सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 37 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1सतिगुरु के बिना परमात्मा को किसी ने भी नहीं पाया, बेशक अपने हृदय में विचार करके देख लो।

2जब तक जीव गुरु के उपदेश से प्रीति नहीं करता, अर्थात् अपना मन गुरु के उपदेश में नहीं टिकाता, ऐसे मनमुख के हृदय से तब तक विषय-विकारों की मैल नष्ट नहीं होती ॥ १ ॥

3हे मेरे मन ! तुम सतगुरु की इच्छानुसार चलो

4तभी तुम निज स्वरूप में रह कर नामामृत पान कर सकोगे तथा सुख धाम को प्राप्त करोगे॥ १॥ रहाउ॥

5जिस जीव में अवगुण ही विद्यमान हैं, कोई भी गुण नहीं है, उनको प्रभु के सम्मुख बैठने का अवसर प्राप्त नहीं होता।

6ऐसे स्वेच्छाचारी जीव गुरु के उपदेश को नहीं जानते तथा अवगुणों के कारण वह परमात्मा से दूर रहते हैं।

7जिन्होंने सत्य-नाम को पहचाना है, वे उस सत्य-स्वरूप में पूर्ण-रूपेण अनुरक्त हैं।

8उनका हृदय गुरु के उपदेश में विंधा गया है तथा परमात्मा उन्हें स्वयं प्रत्यक्ष रूप में मिला है॥ २॥

9प्रभु ने स्वयं ही जीवों को अपने रंग में रंगा है तथा गुरु-उपदेश द्वारा अपने साथ मिला लिया है,

10जो लिवलीन होकर सत्य परमात्मा में जुड़े हैं, उनका नाम रूपी सत्य रंग नहीं उतरता।

11स्वेच्छाचारी जीव सम्पूर्ण सृष्टि में भटकता हुआ थक जाए, किन्तु उन्हें कहीं से भी परमात्मा का रहस्य पता नहीं चल सकता।

12जिस जीव को सत्य गुरु मिलाता है, वही मिल पाता है, वह सत्य ब्रह्म में अभेद हो जाता है ॥ ३॥

13जीव रूपी स्त्री कहती है कि मैं संसार में अनेकानेक व्यक्तियों को मित्र बना-बना कर थक गई हूँ कि कोई तो मेरा दुख निवृत्त करे।

14अंततः प्रियतम प्रभु से मिल कर दुख निवृत्त होता है, जिसका मिलन गुरु उपदेश द्वारा ही संभव है।

15सत्य श्रद्धा रूपी पूँजी द्वारा जिसने सत्य-नाम रूपी पदार्थ को कमाया है, उस सत्य की सत्य शोभा होती है।

16नानक देव जी कथन करते हैं कि जो जीव गुरुमुख बनकर सत्य स्वरूप में समाए हैं, फिर वे कभी भी सत्य-स्वरूप से बिछुड़ते नहीं हैं। ४॥ २६॥ ५९ ॥

17श्रीरागु महला ३ ॥

18परमात्मा स्वयं ही कारण एवं स्वयं ही कर्ता है, जो सृष्टि को उत्पन्न करता है और उसकी परवरिश करता है।

19समस्त प्राणियों में वह एक ही विद्यमान है, पुनः वह अलक्ष्य भी है जो समझा नहीं जा सकता।

20स्वयं परमात्मा दयालु भी है जो अपनी कृपा-दृष्टि से अपना स्वरूप समझा भी देता है।

21गुरु के उपदेश द्वारा जिन जीवों के मन में वह परमात्मा व्याप्त रहता है, वे उस सत्य स्वरूप में सदा लीन रहते हैं।॥ १॥

22हे मेरे मन ! तुम गुरु की आज्ञा मान कर चलो।

23ऐसा करने से तन-मन शांत हो जाता है और मन में नाम आकर बस जाता है।॥ १॥ रहाउ॥

24जिस प्रभु ने इस सृष्टि को मूल रूप से रच कर सम्भाल रखा है, वही इसका ध्यान रखता है।

25यदि गुरु के उपदेश को पहचानें, तभी वह परमेश्वर स्वयं कृपा-दृष्टि करता है

26वह मानव जीवं गुरु उपेदश द्वारा ही उस सत्य परमात्मा के द्वार पर शोभनीय होते हैं।

27गुरमुख जीव उस सत्य उपदेश में लीन रहते हैं, उन जीवों को कर्ता पुरुष (परमात्मा) ने अपने श्री चरणों से जोड़ा है ॥२ ॥

28हे जीव गुरु का उपदेश ग्रहण कर के  उस सत्य स्वरूप परमात्मा का गुणगान करो, जिसके गुणों की कोई सीमा नहीं है।

29सर्वव्यापक परमेश्वर अपने ही आदेश से प्रत्येक ह्रदय में विद्यमान होता तथा अपने आदेश द्वारा ही जीवों की पालना का विचार करता है।

30हे मानव ! गुरु उपदेश द्वारा अपने हृदय में से अहंकार को त्याग कर उस सर्व-सम्पन्न  परमात्मा की स्तुति करो।

31जो नाम-विहीन जीव रूपी स्त्री है। वह अवगुणों वाली रोती रहती है॥ ३॥

32मैं सत्य स्वरूप परमात्मा का चिन्तन करूँ, सत्य में लीन रहूँ तथा सत्य-नाम द्वारा तृप्त रहूँ।

33शुभ गुणों का विचार करूं, शुभ गुणों को ही एकत्र करूँ, अवगुणों की मैल को नाम-जल से धोकर बाहर निकाल दूँ।

34तब परमेश्वर स्वयं ही मिला लेता है और पुनः वियोग नहीं होता।

35नानक देव जी कथन करते हैं कि अपने पूर्ण गुरु की श्लाघा करूं, जिनके द्वारा वह प्रभु प्राप्त होता है॥ ४॥ २७ ॥६०॥

36श्रीरागु महला ३ ॥

37हे कामना में ग्रस्त जीव-रूपी स्त्री ! सुनो, तुम बांहे उलार-उलार कर क्यों चलती हो ?

38इस लोक में तो तुम अपने पति-परमात्मा को पहचानती नहीं, आगे परलोक में जाकर क्या मुँह दिखाओगी ?

39जिस ज्ञानवान सखी ने अपने पति-परमात्मा को पहचान लिया है, गुरु जी कहते हैं कि मैं उनके पांव लगती हूँ।

40मैं उनके सत्संग के मिलन द्वारा उनके जैसी ही हो जाऊँ॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं