सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 365 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji

1सच्ची भक्ति यह है कि परमात्मा का दास जीवन के अहंत्व के प्रति मर जाए।

2गुरु की कृपा से ऐसा दास संसार सागर से पार हो जाता है।

3गुरु के वचन द्वारा की हुई भक्ति सफल हो जाती है।

4पूज्य परमेश्वर स्वयं आकर हृदय में बस जाता है॥ ४॥

5जब प्रभु कृपा धारण करता है तो वह मनुष्य को सतिगुरु से मिला देता है।

6तब उसकी भक्ति अटल हो जाती है और वह ईश्वर से अपना चित्त लगा लेता है।

7जो मनुष्य प्रभु की भक्ति में रंगे हुए हैं, उनकी शोभा भी सच्ची है।

8हे नानक ! नाम में अनुरक्त होने से ही मनुष्य को सुख प्राप्त होता है। ॥५॥१२॥५१॥

9आसा घरु ८ काफी महला ३

10ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

11हरि की इच्छा से ही सतिगुरु मिलता है और सत्य की सूझ प्राप्त होती है।

12गुरु की कृपा से जिसके हृदय में नाम निवास करता है, वह प्रभु को समझ लेता है॥ १॥

13एक पति-प्रभु ही मेरा मालिक एवं दाता है और उसके सिवाय कोई नहीं।

14गुरु की कृपा से जब वह मन में निवास करता है तो सदा सुख मिलता है॥ १॥ रहाउ॥

15इस युग में निर्भय करने वाला हरि का नाम है और गुरु के विचार अर्थात् उपदेश द्वारा ही यह प्राप्त होता है।

16नामविहीन मनुष्य यमदूत के वश में रहता है और ऐसे स्वेच्छाचारी मनुष्य को अन्धा एवं मूर्ख कहा जाता है।॥ २॥

17जो सेवक हरि की इच्छा मान कर सेवा करता है, वह सत्य को समझ लेता है।

18हरि की इच्छा में ही उसका ध्यान करना चाहिए, क्योंकि उसकी इच्छा मानने से सुख प्राप्त होता है॥ ३॥

19हरि की इच्छा में ही मानव-जन्म रूपी उत्तम पदार्थ मिलता है और बुद्धि भी श्रेष्ठ हो जाती है।

20हे नानक ! तू प्रभु-नाम की स्तुति कर क्योंकि गुरुमुख बनकर ही गति प्राप्त होगी॥ ४॥ ३६ ॥ १३॥ ५२ ॥

21आसा महला ४ घरु २

22ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

23हे मालिक ! तू जगत का रचयिता है, तू सदैव सत्य है और

24जो तुझे अच्छा लगता है, केवल वही होता है। जो कुछ तुम मुझे देते हो, मैं वही प्राप्त करता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

25यह सारी दुनिया तेरी पैदा की हुई है और सब जीव तुझे ही याद करते हैं।

26जिस पर तुम दया धारण करते हो, वह तेरे नाम-रत्न को पा लेता है।

27गुरुमुख व्यक्ति नाम प्राप्त कर लेते हैं और स्वेच्छाचारी व्यक्ति इसे गंवा देते हैं।

28सच तो यही है कि तूने स्वयं ही जीवों को खुद से जुदा किया है और स्वयं ही भक्तगणों को अपने साथ मिलाया है॥ १॥

29हे प्रभु ! तू दरिया है और सभी तुझ में समाए हुए हैं।

30तेरे अलावा दूसरा कोई नहीं।

31(सृष्टि के) तमाम जीव-जन्तु तेरा ही खेल है।

32वियोग कर्मों के कारण मिला हुआ प्राणी बिछुड़ जाता है और संयोगवश पुन: प्रभु से मिलन प्राप्त कर लेता है॥ २॥

33हे प्रभु ! जिस मनुष्य को तुम गुरु द्वारा सुमति प्रदान करते हो वही मनुष्य तुझे समझता है और

34सदैव ही तेरी गुणस्तुति का बखान करता है।

35जिस मनुष्य ने भी हरि की सेवाभंक्ति की है, उसे सुख प्राप्त हुआ है।

36वह सहज ही हरिनाम में समा गया है॥ ३॥

37हे प्रभु ! तुम स्वयं ही रचयिता हो और संसार में सबकुछ तेरा किया ही होता है।

38तेरे अतिरिक्त दूसरा कोई बड़ा नहीं।

39हे प्रभु ! तुम ही सृष्टि की उत्पत्ति करके देखते एवं समझते हो।

40हे नानक ! यह भेद गुरुमुख के अन्दर ही प्रकाशमान होता है॥ ४ ॥ १॥ ५३

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं