गुरु ग्रंथ साहिब 34 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1गुरु-उपदेश मान कर अंत:करण में से अभिमान समाप्त किया जा सकता है तथा सर्वश्रेष्ठ परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है।
2नित्यप्रति भक्ति करके स्थिर व सत्य-स्वरूप परमात्मा में लीन होना करो।
3नानक देव जी कथन करते हैं कि जिस जीव के मन में नाम-पदार्थ बस गया, वह सहजावस्था में समा गया ॥ ४॥ १६॥ ५२ ॥
4श्रीरागु महला ३ ॥
5जिन व्यक्तियों ने सतिगुरु की सेवा नहीं की वे चहुं युगों में दुखी रहते हैं।
6उन्होंने हृदय रूपी घर में स्थिर परमात्मा को नहीं पहचाना, इसलिए वे अभिमान एवं अहंकार आदि विकारों में ग्रस्त होकर ठगे गए हैं।
7जो व्यक्ति सतिगुरु के धिक्कारे हुए हैं, वे संसार में माँग-माँग कर थक गए हैं।
8उन्होंने उस सत्य स्वरूप परमात्मा का सिमरन नहीं किया, जो समस्त कार्य संवारने वाला हैII १II
9हे मेरे मन ! तू हरि को सदैव प्रत्यक्ष ही देख।
10यदि तुम परमात्मा को परिपूर्ण मान लो तो वह तुम्हें आवागमन के चक्र से मुक्त कर देगा ॥ १॥ रहाउ॥
11जो सत्य नाम का आश्रय लेकर सत्य की स्तुति करते हैं, वे ही सत्य हैं।
12जिसने भक्ति रूपी सत्य कर्म किया है, उसका सत्य परमात्मा (वाहिगुरु) के साथ प्रेम है।
13सत्य स्वरूप परमात्मा ही है, जिसका आदेश चलता है, उसके आदेश को कोई भी मिटा नहीं सकता।
14स्वेच्छाचारी जीव परमात्मा के महल तक नहीं पहुँचते, वे असत्य जीव मार्ग में ही असत्य द्वारा लूटे जाते हैं।॥ २॥
15अभिमान करता हुआ सम्पूर्ण संसार नष्ट हो गया, गुरु के बिना इस संसार में अज्ञानता का घोर अंधकार बना रहता है।
16माया में लिप्त प्राणियों ने सुख प्रदान करने वाले परमात्मा को विस्मृत कर दिया है।
17यदि प्राणी सतिगुरु की सेवा करेगा, तथा सत्य नाम को हृदय में धारण करेगा, तभी इस अज्ञान रूपी अंधकार से उबर सकंगा।
18गुरु द्वारा प्रदत्त सत्य उपदेश का मनन करने से ही परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है॥ ३॥
19जीव सतिगुरु की सेवा करके अहंकारादि विकारों का त्याग करता हुआ अपने हृदय को पवित्र करे।
20गुरु उपदेश द्वारा परमात्मा की गुणस्तुति का मनन करके अहंकार को त्याग कर विकारों से क्षीण हो जाता है।
21जब सत्य के साथ प्रीत हो गई तो सांसारिक मोह-माया के धन्धों से निवृति मिल जाती है।
22जो सत्य में अनुरक्त हैं, उनके मुँह उस सत्य परमात्मा के दरबार में उज्ज्वल होते हैं।॥ ४॥
23जिन्होंने सतिगुरु में श्रद्धा व्यक्त नहीं की, उनके उपदेश में प्रीत नहीं लगाई।
24वे जितना भी तीर्थ-स्नान अथवा दान आदि कर लें, द्वैत-भाव के कारण वे अपमानित होते हैं।
25जब परमात्मा अपनी कृपा करता है, तभी नाम-सिमरन में प्रीत लगती है।
26नानक देव जी कथन करते हैं कि हे जीव ! तुम गुरु के अपार प्रेम द्वारा परमात्मा के नाम का सिमरन किया कर II ५II २०II ५३ II
27श्रीरागु महला ३ ॥
28जब मैं अपने गुरु से जाकर पूछता हूँ कि किस की सेवा करूँ और कौन-सा जाप करूँ
29तो आदेश मिलता है कि - अपने अंतर्मन से अहंत्व का त्याग करके सतिगुरु का आदेश मान लेना।
30सतिगुरु का आदेश मानना ही वास्तविक सेवा एवं चाकरी है, इसके द्वारा ही मन में प्रभु का नाम बसता है।
31ईश्वर के नाम सिमरन द्वारा ही सुखों की प्राप्ति होती है तथा सत्य नाम से ही जीव शोभायमान होता है॥ १॥
32यदि गुरु के उपदेश द्वारा ज्ञान-भक्ति रूपी मार्ग पर जीव चले तो मोह रूपी गर्द (धुंध) दूर हो जाती है।
33अपने प्रेमा-भक्ति मूलक जीवन को सम्भालो, वरन् आयु रूपी खेती को मृत्यु रूपी कूज खा जाएगी।॥ १॥ रहाउ ॥
34जिन्होंने ब्रह्म को परिपूर्ण माना है, उनकी सम्पूर्ण मनोकामनाएँ पूर्ण हुई हैं।
35जो व्यक्ति परमात्मा का भय मानकर दिन-रात प्रेमा-भक्ति करते हैं, वे सदैव परमात्मा को प्रत्यक्ष देखते हैं।
36उनका मन परमात्मा की गुणस्तुति में स्थिर अनुरक्त रहता है, इसी से शरीर में से भ्रम दूर होता है।
37यही जीव शुभ-गुण स्वरूप पवित्र खज़ाने वाले परमात्मा को प्राप्त करते हैं।॥ २॥
38जो जीव मोह-माया से सुचेत रहते हैं, वे विकारों की मृत्यु से बच जाते हैं और जो अज्ञानता की निद्रा में सो जाते हैं, वे शुभ-गुण स्वरूप सम्पति को लुटा गए।
39वे प्रभु की गुणस्तुति का सार नहीं पहचान पाते और उनका जीवन स्वप्न भाँति व्यतीत हो जाता है।
40ऐसे जीव खाली घर के अतिथि की भाँति भूखे आते हैं और भूखे ही चले जाते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं