गुरु ग्रंथ साहिब 370 · Raag Aasaa · Guru Raam Daas Ji
1हे प्यारे जगदीश्वर ! मुझे अपनी शरण में रखें। हे हरि गोसाई ! मेरी श्रद्धा पूर्ण करो।
2नानक का हृदय आनंद से भरपूर हो जाता है, जब एक क्षण भर के लिए भी हरि अपना दर्शन करवा देता है॥२॥३९॥१३॥१५॥६७॥
3रागु आसा घरु २ महला ५
4ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
5जिसने भी माया के साथ प्रेम लगाया है, यह उसे ही अंततः खा गई है।
6जिसने इसे सुखपूर्वक बैठाया है, उसे ही इसने अत्यंत भयभीत किया है।
7भाई, मित्र एवं कुटुंब के सदस्य इसे देखकर परस्पर विवाद एवं झगड़ा उत्पन्न करते हैं
8परन्तु गुरु की कृपा से यह मेरे वश में आ गई है॥ १॥
9इसे ऐसा मीठा देखकर सभी मुग्ध हो जाते हैं।
10इस ठगिनी माया ने गुरु के सिवाय साधक,सिद्ध, देवते एवं मनुष्य इत्यादि सबको ठग लिया है॥ १॥ रहाउ॥
11कई उदासी बन कर भटकते फिरते हैं परन्तु कामवासना उन्हें दुखी करती है।
12कई गृहस्थी बनकर माया-धन को संचित करते हैं परन्तु यह उनकी अपनी नहीं बनती।
13जो अपने आपको दानी कहलवाते हैं यह उनको भी बहुत सताती है।
14लेकिन ईश्वर ने मुझे सतिगुरु के चरणों से लगाकर इससे बचा लिया है॥ २॥
15तपस्यारत तपस्वी भी इसके कारण कुमार्गगामी हो जाते हैं।
16समस्त पण्डित भी लोभ में फँसकर मोहित गए।
17इस माया ने समस्त त्रैगुणी जीवों को भी आकर्षित किया हुआ है और आकाश निवासी ठगे गए हैं।
18(लेकिन) सतिगुरु ने अपना हाथ देकर हमारी रक्षा की है॥ ३॥
19यह माया ब्रह्मज्ञानी समक्ष दासी जैसा व्यवहार करती है।
20वह हाथ जोड़कर उनकी सेवा करती है और प्रार्थना करती कि
21जो आप आज्ञा करेंगे मैं वही कार्य करूँगी।
22हे नानक ! माया कहती है कि मैं गुरुमुख के निकट नहीं आउंगी ॥ ४ ॥ १॥
23आसा महला ५ ॥
24पति-परमेश्वर ने माया रूपी सास से मुझे अलग कर दिया है।
25मेरी देवरानी (आशा) एवं जेठानी (तृष्णा) दुख एवं संताप से मर गई हैं।
26घर के जेठ (धर्मराज) की भी मैंने मोहताजी छोड़ दी है।
27मेरे चतुर एवं सर्वज्ञ पति-प्रभु ने मुझे बचा लिया है॥ १॥
28हे लोगो ! सुनो, मुझे प्रेम रस प्राप्त हो गया है।
29जिससे सतिगुरु ने मुझे हरि का नाम दिलवाया है। मैंने दुर्जनों को मार दिया है और कामादिक शत्रुओं का भी संहार कर दिया है॥ १॥ रहाउ॥
30सर्वप्रथम मैंने अहंकार का प्रेम त्याग दिया है।
31द्वितीय मैंने सांसारिक प्रपंचों की रस्मों को छोड़ दिया है।
32त्रिगुणों का त्याग करने से अब दुष्ट एवं मित्र एक समान लगने लगे हैं।
33संत रूपी गुरु को मिलकर मैंने तुरीय अवस्था के गुणों को पहचान लिया है॥ २ ॥
34मैंने परमानंद की गुफा में आसन लगा लिया है।
35ज्योतिस्वरूप परमात्मा ने अनहद नाद बजाया है।
36गुरु-शब्द का चिंतन करने से मुझे महा आनंद प्राप्त हुआ है।
37जो जीव स्त्री अपने प्रियतम के प्रेम रंग में लीन हो गई है वह सुहागिन नारी धन्य है॥ ३॥
38नानक ब्रह्म विचार की बात कर रहा है,
39जो इसे श्रवण करेगा और इसकी साधना करेगा, वह संसार-सागर से पार हो जाएगा।
40न ही वह जन्मता है और न ही मरता है, वह (सृष्टि में बार-बार) न आता है और न ही जाता है।
41वह सदैव हरि की स्मृति में लीन हुआ रहता है॥ ४॥ २॥
42आसा महला ५ ॥
43भगवान् की भक्ति वह शीलवान नारी है,
44जो अनुपम रूपवती एवं पूर्ण आचरणयुक्त है।
45जिस घर में वह रहती है, वह घर शोभावान हो जाता है।
46किसी विरले गुरुमुख को ही ऐसी नारी प्राप्त हुई है॥ १॥
47गुरु से मिलकर मुझे शुभ कर्मों वाली (भक्ति रूपी) नारी प्राप्त हुई है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं