गुरु ग्रंथ साहिब 366 · Raag Aasaa
1ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
2रागु आसा घरु २ महला ४ ॥
3किसी ने अपने मित्र, पुत्र अथवा भाई के साथ रिश्ता बनाया हुआ है और
4किसी ने अपने सगे-सम्बन्धी एवं दामाद के साथ रिश्ता बनाया हुआ है।
5किसी मनुष्य ने स्वार्थपूर्ति हेतु सरदारों एवं चौधरियों से रिश्तेदारी की हुई है।
6लेकिन मेरा रिश्ता सर्वव्यापक प्रभु के साथ है॥ १॥
7मैंने हरि के साथ रिश्तेदारी की है और हरि ही मेरा सहारा है।
8हरि के बिना मेरा अन्य कोई भी पक्ष एवं नाता नहीं है। मैं हरि के असंख्य गुणों का ही यशोगान करता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
9जिनके साथ रिश्तेदारी की जाती है, वह मर जाते हैं।
10झूठा नाता बनाकर मनुष्य अंत : पश्चाताप करते हैं।
11जो मनुष्य झूठ का आचरण करते हैं, वे स्थिर नहीं रहते।
12मैंने हरि से नाता बनाया है, जिसके समान कोई भी समर्थशाली नहीं ॥ २॥
13यह तमाम रिश्तेदारियां माया के मोह का प्रसार है।
14मूर्ख लोग माया के लिए लड़ते झगड़ते हैं।
15वह जन्म-मरण के वश में हैं और जुए में अपनी जीवन बाजी हार जाते हैं।
16हरि से ही मेरा नाता है, जो मेरे लोक-परलोक सब संवार देता है॥ ३॥
17कलियुग में जितने भी रिश्ते हैं ये पाँच विकार-काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अभिमान द्वारा उत्पन्न होते हैं।
18परिणामस्वरूप काम, क्रोध,लोभ, मोह एवं अभिमान अधिकतर बढ़ गए हैं।
19जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपा करता है, उसे सत्संगति में सम्मिलित कर देता है।
20मैं हरि के नाते में हूँ जिसने यह तमाम रिश्ते नाश कर दिए हैं।॥ ४॥
21झूठे सांसारिक मोह के माध्यम से लोग बैठकर गुटबन्दी करते हैं।
22वह दूसरों की कमजोरियों की निन्दा करते हैं और अपना अहंकार बढ़ाते हैं।
23वे जैसा बीज बोते हैं, वैसा ही फल खाते हैं।
24नानक ने हरि से नातेदारी की है, यह धर्म का नाता समूचे जगत को जीत लेता है॥५॥२॥५४॥
25आसा महला ४ ॥
26हृदय में सुन-सुनकर नामामृत मेरे मन को अच्छा लगने लग गया है।
27गुरुवाणी ने मुझे अदृश्य हरि के दर्शन करवा दिए हैं।॥ १॥
28हे मेरी सत्संगी बहनो ! गुरुमुख बनकर हरि का नाम सुनो।
29अनन्त प्रभु प्रत्येक हृदय में समा रहा है। अपने मुख से तुम सब अमृत वचन गुरुवाणी का जाप करो ॥ १॥ रहाउ॥
30मेरे मन एवं तन में प्रभु प्रेम एवं महा वैराग्य है।
31सौभाग्य से मुझे महापुरुष सतिगुरु मिल गया है॥ २॥
32द्वैतभाव के कारण मनुष्य का मन विषैली माया के पीछे भटकता है |
33भाग्यहीन व्यक्ति को सतिगुरु नहीं मिलता।॥ ३॥
34परमात्मा स्वयं ही मनुष्य को अमृत रूपी हरि-रस का पान करवाता है।
35हे नानक ! पूर्ण गुरु के द्वारा मैंने ईश्वर को पा लिया है॥ ४॥ ३॥५५॥
36आसा महला ४ ॥
37मेरे मन एवं तन में हरि नाम का ही प्रेम बना हुआ है, जो मेरे जीवन का आधार है।
38मैं नाम का सुमिरन करता हूँ, क्योंकि हरि का नाम सुखों का सार-तत्व है॥ १॥
39हे मेरे मित्रो एवं सज्जनो ! हरि-नाम का जाप करो।
40हरि-नाम के बिना मेरे पास कुछ भी नहीं। बड़े सौभाग्य से मुझे गुरु के सम्मुख होकर हरि का नाम प्राप्त हुआ है॥ १॥ रहाउ॥
41नाम के बिना जीना असंभव है।
42बड़े भाग्य से ही गुरु के माध्यम से ईश्वर प्राप्त होता है॥ २॥
43नामहीन मनुष्य के मुख पर माया की कालिख है।
44हरि नाम के बिना यह जीवन धिक्कार योग्य है॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं