सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 374 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1हे जीव रूपी नारी ! सर्वप्रथम, तेरी जाति कुलीन है।

2द्वितीय, तेरा वंश भी महान् माना जाता है।

3तृतीय, तेरा निवास स्थान अति सुन्दर है परन्तु

4तेरा रूप कुरूप ही रहा क्योंकि तेरे मन में अभिमान है॥ १॥

5हे सुन्दर स्वरूप वाली, बुद्धिमान एवं चतुर नारी !

6तू अत्यंत अहंकार एवं मोह-माया में फँसी हुई है॥ १॥ रहाउ॥

7(हे जीव रूपी नारी !) तेरी पाकशाला अर्थात् रसोई बड़ी पावन है।

8तुम स्नान करके पूजा भी करती हो एवं माथे पर लाल तिलक लगाती हो।

9अपने मुख से तुम ज्ञान की बातें करती हो परन्तु अभिमान ने तुझे नष्ट कर दिया है।

10यह भी सत्य है कि लालच रूपी कुते ने तेरी हर प्रकार की बड़ाई को बर्बाद कर दिया है॥ २॥

11तुम सुन्दर वस्त्र धारण करती हो, भोग-विलास करती हो।

12संसार में शोभा पाने के लिए धर्म-कर्म करती हो।

13अपने शरीर पर इत्र, चन्दन एवं अन्य सुगन्धियां प्रयुक्त करती हो,

14लेकिन चाण्डाल क्रोध तेरा सदा खोटा साथी बना हुआ है॥ ३॥

15दूसरी तमाम योनियाँ तेरी दासी हैं।

16इस धरती पर तेरा ही प्रभुत्व कायम है।

17तेरे पास सोना-चांदी इत्यादि धन पदार्थ हैं लेकिन

18कामवासना ने तेरा शील भ्रष्ट कर दिया है॥ ४॥

19जिस पर भगवान कृपादृष्टि करता है,

20वह (विकारों की) कैद से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।

21जो सत्संगति में सम्मिलित होकर हरि-रस का आस्वादन करती है॥ ५॥

22हे नानक ! वही काया सफल है

23हे जीव रूपी नारी ! तब तुम समस्त रूप एवं समस्त सुखों वाली सुहागिन बन जाओगी।

24तब तुम सचमुच अत्यंत सुन्दर एवं चतुर बन जाओगी ॥ १॥ रहाउ दूसरा ॥ १२ ॥

25आसा महला ५ इकतुके २ ॥

26जो व्यक्ति (मोह-माया में फँसा) जीवित दिखाई देता है, उसने निश्चित ही मर जाना है।

27लेकिन जो व्यक्ति मोह-माया से निर्लिप्त है, वह सदैव ही स्थिर रहेगा।॥ १ ॥

28जो लोग अभिमान में जीवित रहते हैं दरअसल वे मरे हुए हैं और जो लोग अपना अभिमान समाप्त कर देते हैं, वास्तव में वही जिन्दा हैं।

29वे हरि-नाम की औषधि अपने मुँह में रखते हैं और गुरु-शब्द के माध्यमसे वह अमर करने वाले अमृत रस का पान करते हैं॥ १॥ रहाउ॥

30यह देहि रूपी कच्चा घड़ा अवश्य ही टूट जाएगा।

31लेकिन जिस मनुष्य की रजो, तमो एवं सतो गुण की त्रिकुटी रूपी कैद से मुक्ति हो गई है, वह अपने आत्मस्वरूप में निवास करता है॥ २॥

32जो अत्यंत ऊँचा चढ़ता है अर्थात् अभिमान करता है, ऐसा अभिमानी आखिरकार पाताल में ही गिरता है।

33जो मनुष्य धरती पर गिरे हुए अर्थात् विनम्रतापूर्वक रहते हैं उन्हें काल स्पर्श नहीं कर सकता॥ ३॥

34जो मनुष्य भटकते रहते हैं, उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

35लेकिन जिन्होंने गुरु के शब्द का आचरण किया है, वे स्थिरचित रहते हैं।॥ ४॥

36हे नानक ! यह प्राण एवं शरीर सब ईश्वर का ही माल हैं,

37गुरु से मिलकर मनुष्य आनंदित हो गए हैं॥ ५॥ १३॥

38आसा महला ५ ॥

39हे मानव ! तेरी यह शरीर रूपी पुतली की संरचना अति बुद्धिमत्ता से हुई है परन्तु

40तू यह बात सत्य जान कि इसने (एक दिन) मिट्टी हो जाना है॥ १॥

41हे मूर्ख गंवार ! अपने मूल परमात्मा को याद कर।

42अपने इस तुच्छ वजूद वाले शरीर का क्यों अभिमान करते हो।॥ १॥ रहाउ॥

43तू इस दुनिया में एक अतिथि है, जिसे रोजाना तीन सेर अन्न खाने को मिलता है।

44अन्य सभी वस्तुएँ तेरे पास धरोहर रूप में रखी हुई हैं।॥ २॥

45तुम विष्टा, हड्डियों, रक्त एवं चमड़ी में लपेटे हुए हो।

46लेकिन तुम इस पर ही घमण्ड कर रहे हो॥ ३॥

47यदि तुम एक नाम रूपी वस्तु का बोध कर लोगे तो तुम पवित्र-जीवन वाले हो जाओगे।

48प्रभु-नाम की सूझ बिना तुम सदैव ही नापाक हो।॥ ४॥

49हे नानक ! मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ

50जिसके माध्यम से सर्वज्ञ परमात्मा मिलता है।॥ ५॥ १४॥

51आसा महला ५ इकतुके चउपदे ॥

52परमेश्वर से वियोग की एक घड़ी भी दिन में मेरे लिए बहुत दिनों के समान है।

53मेरा मन उसके बिना रह नहीं सकता। फिर मैं अपने प्रियतम से कैसे मिलूगी॥ १॥

54दिन में एक क्षण भी ईश्वर से जुदा होकर व्यतीत नहीं होता।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं