गुरु ग्रंथ साहिब 35 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1स्वेच्छाचारी जीव का जन्म व्यर्थ चला जाता है, ऐसे में वह आगे परलोक में जाकर क्या मुंह दिखाएगा ? ॥ ३॥
2वह परमात्मा ही सर्वस्व है, यह बात अहंकारी जीव द्वारा नहीं कही जा सकती।
3गुरु का उपदेश पहचान कर ही कष्टदायक अहंकार को ह्रदय में से निकाला जा सकता है।
4अपना कर्तव्य जान कर जो सतिगुरु की सेवा करता है, मैं उनके चरण स्पर्श करता हूँ।
5नानक देव जी कथन करते हैं केि सत्यस्वरूप परमात्मा के द्वार पर वे जीव ही सत्य धारण करते हैं और मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ॥ ४II २१ll ५४ II
6श्रीरागु महला ३ ॥
7परमात्मा का चिन्तन करने हेतु यदि समय निश्चित करने का विचार करते रहें तो किस समय भक्ति हो सकती है, अर्थात्- कभी भी भक्ति नहीं हो सकती।
8दिन-रात परमात्मा के नाम में विलीन रहने वाले जीव की शोभा होती है।
9यदि क्षण भर के लिए भी प्रियतम प्रभु विस्मृत हो जाए तो वह कैसी भक्ति हुई।
10सत्य सिमरन द्वारा ही मन-तन शीतल रहता है और कोई भी श्वास निष्फल नहीं जाता॥ १॥
11हे मेरे मन ! तुम भी प्रभु-नाम का सिमरन करो।
12सत्य भक्ति तभी होती है, जब हरि-प्रभु मन में आकर बस जाए॥ १॥ रहाउ॥
13सहजावस्था में स्थिर होकर ह्वदय-रूपी खेत में सत्य नाम का बीज डाल कर खेती बोई जाए
14तो शुभगुण रूपी खेती बहुत पैदा होती है, अर्थात्- फसल देख कर मन स्वाभाविक ही तृप्त हो जाता है।
15गुरु का उपदेश अमृत रूप है, जिसका पान करने से माया की तृष्णा बुझ जाती है।
16जिस गुरुमुख जीव का यह सत्य मन सत्य नाम में लीन है, वह सत्य-स्वरूप परमात्मा में समा गया है॥ २॥
17उनका स्वयं कुछ बोलना, कहना व देखना आदि शब्द गुरु-वाणी में ही समाया होता है।
18उनके वचन चार-युगों में विख्यात हो जाते हैं, क्योंकि वे पूर्ण रूप से सत्य पर आधारित होते हैं।
19जीव का अहंकार व अहंभाव समाप्त हो जाता है और सत्य प्रभु उन्हें स्वयं में मिला लेता है।
20जो जीव सत्य-स्वरूप में लीन हैं, उन्हें परमात्मा का स्वरूप प्रत्यक्ष दिखाई देता है ॥ ३॥
21परमात्मा की कृपा-दृष्टि से ही परमात्मा का नाम-सिमरन किया जा सकता है, बिना सद्कर्मो के नाम-सिमरन को प्राप्त नहीं किया जा सकता।
22जिस जीव को सौभाग्य से सत्संगति मिलती है, उसे सतिगुरु आकर मिलते हैं।
23प्रतिदिन नाम में अनुरक्त होने पर हृदय में से विषय-विकारों का दुख दूर हो जाता है।
24नानक देव जी कथन करते हैं कि गुरु के उपदेश द्वारा ही जीव का परमात्मा से मिलन होता है तथा नाम-सिमरन में लीन रहता है ॥ ४ ॥ २२ ॥ ५५ ॥
25श्रीरागु महला ३ ॥
26जिन्होंने गुरु के उपदेश का मनन किया है, परमेश्वर ने उनके मन में अपना भय डाला है।
27वे व्यक्ति प्रायः सत्संगति में मिले रहते हैं तथा सत्य परमात्मा के गुणों को ग्रहण करते हैं।
28परमात्मा ने उनके हृदय में से दुविधा की मैल को दूर कर दिया है तथा ऐसे व्यक्ति परमात्मा के नाम को हृदय में धारण करके रखते हैं।
29गुरु का सत्य उपदेश उनके मन में बस जाता है और उस सत्यस्वरूप परमात्मा के साथ उनका प्रेम हो जाता है॥ १॥
30हे मेरे मन ! यह जीव अहंकार रूपी मैल से भरा हुआ है।
31परमात्मा इस मैल से रहित है और वह पवित्र व सुंदर है, परमात्मा पवित्र जीवों को ही गुरु-उपदेश से जोड़ कर संवारने वाला है॥ १॥ रहाउ॥
32गुरु के सत्य उपदेश से जिस जीव का मन मोहित हो गया, उसे प्रभु ने स्वयं ही अपने स्वरूप में मिला लिया।
33रात-दिन नाम सिमरन में लीन रहने से उनकी ज्योति प्रभु की ज्योतेि में समा जाती है।
34अपने अंतर्मन के प्रकाश द्वारा ही परमात्मा की पहचान होती है, किन्तु सतिगुरु के बिना ऐसा ज्ञान प्राप्त होना असंभव है।
35जिनके भाग्य में पूर्व काल से ही लिखा है, वे गुरु को आकर मिल गए ॥ २॥
36नाम-साधना के बिना समस्त जीव द्विचितापन हो रहे हैं और द्वैत-भाव में नष्ट हो रहे हैं।
37उस परमात्मा के बिना एक क्षण भी सुख के साथ नहीं बिताया जा सकता दुख में ही रात व्यतीत होती है।
38अहं में भूला हुआ अज्ञानी जीव आवागमन के चक्र में भटकता है।
39परमात्मा अपनी कृपा-दृष्टि करे, तो अपने साथ मिला लेता है॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं