गुरु ग्रंथ साहिब 362 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji
1जिनका मन हरि-रंग में रंग जाता है,
2उनका जन्म-मरण के चक्र का दुख दूर हो जाता है और वह सहज ही प्रभु के दरबार में मिल जाते हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
3जो मनुष्य शब्द को चखता है, वह सच्चे स्वाद को पा लेता है और
4हरि के नाम को अपने मन में बसा लेता है।
5हरि-प्रभु सदा ही सर्वव्यापक है।
6वह स्वयं निकट है और स्वयं ही दूर है॥ २॥
7बातों द्वारा तो सभी मनुष्य कहते हैं और मुँह से बोल कर सुनाते भी हैं
8परन्तु वह प्रभु स्वयं क्षमा करता और अपने साथ मिला लेता है।
9केवल कहने एवं उच्चारण करने से प्रभु प्राप्त नहीं होता।
10गुरु की दया से प्रभु आकर मनुष्य के चित्त में बस जाता है॥ ३॥
11गुरुमुख अपने भीतर से अहंत्व दूर कर देता है।
12वह मोह-माया को छोड़ कर प्रभु के प्रेम में रंगा हुआ है।
13वह गुरु के शब्द का चिन्तन करता है जो बड़ा निर्मल है।
14हे नानक ! प्रभु का नाम मनुष्य का जीवन संवारने वाला है॥ ४ ॥ ४॥ ४३ ॥
15आसा महला ३ ॥
16जो द्वैतभाव तथा मोह-माया में लीन हुए हैं, उन्होंने दुःख ही पाया है।
17शब्द के बिना उन्होंने अपना जन्म व्यर्थ ही गंवा दिया है।
18सतिगुरु की सेवा करने से सूझ प्राप्त हो जाती है और
19मनुष्य मोह-माया व द्वैतवाद के साथ नहीं लगता ॥ १॥
20जो मनुष्य सृष्टि के मूल (कर्तार) से जुड़ते हैं, वे स्वीकृत हो जाते हैं।
21अपने हृदय में हमेशा राम का नाम जपते रहो और गुरु के शब्द द्वारा एक परमात्मा को ही समझो॥ १॥ रहाउ॥
22जो व्यक्ति सृष्टि के मूल परमात्मा को छोड़कर उसकी माया रूपी डाली से लगता है, वह निष्फल हो जाता है।
23ज्ञानहीन कर्मो के लिए अन्धा दण्ड ही पाता है।
24अन्धे स्वेच्छाचारी मनुष्य को कोई सुख का स्थान नहीं मिलता।
25वह विष्टा का कीड़ा है और विष्टा में ही गल-सड़ जाता है॥ २॥
26गुरु की सेवा करने से मनुष्य को सदा सुख मिलता है और
27सत्संगति में मिलकर हरि की गुणस्तुति करता है।
28जो मनुष्य प्रभु का नाम-सुमिरन करता है,
29वह स्वयं संसार सागर से पार हो जाता है और अपनी कुल का भी उद्धार कर लेता है॥ ३॥
30गुरु की वाणी द्वारा मन में प्रभु-नाम बजता है।
31हे नानक ! शब्द गुरु के द्वारा मनुष्य अपने हृदय-घर में ही प्रभु को प्राप्त कर लेता है।
32हे भाई ! गुरु की शिक्षा द्वारा तू सत्य के सरोवर पर हरि नाम रूपी जल में स्नान कर
33इस तरह तेरी दुर्मति एवं पाप की सारी मैल साफ हो जाएगी।॥ ४॥ ५॥ ४४॥
34आसा महला ३ ॥
35जब स्वेच्छाचारी मरते हैं तो इस तरह मरकर अपनी मृत्यु बिगाड़ लेते हैं,
36क्योंकि मोह-माया द्वारा वह अपना आत्म-संहार कर लेते हैं।
37यह मेरा (परिवार) है, यह मेरा (धन-दौलत) है, कहते हुए वे नष्ट हो जाते हैं।
38वह अपनी आत्मा की पहचान नहीं करते और भ्रम में सोये हुए हैं।॥ १॥
39जो शब्द द्वारा मरता है, वह यथार्थ मृत्यु मरता है।
40गुरु ने जिसे यह ज्ञान दिया है कि स्तुति एवं निन्दा एक समान है, वह इस युग में हरि का सिमरन करके नाम रूपी लाभ प्राप्त करके ले जाता है।॥ १॥ रहाउ॥
41जो मनुष्य नाम विहीन हैं, वे गर्भ में गल-सड़ जाते हैं।
42उसका जन्म निरर्थक है जो मोह-माया में फँसा रहता है।
43नाम विहीन सारी दुनिया दुःख-संताप में जल रही है।
44पूर्ण सतिगुरु ने मुझे यह ज्ञान प्रदान किया है॥ २॥
45चंचल मन मोह-माया में भटक कर बहुत चोटें खाता है।
46मनुष्य जन्म का यह सुनहरी अवसर गंवा कर उसे कोई सुख का स्थान नहीं मिलता।
47गर्भयोनि (जन्म मरण का चक्र) मानों विष्टा का घर है।
48ऐसे घर में स्वेच्छाचारी मनुष्य निवास करता है॥ ३॥
49मैं अपने सतिगुरु पर हमेशा बलिहारी जाता हूँ।
50गुरु के सम्मुख रहकर आत्म ज्योति परम-ज्योति में मिल जाती है।
51निर्मल गुरुवाणी द्वारा मनुष्य अपने आत्मस्वरूप में निवास प्राप्त कर लेता है।
52हे नानक ! जो मनुष्य अपना अहंत्व समाप्त कर देता है, वह सदैव निर्लिप्त है॥४॥६॥४५॥
53आसा महला ३ ॥
54प्रभु का सेवक अपनी जाति गंवा देता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं