सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 357 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1अपने पति से मिलन की इच्छा एवं प्यास लेकर यदि मैं सेज पर आती भी हूँ तो

2मुझे पता नहीं है कि मैं प्रियतम-प्रभु को अच्छी लगती हूँ कि नहीं ॥ २॥

3हे मेरी माता! मैं नहीं जानती कि क्या होगा ?

4परन्तु हरि के दर्शन बिना मैं रह नहीं सकती॥ १॥ रहाउ॥

5मैंने प्रभुपति के प्रेम को नहीं चखा इसलिए मेरी प्यास नहीं बुझी और

6मेरी सुन्दर जवानी चली गई है और मैं पत्नी पश्चाताप करती हूँ॥ ३॥

7अब भी मैं उससे मिलन की आशा में जागती रहती हूँ।

8मैं उदास हो गई हूँ और निराश रहती हूँ॥ १॥ रहाउ॥

9यदि जीव-स्त्री अपना अहंकार त्याग दे और गुणों का हार-श्रृंगार करे तो ही

10पति-प्रभु जीव-स्त्री की सेज पर रमण करता है॥ ४॥

11हे नानक ! जीव स्त्री पति-प्रभु के मन को तभी भली लगती है,

12जब अहंत्व त्याग कर अपने पति की इच्छा में लीन हो जाती है॥ १ ॥ रहाउ ॥ २६ ॥

13आसा महला १ ॥

14दुनिया के मोह में फँसकर जीव-स्त्री मूर्ख बनी रहती है और

15उस पति-प्रभु की महत्ता नहीं समझ सकी।॥ १॥

16मेरा पति-परमेश्वर केवल एक है। वह अद्वितीय है, उस जैसा कोई नहीं।

17यदि वह करुणादृष्टि धारण करे तो मेरा उससे मिलन हो सकता है॥ १॥ रहाउ॥

18जो जीव-स्त्री संसार के मोह से निकल कर प्रभु-चरणों में लीन रहती है, वह उस सत्यस्वरूप ईश्वर (की महत्ता) पहचान लेती है और

19सहज ही प्रेम में जुड़कर अपने प्रियतम-प्रभु से गहरे संबंध बना लेती है॥ २॥

20जब गुरु की कृपा से (जीव स्त्री में) ऐसी बुद्धि आ जाती है तो

21वह अपने पति-परमेश्वर के मन को प्रिय लगने लगती है॥ ३॥

22नानक का कथन है कि जो जीव-स्त्री प्रभु के भय एवं प्रेम का श्रृंगार करती है,

23वह अपने पति-परमेश्वर के साथ हमेशा सेज पर रमण करती है॥ ४ ॥ २७ ॥

24आसा महला १ ॥

25इस दुनिया में न कोई किसी का पुत्र है, न ही कोई किसी की माता है।

26झूठे मोह के कारण दुनिया भ्रम में भटकती रहती है।॥ १॥

27हे मेरे मालिक ! मैं तेरी रचना हूँ।

28जब तुम मुझे अपना नाम देते हो तो मैं नाम का जाप करता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

29यदि मनुष्य ने कितने ही पाप किए हुए हों फिर भी यदि कोई मनुष्य प्रार्थना करे

30परन्तु केवल तभी वह उसे क्षमा करेगा जब उसे अच्छा लगेगा।॥ २॥

31गुरु की कृपा से दुर्मति जड़ से उखड़ गई है।

32जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ वहाँ मैं प्रभु को पाता हूँ॥ ३॥

33नानक कहते हैं कि जब जीव को ऐसी बुद्धि मिल जाती है,

34तो वह परम सत्य में ही समा जाता है।॥ ४ ॥ २८ ॥

35आसा महला १ दुपदे ॥

36जीव का ऐसे भयंकर सरोवर में निवास है, जिसमें ईश्वर ने स्वयं ही जल के स्थान अग्नि उत्पन्न कर रखी है।

37उस सरोवर में मोह रूपी कीचड़ विद्यमान है, जिससे पांव आगे की ओर नहीं चलते और देखते ही देखते अनेकों पुरुष उस सरोवर में डूबते चले जा रहे हैं।॥ १॥

38हे मूर्ख मन ! तू परमात्मा को स्मरण नहीं करता।

39तुम जैसे-जैसे परमात्मा को विस्मृत करते हो, तेरे गुण कम होते जा रहे हैं।॥ १॥ रहाउ॥

40हे प्रभु! न मैं यति हूँ, न ही सती हूँ, न पढ़ा-लिखा हूँ, मेरा जीवन तो मूर्ख एवं अज्ञानियों जैसा बना हुआ है।

41नानक वन्दना करता है - (हे प्रभु!) मुझे उन महापुरुषों की शरण में रख, जिन्होंने तुझे कभी नहीं भुलाया है ॥२॥२९॥

42आसा महला १ ॥

43सृष्टि की रचना में छः शास्त्र हुए, इनके छ: ही रचयिता तथा उपदेश भी अपने-अपने तौर पर छः ही हैं।

44किंतु इनका मूल तत्व एक ही केवल परमात्मा है, जिसके भेष अनन्त हैं।॥ १॥

45हे मनुष्य ! जिस शास्त्र रूपी घर में निरंकार की प्रशंसा हो,

46उसका गुणगान हो, उस शास्त्र को धारण कर, इससे तेरी इहलोक व परलोक दोनों में शोभा होगी ॥ १॥ रहाउ ॥

47काष्ठा, चरा, घड़ी, पहर, तिथि व वार मिलकर जैसे एक माह बनता है। इसी तरह ऋतुओं के अनेक होने पर भी सूर्य एक ही है। (यह तो इस सूर्य के अलग-अलग अंश हैं।)

48वैसे ही हे नानक ! कर्ता-पुरुष के उपरोक्त सब स्वरूप ही दिखाई पड़ते हैं॥ २॥ ३० ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं