सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 358 · Raag Aasaa

1ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

2आसा घरु ३ महला १ ॥

3(हे बन्धु !) यदि लाखों की संख्या में तेरी फौज हो, लाखों वाद्य एवं लाखों नेजे से संयुक्त हों, लाखों ही उठकर रोज़ सलाम करने वाले हों,

4यदि लाखों लोगों पर तेरा हुक्म चलता हो और लाखों ही मान-सम्मान करने वाले हों

5परन्तु यदि यह प्रतिष्ठा ईश्वर की दृष्टि में स्वीकृत नहीं तो यह प्रपंच निरर्थक हैं अर्थात् समस्त कार्य ही व्यर्थ गए॥ १॥

6हरि के नाम-स्मरण के बिना यह समूचा जगत एक झूठा धन्धा ही है।

7मूर्ख मनुष्य को चाहे कितना ही अधिकतर समझाया जाए वह फिर भी अन्धा (ज्ञानहीन) ही बना रहता है॥ १॥ रहाउ ॥

8यदि लाखों रुपए कमाए जाएँ, लाखों संग्रह किया जाए, लाखों खर्च किए जाएँ, लाखों आएँ और लाखों चले जाएँ किन्तु

9यदि परमात्मा की दृष्टि में यह स्वीकृत नहीं तो वह प्राणी जहाँ मर्जी भटकता फिरे दुखी ही रहता है॥ २॥

10लाखों शास्त्रों के माध्यम से व्याख्या की जाए और लाखों विद्वान पुराण आदि को पढ़ते रहें लेकिन

11यदि यह सब मान-प्रतिष्ठा ईश्वर को स्वीकृत नहीं तो यह सबकुछ कहीं भी स्वीकार नहीं होता।॥ ३॥

12सत्यस्वरूप प्रभु के नाम में वृति लगाने से ही मान-सम्मान मिलता है और उस करतार के करम (कृपा) से ही उसका नाम प्राप्त होता है।

13हे नानक ! यदि प्रभु का नाम ह्रदय में दिन-रात बसा रहे, तो उसकी करुणा-दृष्टि से मनुष्य संसार सागर से पार हो जाता है॥ ४॥ १॥ ३१॥

14आसा महला १ ॥

15एक ईश्वर का नाम ही मेरा दीपक है, उस दीपक में मैंने दु:ख रूपी तेल डाला हुआ है।

16जैसे-जैसे नाम रूपी दीपक का आलोक होता है तो वह दु:ख रूपी तेल सूखता चला जाता है और यमराज के साथ संबंधविच्छेद हो जाता है॥ १॥

17हे लोगो ! मेरी आस्था को मिथ्या मत समझो।

18जैसे लाखों मन लकड़ी एकत्रित करके थोड़ी-सी चिंगारी भी उसे भस्म कर देती है वैसे ही प्रभु-नाम पापों का नाश कर सकता है॥ १॥ रहाउ॥

19पतलों पर पिण्ड भरना (दान करना) मेरे लिए प्रभु (का नाम) ही है, मेरे लिए करतार का सत्य नाम हो किरिया-संस्कार है।

20यह नाम लोक-परलोक में सर्वत्र मेरे जीवन का आधार है॥ २॥

21हे परमेश्वर ! तेरी गुणस्तुति ही मेरे लिए गंगा (हरिद्वार तथा), काशी इत्यादि तीर्थों का स्नान है, तेरा गुणानुवाद ही मेरी आत्मा का स्नान है।

22सच्चा स्नान तभी होता है, जब प्राणी दिन-रात ईश्वर-चरणों में प्रेम बनाकर मग्न रहे॥ ३॥

23ब्राह्मण एक पिण्ड बनाकर देवताओं को अर्पण करता है और दूसरा पिण्ड पितरों को, पिण्ड बनाने के पश्चात् वह स्वयं खाता है (परन्तु)

24हे नानक ! ब्राह्मण के माध्यम से दिया गया पिण्डदान कब तक अटल रह सकता है? हाँ, ईश्वर की कृपा का पिण्ड कभी खत्म नहीं होता ॥ ४॥ २॥ ३२॥

25आसा घरु ४ महला १

26ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

27हे जग के रचयिता ! तेरे दर्शन करने के लिए देवताओं ने भी दुख, भूख-प्यास को सहन किया तथा तीर्थों पर भ्रमण किया।

28अनेक योगी एवं यति भी अपनी अपनी मर्यादा को निभाते हुए भगवे रंग के वस्त्र पहनते रहे॥ १॥

29हे मेरे मालिक ! तेरे मिलन हेतु अनेक पुरुष तेरे प्रेम में अनुरक्त रहते हैं।

30तेरे नाम अनेक हैं, अनन्त रूप हैं, अनन्त गुण हैं। ये किसी भी ओर से वर्णन नहीं किए जा सकते ॥ १॥ रहाउ ॥

31तेरी खोज में कितने ही अपना घर-बार, महल, हाथी -घोड़े एवं अपना देशछोड़कर परदेसों में चले गए।

32कितने ही पीरों-पैगम्बरों, ज्ञानियों तथा आस्तिकों ने तेरे द्वार पर सत्कृत होने के लिए दुनिया छोड़ दी और तेरे दर पर स्वीकार हो गए॥ २॥

33अनेक लोगों ने सुख-वैभव, स्वाद, सभी रस एवं वस्त्र इत्यादि त्याग दिए और वस्त्र त्याग कर केवल चमड़ा ही पहना।

34अनेकों ही दुखी एवं गमों के मारे हुए तेरे नाम में लीन होकर तेरे द्वार पर खड़े रहने वाले दरवेश बन गए॥ ३॥

35चमड़ा पहनने वाले, खप्पर में भिक्षा लेने वाले दण्डाधारी संन्यासी, मृगशाला पहनने वाले, चोटी, जनेऊ एवं धोती पहनने वाले अनेकों हैं (जो परमात्मा की तलाश हेतु मेरी भाँति स्वांग भरने वाले हैं)।

36परन्तु नानक वन्दना करता है -हे प्रभु ! तू मेरा मालिक है, मैं केवल तेरा स्वांगी हूँ। किसी विशेष जाति में पैदा होने का मुझे कोई अभिमान नहीं है॥ ४॥ १॥ ३३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं