गुरु ग्रंथ साहिब 356 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji
1मैंने स्वयं विचार करके एवं अपने मन को नियन्त्रण में करके यह भलीभांति देखा है कि तेरे जैसा मित्र अन्य कोई नहीं।
2(हे प्रभु !) जैसे तू मुझे रखता है, मैं वैसे ही रहता हूँ। दुख-सुख प्रदान करने वाला तू ही है। जो तू करता है, वही होता है॥ ३॥
3मैंने आशा एवं तृष्णा दोनों को मिटा दिया है और त्रिगुणात्मक माया की आशा भी छोड़ दी है।
4सत्संगति की शरण लेकर एवं गुरुमुख बनकर ही तुरीयावस्था प्राप्त होती है।॥ ४॥
5जिसके हृदय में अलक्ष्य एवं भेद रहित प्रभु बसता है, उसके पास जप, तप, ज्ञान-ध्यान इत्यादि सबकुछ होता है।
6हे नानक ! जिसका मन राम-नाम में मग्न है, वह गुरु की मति द्वारा प्रभु की सेवा करके सहजावरथा प्राप्त कर लेता है॥ ५॥ २२॥
7आसा महला १ पंचपदे ॥
8मोह इन्सान के मन में परिवार के प्रति ममता पैदा करता है। मोह ही जगत का कार्य चला रहा है।
9मोह मन में विकार पैदा करता है, इसलिए मोह को त्याग दीजिए ॥ १॥
10हे भाई ! मोह एवं दुविधा निवृत कर दो,
11तभी तुम्हारी आत्मा एवं शरीर में परमात्मा का सत्यनाम बसा रहेगा। १॥ रहाउ॥
12जब मनुष्य सत्यनाम की नवनिधि प्राप्त कर लेता है
13तो उसके बच्चे रोते नहीं और माता भी दु:खी नहीं होती ॥ २॥
14इस मोह में समूचा जगत डूबा हुआ है और
15गुरुमुख बनकर ही कोई इससे पार उतर सकता है॥ ३ ॥
16इस मोह के कारण ही जीव बार-बार योनियों में आता है।
17मोह में लिप्त हुआ जीव यमपुरी को जाता है॥ ४॥
18जो व्यक्ति गुरु की दीक्षा प्राप्त करके भी जप एवं तप करता है,
19उसका न सांसारिक मोह टूटता है और न ही वह सत्य के दरबार में स्वीकृत होता है॥ ५ ॥
20यदि प्रभु अपनी कृपादृष्टि धारण करे तो यह मोह दूर हो जाता है।
21हे नानक ! ऐसा जीव प्रभु में लीन हुआ रहता है॥ ६॥ २३॥
22आसा महला १ ॥
23अलक्ष्य एवं अपार सत्य का पुंज परमात्मा ही सबकुछ करता है।
24हे प्रभु ! मैं तो पापी हूँ परन्तु तू क्षमाशील है॥ १॥
25हे प्रभु ! तेरी इच्छा में ही सबकुछ होता है।
26जो मनुष्य मन के हठ द्वारा कार्य करता है, वह अन्तः नष्ट हो जाता है॥ १॥ रहाउ ॥
27मनमुख पुरुष की बुद्धि में सदा झूठ भरा रहता है।
28हरि के सुमिरन के बिना वह पापों के कारण बहुत दुखी होता है॥ २॥
29हे प्राणी ! दुर्मति को त्यागकर कुछ लाभ प्राप्त कर लो।
30जो भी पैदा हुआ है, वह अगाध, भेदरहित स्वामी के द्वारा ही हुआ है॥ ३॥
31मेरा सखा ईश्वर ऐसा सहायक है कि
32वह गुरु रूप में मुझे मिला और उसने भक्ति भाव को मेरे हृदय में सुदृढ़ कर दिया है॥ ४॥
33दूसरे सांसारिक सौदों में मनुष्य को घाटा ही पड़ता है।
34हे नानक ! मेरे मन को राम का नाम ही अच्छा लगता है॥ ५ ॥ २४ ॥
35आसा महला १ चउपदे ॥
36यदि विद्या का विचार-मनन किया जाए तो ही परोपकारी बना जा सकता है।
37यदि काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार को वश में कर लिया जाए तो ही इन्सान तीर्थ वासी कहा जा सकता है॥ १॥
38यदि मेरा मन प्रभु-सिमरन में लगता है तो हृदय में धुंघरू जैसा अनहद शब्द बजता है।
39फिर परलोक में यमराज मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता ॥ १॥ रहाउ॥
40जब मैंने सब आशाएँ त्याग दीं तो मैं संन्यासी बन गया।
41जब मैंने योगी वाला यतीत्व धारण कर लिया तो मैं अपनी काया को भोगने वाला अच्छा गृहस्थी बन गया ॥ २॥
42जब मैं अपने शरीर को विकारों से बचाने के बारे में विचार करता हूँ तो मैं जीवों पर दया करने वाला दिगम्बर हूँ।
43जब मैं अपने अभिमान को खत्म करता हूँ तो मैं अहिंसक हूँ अर्थात् दूसरे जीवों को न मारने वाला हूँ ॥ ३॥
44हे प्रभु ! एक तू ही है और तेरे अनेक वेश हैं।
45नानक तेरे आश्चर्यजनक कौतुकों को नहीं जानता॥ ४॥ २५॥
46आसा महला १ ॥
47मैं किसी एक अवगुण से ही नहीं भरी हूँ, जो मैं अपने अन्तर्मन में गुण उत्पन्न करके उस एक अवगुण को धोकर स्वच्छ हो जाऊँगी अर्थात् मुझ में अनेक अवगुण भरे हुए हैं।
48मेरा प्रियतम-प्रभु जागता रहता है और मैं सारी रात (मोह निद्रा में) सोती रहती हूँ॥ १॥
49इस तरह मैं अपने कांत-प्रभु की प्रियतमा कैसे हो सकती हूँ?
50मेरा पति-प्रभु जागता रहता है और मैं सारी रात सोती रहती हूँ॥ १॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं