गुरु ग्रंथ साहिब 363 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji
1वह अपना तन-मन सतिगुरु को अर्पण कर देता है और उनका आश्रय लेता है।
2उसकी बड़ी महानता यह है कि उसके हृदय में हरि का नाम विद्यमान है।
3प्रियतम-प्रभु सदैव ही उसका सखा-सहायक बना रहता है॥ १॥
4हे बन्धु ! केवल वही प्रभु का सेवक है जो सांसारिक कार्य करता हुआ विषय-वासनाओं से निर्लिप्त रहता है।
5वह सुख-दुख दोनों को एक समान समझता है और गुरु की कृपा से शब्द द्वारा उसका उद्धार हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥
6परमात्मा ने आरम्भ से ही जीवों को शुभ कर्म करने का हुक्म किया हुआ है।
7शब्द-साधना के बिना जीवन सफल नहीं होता।
8प्रभु का यशोगान करने से नाम जीव के मन में बस जाता है।
9ईश्वर स्वयं यशोगान की देन प्रदान करता है और यह देन में देरी नहीं करता॥ २॥
10स्वेच्छाचारी मनुष्य माया की दुविधा में फँसकर जगत में कुमार्गगामी हो जाता है।
11नाम-पूंजी के बिना वह झूठा व्यापार करता है।
12नाम-पूंजी के बिना सौदा प्राप्त नहीं होता।
13(माया की) दुविधा में पड़ा हुआ मनमुख व्यक्ति इस तरह अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा लेता है॥ ३॥
14जो मनुष्य सतिगुरु की सेवा करता है यहू प्रभु का सेवक होता है।
15उसकी जाति उत्तम है एवं उसकी मान-प्रतिष्ठा भी उत्तम है।
16गुरु की सीढ़ी का आश्रय लेकर वह सर्वोत्तम बन जाता है।
17हे नानक ! ईश्वर के नाम-सुमिरन द्वारा प्रशंसा मिलती है॥ ४॥ ७॥ ४६॥
18आसा महला ३ ॥
19स्वेच्छाचारी जीवात्मा केवल झूठ का ही आचरण करती है
20इसलिए उसे परमेश्वर का महल कदापि प्राप्त नहीं होता।
21मोह-माया में फँसी हुई वह दुविधा में भटकती रहती है।
22मोह-ममता में फॅसी हुई वह जन्म-मरण के चक्र में पड़कर आती-जाती रहती है॥ १॥
23हे मन ! दुहागिन अर्थात् परित्यक्ता नारी का हार-शृंगार देखो।
24जो पुत्र, स्त्री, एवं माया-धन में चित्त लगाता है, वह झूठ, मोह, पाखंड एवं विकारों में ही फॅसा रहता है॥ १॥ रहाउ॥
25जो जीवात्मा प्रभु को अच्छी लगती है वह सदा सौभाग्यशालिनी है।
26गुरु के शब्द को वह अपना हार-शृंगार बनाती है।
27उसकी सेज सुखदायक है और रात-दिन वह अपने प्रभु-पति से रमण करती है।
28अपने प्रियतम-प्रभु से मिलकर वह सदा सुख पाती है।॥ २॥
29वह सुहागिन सच्ची है जो सत्यस्वरूप प्रभु से प्रेम करती है।
30अपने कंत -प्रभु को वह हमेशा अपने चित्त से लगाकर रखती है।
31वह उसको समीप ही नहीं अपितु सदा प्रत्यक्ष देखती है।
32मेरा प्रभु हर जगह मौजूद है॥ ३॥
33परलोक में जाति एवं सौन्दर्य मनुष्य के साथ नहीं जाते अपितु
34जैसे कर्म मनुष्य करता है वैसा ही उसका जीवन बन जाता है।
35शब्द द्वारा मनुष्य ऊँचा हो जाता है।
36हे नानक ! वह सत्य में ही समा जाता है॥ ४॥ ८॥ ४७ ॥
37आसा महला ३ ॥
38जो भक्त प्रभु-भक्ति के रंग में सहज ही रंगा रहता है,
39वह गुरु के भय द्वारा निश्चित ही सत्य में समा जाता है।
40पूर्ण गुरु के बिना प्रभु की भक्ति नहीं होती और
41स्वेच्छाचारी मनुष्य अपना मान-सम्मान गंवा कर विलाप करते रहते हैं। १॥
42हे मेरे मन ! हरि का जाप कर और सदा उसका ध्यान कर।
43फिर तुझे दिन-रात सदैव ही आनंद बना रहेगा। जिस फल की इच्छा होगी, वही फल मिल जाएगा ॥ १॥ रहाउ॥
44पूर्ण गुरु के द्वारा पूर्ण गुणदाता प्रभु प्राप्त होता है।
45उसके हृदय में गुरु का शब्द और सत्यनाम बस जाता है।
46जो मनुष्य अमृत सरोवर में स्नान करता है उसका हृदय पवित्र हो जाता है।
47सदा के लिए पवित्र होने के कारण वह सत्य में लीन हो जाता है॥ २ ॥
48हरि प्रभु जीवों को सदा देखता रहता है।
49गुरु की दया से जीव प्रभु को सर्वव्यापक पाता है।
50जहाँ कहीं भी मैं जाता हूँ, वहाँ मैं उस प्रभु को देखता हूँ।
51गुरु के बिना अन्य कोई दाता नहीं ॥ ३॥
52गुरु सागर है, उसका पूर्ण भण्डार
53अपार एवं बहुमूल्य रत्नों एवं जवाहरों से भरपूर है।
54प्रभु गुरु की कृपा से ही जीवों को देन देने वाला है।
55हे नानक ! क्षमाशील परमात्मा जीवों को क्षमा कर देता है॥ ४॥ ६॥ ४८॥
56आसा महला ३ ॥
57गुरु ही गुणों का सागर है और वह सच्चा प्रभु स्वयं ही सतिगुरु है।
58पूर्ण भाग्य से ही गुरु की सेवा होती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं