सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 373 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1हरि-परमेश्वर का गुणानुवाद करने से मेरा मन निर्मल हो गया है और मेरे तन से दुःख-रोग मिट गए हैं।

2साधु की संगति में शामिल होकर मैं आनंदित हो गया हूँ और अब मेरा मन कहीं भी नहीं भटकता ॥ १॥

3हे मेरी माता ! गुरु-शब्द द्वारा मेरी जलन बुझ गई है।

4मेरे तमाम दुख-क्लेश एवं संताप नाश हो गए हैं और अब मुझे शीतल सतिगुरु सहज स्वभाव मिल गया है। १॥ रहाउ॥

5एक ईश्वर का बोध होने से मेरा भटकना खत्म हो गया है और अब मैं अटल स्थान पर रहता हूँ।

6हे प्रभु ! तेरे साधु जगत का उद्धार करने वाले हैं। उनके दर्शन करके मैं तृप्त हो गया हूँ॥ २॥

7अनेक जन्मों के दोषों से मेरी मुक्ति हो गई है और अब अटल साधु के चरण पकड़ लिए हैं।

8अब मेरा मन सहज ही प्रभु के यश की धुनि का गायन करता है और

9अब काल इसे दोबारा नहीं खाएगा ॥ ३॥

10हे मेरे हरि परमेश्वर ! तू मुझे सुख देने वाला है और तू ही सबकुछ करने एवं कराने में समर्थावान है।

11नानक तेरा नाम जप-जप कर ही आत्मिक जीवन प्राप्त करता है, तुम मेरी सहायता करने वाले इस तरह हो जैसे ताने-याने में धागा मिला होता है वैसे ही मेरे संग रहते हो ॥ ४ ॥ ६ ॥

12आसा महला ५ ॥

13(साधु-संतों की) निंदा करने वाला मनुष्य बहुत चीखता-चिल्लाता एवं विलाप करता है।

14निंदक ने परब्रह्म-परमेश्वर को विस्मृत कर दिया है जिसके परिणामस्वरूप वह अपने किए कर्मो का फल भोग रहा है॥ १॥ रहाउ॥

15(हे भाई !) यदि कोई पुरुष उस निंदक का संगी बने तो वह निंदक उसे भी अपने साथ (नरककुण्ड में) डूबो लेता है।

16निंदक अजगर के भार के समान अनन्त बोझ उठाए फिरता है और अपने आपको निन्दा की अग्नि में सदैव जलाता है॥ १॥

17जो कुछ परमेश्वर के द्वार पर होता है, नानक वही बात कहकर सुनाता है।

18भक्तजन हमेशा आनंद में रहते हैं। चूंकि हरि का कीर्ति-गान करने से वे सदा प्रसन्न रहते हैं।॥ २॥ १०॥

19आसा महला ५ ॥

20मैंने बहुत सारे हार-श्रृंगार किए हैं

21फिर भी मेरा मन तृप्त नहीं हुआ।

22मैं अनेक सुगंधियाँ अपने शरीर पर लगाती हूँ परन्तु

23उस सुख को मैं तिलमात्र भी प्राप्त नहीं करती हूँ।

24हे मेरी माँ! मैंने अपने हृदय में ऐसी आशा धारण की है कि

25अपने प्रियतम-प्रभु को देख कर मैं जीवित रहूँ॥ १॥

26हे मेरी माँ! मैं क्या करूं ? मेरा यह मन धैर्य धारण नहीं करता।

27मेरे प्रियतम-प्रभु का वैराग्य अर्थात् मिलन की तड़प मुझे आकर्षित कर रही है॥ १॥ रहाउ॥

28सुन्दर वस्त्र, आभूषण एवं बहुत सारे ऐश्वर्य-वैभव

29उनको भी में किसी हिसाब में नहीं जानती।

30आदर, शोभा, महानता एवं मान-प्रतिष्ठा,

31सारा संसार मेरी आज्ञा में चले,

32अति सुन्दर एवं अमूल्य घर मिले तो भी

33सदैव प्रसन्न तभी रह सकती हूँ यदि प्रियतम-प्रभु को अच्छी लगूं॥ २॥

34यदि अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन-भोजन मिलें,

35विभिन्न प्रकार के रंग-तमाशे देखने को मिलें,

36यदि राज्य मिले, धरती का प्रभुत्व प्राप्त हो और बहुत हुकूमत भी मिले तो भी

37यह मन तृप्त नहीं होता और इसकी तृष्णा नहीं मिटती।

38पति-परमेश्वर से मिले बिना यह दिन व्यतीत नहीं होता।

39यदि पति-परमेश्वर मिल जाए तो सर्व सुख प्राप्त हो जाते हैं।॥ ३॥

40खोजते-खोजते मुझे यह खबर मिली है कि

41सत्संगति के बिना कोई भी मनुष्य पार नहीं हो सका।

42जिसके मस्तक पर भाग्य उदय हो, वह सतिगुरु को पा लेता है।

43फिर उसकी आशा पूर्ण हो जाती है और मन भी तृप्त हो जाता है।

44जब प्रभु मिल जाता है तो सारी जलन एवं प्यास बुझ जाती है।

45हे नानक ! उस परब्रह्म-प्रभु को मैंने मन-तन में प्राप्त कर लिया है॥ ४ ॥ ११॥

46आसा महला ५ पंचपदे ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं