वह इस प्रकार व्यर्थ बकवास करता है कि मैं हर किसी को जान से मार, बांध एवं मुक्त कर सकता हूँ
2परन्तु जब परमात्मा का हुक्म आता है तो वह सबकुछ छोड़कर एक दिन संसार से चला जाता है॥ २॥
3मनुष्य अनेक युक्तियों द्वारा कर्म-धर्म करता है परन्तु रचयिता प्रभु को नहीं जानता।
4वह दूसरों को उपदेश करता है परन्तु खुद अनुसरण नहीं करता, वह शब्द के रहस्य को नहीं पहचानता।
5वह नग्न ही इस जगत में आया था और नग्न ही चला जाएगा, उसका धर्म-कर्म हाथी स्नान की तरह व्यर्थ है जैसे हाथी (स्नान करने के पश्चात् अपने ऊपर) मिट्टी डाल लेता है॥ ३॥
6हे संतजनो, हे सज्जनो ! हे मित्रो ! सभी सुन लो यह समूचा जगत प्रसार झूठा है।
7मेरा-मेरा करते हुए अनेक मनुष्य (संसार सागर में) डूब गए हैं और मूर्ख खप-खप कर मर गए हैं।
8हे नानक ! गुरु से मिलकर मैंने प्रभु नाम का ध्यान किया है और सत्यनाम द्वारा मेरा उद्धार हो गया है॥ ४॥ १॥ ३८ ॥
9रागु आसा घरु ५ महला ५
10ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
11जगत के धन्धों में अन्धी हो चुकी दुनिया माया के भ्रम में सोई हुई है।
12लेकिन कोई विरला प्रभु का भक्त ही जागता है॥ १॥
13दुनिया महा-मोहिनी माया के मोह में मग्न है और इसे माया का प्रेम अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय है।
14कोई विरला मनुष्य ही माया के आकर्षण को त्यागता है॥ २॥
15प्रभु के चरण कमल अनूप हैं और हरि के संतों का मंत्र भी सुन्दर है।
16कोई विरला साधु ही उनके साथ संलग्न होता है।॥ ३॥
17हे नानक ! सत्संगति में आकर ज्ञान के रंग में रंगकर वह जागता रहता है
18यदि किसी भाग्यशाली पुरुष पर भगवान की कृपा हो जाए। ४॥ १॥ ३६ ॥
19ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
20रागु आसा घरु ६ महला ५ ॥
21हे स्वामी ! जो कुछ तुझे उपयुक्त लगता है, वही हमें मंजूर है और तेरी इच्छा ही हमारे हृदय में सहज सुख प्रदान करती है।
22तू सबकुछ करने एवं करवाने में समर्थ है, हे प्रभु ! तेरे अलावा दूसरा समर्थ कोई नहीं ॥ १॥
23हे प्रभु ! तेरे सेवक प्रेम से तेरा गुणगान करते हैं।
24हे नाथ ! जो कुछ तुम करते अथवा करवाते हो, वही तेरे भक्तों हेतु सर्वोत्तम सलाह, इरादा एवं बुद्धिमत्ता है॥ १॥ रहाउ॥
25हे मेरे प्रियतम ! तेरा नाम अमृत के तुल्य है और साधसंगति में मैंने इस अमृत रस को प्राप्त किया है।
26जो जीव सुखनिधान हरि का गुणगान करते हैं वे पूर्ण होकर तृप्त एवं संतुष्ट रहते हैं।॥ २॥
27हे स्वामी ! जिसे तेरा सहारा मिल गया है, उसे कोई चिन्ता नहीं रहती।
28हे भगवान् ! जिस पर तुम अपनी दया करते हो, वे (नाम-धन से) भले साहूकार एवं भाग्यशाली हैं।॥ ३॥
29हे दुनिया बनाने वाले ! जब से मैंने तेरे दर्शन किए हैं, (मेरी) दुविधा, मोह एवं छल-कपट सब नष्ट हो गए हैं।
30हे नानक ! मैंने सत्य नाम को अपनी दिनचर्या बना लिया है और में हरि नाम के रंग में समा गया हूँ॥ ४॥ १॥ ४०॥
31आसा महला ५ ॥
32निन्दक व्यक्ति दूसरों के जन्म-जन्मांतरों के विकारों की मैल धोता है और अपने किए कर्मो का फल भोगता है।
33यहाँ (इहलोक में) उसे सुख नहीं और न ही उसे प्रभु के दरबार में निवास मिलता है। उसे यमपुरी में पीड़ित किया जाता है॥ १॥
34निन्दा करने वाला अपना मूल्यवान मानव-जीवन व्यर्थ ही गंवा लेता है।
35वह किसी भी बात में सफल नहीं हो सकता और आगे भी उसे कोई स्थान नहीं मिलता॥ १॥ रहाउ॥
36बेचारे निन्दक को अपने किए पूर्व-जन्मों के कर्मो का फल मिलता है लेकिन बेचारे निन्दक के भी वश की बात नहीं।
37वह वहाँ नष्ट हुआ है, जहाँ उसकी कोई रक्षा नहीं कर सकता। वह किसके समक्ष पुकार करे ? ॥२॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं