गुरु ग्रंथ साहिब 379 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1उसका दुख-दर्द दूर हो जाता है और फिर कभी दु:खी नहीं होती ॥ १॥ रहाउ॥
2अपनी कृपा करके प्रभु उसे अपने चरणों से मिला लेता है और
3वह सहज सुख एवं आनंद प्राप्त कर लेती है तथा सदा के लिए सुखी होती है॥ १॥
4साधसंगति के भीतर वह प्रभु का यशोगान करके अतुलनीय हो जाती है।
5हे नानक ! हरि का ध्यान करने से वह मूल्यवान हो जाती है। ॥२॥ ३५॥
6आसा महला ५ ॥
7(हे बन्धु!) काम, क्रोध, मोह-माया का अभिमान एवं ईष्या इत्यादि विकार मैंने जुए के खेल में हार दिए हैं।
8सत्य, संतोष, दया, धर्म एवं सच्चाई को मैंने अपने ह्रदय घर में प्रविष्ट कर लिया है॥१ ॥
9इसलिए मेरे जन्म-मरण के तमाम बोझ उतर गए हैं।
10सत्संगति में शामिल होकर मेरा मन निर्मल हो गया है। पूर्ण गुरु ने एक क्षण में ही मेरा संसार-सागर से उद्धार कर दिया है॥ १ ॥ रहाउ ॥
11मेरा मन सबकी चरण-धूलि हो गया है। हर कोई अब मुझे अपना प्यारा मित्र दिखाई देता है।
12मेरा ठाकुर प्रभु सब में बसा हुआ है। वह समस्त जीवों को दान देकर उनकी परवरिश करता है॥ २॥
13प्रभु एक है और वह एक ही सब जीवों में बना रहता है। इस समूचे जगत का विस्तार उस एक ईश्वर का ही है।
14प्रभु का जाप एवं ध्यान करके सभी साध पुरुष बन गए हैं। उस एक ईश्वर के नाम की आराधना करने से अनेकों का उद्धार हो गया है॥ ३॥
15सृष्टि का मालिक गहरा, गंभीर एवं अनन्त है। प्रभु के अन्त का पारावर नहीं पाया जा सकता।
16हे प्रभु ! तेरी कृपा से नानक तेरा गुणगान करता है और बार-बार तेरा ध्यान करके वह तुझे प्रणाम करता है॥ ४॥ ३६॥
17आसा महला ५ ॥
18हे सबके मालिक ! तू अनन्त, अव्यक्त एवं अगोचर है और यह समूचा जगत तेरा आकार है।
19हम जीव भला क्या चतुराई कर सकते हैं, जब सबकुछ तुझ में ही है॥ १॥
20हे मेरे सतगुरु ! अपने बालक की अपनी जगत लीला के अनुसार रक्षा कीजिए।
21हे मेरे अगम्य, अपार ठाकुर ! मुझे सुमति प्रदान कीजिए तांकि मैं सदा तेरा गुणगान करता रहूँ॥ १॥ रहाउ॥
22जैसे जननी के गर्भ में प्राणी रहता तो है किन्तु प्रभु-नाम के सहारे जीवित बना रहता है।
23वह गर्भ में आनन्द करता है और श्वास-श्वास से प्रभु को याद करता है और जठराग्नि उसे स्पर्श नहीं करती ॥ २॥
24हे प्राणी ! तू पराया-धन, पराई नारी एवं पराई निन्दा में लगाए हुए स्नेह को त्याग दे।
25पूर्ण गुरु का सहारा लेकर अपने अन्तर में प्रभु के चरण कमल की उपासना कर ॥ ३॥
26घर, मन्दिर महल जो कुछ भी दिखाई देता है, इनमें से कोई भी तेरे साथ नहीं जाना।
27जब तक तू इस घनघोर कलियुग में जीवित है, हे नानक ! तू प्रभु के नाम का ध्यान करता रह॥ ४॥ ३७ ॥
28आसा महला ५ ॥
29ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
30राज्य, सम्पति, यौवन, घर, शोभा, रूपवंत जवानी,
31अत्याधिक धन, हाथी, घोड़े और लाखों रुपयों के मूल्य वाले जवाहरात लाल इत्यादि
32आगे ईश्वर के दरबार में किसी काम नहीं आते, अभिमानी मनुष्य इसे (इहलोक) यहीं छोड़कर चला जाता है।॥ १॥
33एक ईश्वर के अतिरिक्त तुम अपना मन क्यों किसी दूसरे के साथ लगाते हो ?
34उठते-बैठते, सोते-जागते सदा सदा ही हरि का ध्यान करते रहना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥
35यदि कोई मनुष्य महा विचित्र सुन्दर अखाड़े जीतता है, यदि वह रणभूमि में जाकर युद्ध जीतता है और
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं