गुरु ग्रंथ साहिब 351 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji
1हे नानक ! छिपाने से किस तरह छिपाया जा सकता है। एक-एक करके उसने तमाम रत्न (पदार्थ) बांट दिए थे॥४॥ ७ ॥
2आसा महला १ ॥
3शुभ कर्मों एवं नेक आचरण की लता फैली हुई है और उस लता को राम के नाम का फल लगा हुआ है।
4उस राम नाम का कोई स्वरूप अथवा रेखा नहीं। यह अनहद शब्द (सहज ही) गूंजता है। निरंजन ने इस शब्द को पैदा किया है॥ १॥
5यदि कोई मनुष्य इस शब्द को समझ ले तो ही वह इसकी व्याख्या कर सकता है
6और केवल वही अमृत रस का पान करता है॥ १॥ रहाउ॥
7जो मनुष्य अमृत को चखते हैं, वे मस्त हो जाते हैं। उनके बन्धन एवं फाँसी कट जाती है
8जब वे ज्योति ज्योत समा जाते हैं तो उनकी माया की तृष्णा मिट जाती है।॥ २॥
9हे प्रभु ! समस्त ज्योतियों में मैं तेरा ही रूप देखता हूँ। समस्त लोकों में तेरी ही माया विद्यमान है
10यह विवादों वाला जगत तेरा ही रूप है पर तू इसमें इन विवादों से निर्लिप्त बैठा है यह माया तेरी छाया है। तू मोह-माया में लीन जीवों पर अपनी कृपा-दृष्टि करता है॥ ३॥
11जो योगी शब्द की वीणा बजाता है, वह अनन्त सुन्दर स्वामी के दर्शन कर लेता है।
12नानक यही विचार करता है कि वह योगी अनहद शब्द द्वारा अपने मालिक-प्रभु के प्रेम में मग्न रहता है।॥ ४ ॥ ८ ॥
13आसा महला १ ॥
14मुझ में यही गुण है कि अपने सिर पर मैंने व्यर्थ बातों का बोझ उठाया हुआ है।
15हे जग के रचयिता ! सब बातों में तेरी बातें ही उत्तम हैं।
16तब तक खाना, पीना एवं हँसना निरर्थक है
17जब तक हृदय में प्रभु याद नहीं आता॥ १॥
18मनुष्यं किसलिए और क्यों किसी दूसरे की परवाह करे,
19यदि वह अपने समूचे जीवन में प्राप्त करने योग्य वस्तु नाम को एकत्रित करे ॥ १॥ रहाउ ॥
20मन की बुद्धि मदमत्त हाथी जैसी है।
21जो कुछ हम बोलते हैं वह सब गलत ही है।
22कौन-सा मुँह लेकर हम (प्रभु के समक्ष) वन्दना करें,
23जबकि पाप एवं पुण्य दोनों साक्षी के तौर पर निकट ही हैं॥ २॥
24हे प्रभु ! जैसा तुम किसी को बनाते हो, वैसा वह हो जाता है।
25तेरे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं।
26जैसी सूझ बुद्धि तुम किसी को देते हो, वैसी ही वह प्राप्त करता है।
27जैसा तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही तुम मनुष्य को चलाते हो।॥३॥
28राग एवं रागिनियों का सारा परिवार एक उत्तम रत्न है
29और इन में नाम रूपी अमृत तत्व उत्पन्न होता है।
30हे नानक ! यह सृजनहार प्रभु का धन एवं संपति है।
31क्या कोई ऐसा मनुष्य है जो इस विचार को समझता है॥ ४॥ ६॥
32आसा महला १ ॥
33जब अपनी कृपा से कंत -प्रभु मेरे घर में आ गया तो मेरी सहेलियों (इन्द्रियों) ने मिलकर विवाह का प्रबंध किया।
34इस खेल को देख कर मेरा मन प्रसन्न हो गया है। मेरा हरि-प्रभु दूल्हा मुझसे विवाह करने के लिए आया हैI ॥१॥
35हे स्त्रियो ! गाओ, विवेक एवं विचार के गीत गायन करो।
36मेरे घर में जगजीवन मेरा कंत -प्रभु पधारा है॥ १॥ रहाउ॥
37सतिगुरु द्वारा मेरा विवाह हो गया। जब मैं अपने कंत -प्रभु से मिल गई तो मैंने उसे पहचान लिया।
38उसका अनहद शब्द रूपी नाम तीन लोकों में विद्यमान हो रहा है। जब मेरा अहंकार निवृत्त हो गया तो मेरा हृदय प्रसन्न हो गया।॥ २॥
39अपना कार्य प्रभु स्वयं ही संवारता है। यह कार्य किसी दूसरे से संवर नहीं सकता अर्थात् सफल नहीं हो सकता।
40कोई विरला गुरुमुख ही इस तथ्य को समझता है, कि इस विवाह कार्य के फलस्वरूप सत्य, संतोष, दयां, धर्म पैदा होते हैं।॥ ३॥
41हे नानक ! एक प्रभु ही सब जीव-स्त्रियों का प्रिय है,
42जिस पर वह अपनी दया-दृष्टि धारण करता है, वह सौभाग्यवती हो जाती हैं।॥ ४॥ १० ॥
43आसा महला १ ॥
44जो मनुष्य सहजावस्था में रहता है, उसके लिए घर एवं जंगल एक समान हैं।
45उसकी दुर्मति नाश हो जाती है और परमात्मा की कीर्ति उसका स्थान ले लेती है।
46मुँह से सत्यनाम का जाप करना ईश्वर के पास पहुँचने के लिए सच्ची सीढ़ी है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं