सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 348 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1गुरु नानक जी का फुरमान है कि हे मानव ! वह परमात्मा शाहों का शाह अर्थात् सारे विश्व का शहंशाह है, इसलिए उसकी रजा में रहना ही उचित है॥१॥१॥

2आसा महला ४ ॥

3वह अकालपुरुष सृष्टि के समस्त जीवों में व्यापक है, फिर भी मायातीत है, अगम्य है तथा अनन्त है।

4हे सत्यस्वरूप सृजनहार परमात्मा ! तुम्हारा ध्यान अतीत में भी सब करते थे, अब भी करते हैं और भविष्य में भी करते रहेंगे।

5सृष्टि के समस्त जीव तुम्हारी ही रचना हैं और तुम ही सब जीवों के प्रतिभोग व मुक्ति दाता हो।

6हे भक्त जनो ! उस निरंकार का सिमरन करो जो समस्त दुखों का नाश करके सुख प्रदान करता है।

7निरंकार स्वयं स्वामी व स्वयं ही सेवक है, सो हे नानक ! मुझ दीन जीव की क्या योग्यता है कि मैं उस अकथनीय प्रभु का वर्णन कर सकूं ॥१॥

8सर्वव्यापक निरंकार समस्त प्राणियों के हृदय में अभेद समा रहा है।

9संसार में कोई दाता बना हुआ है, किसी ने भिक्षु का रूप लिया हुआ है, हे परमात्मा ! यह सब तुम्हारा ही आश्चर्यजनक कौतुक है।

10तुम स्वयं ही देने वाले हो और स्वयं ही भोक्ता हो, तुम्हारे बिना मैं किसी अन्य को नहीं जानता।

11तुम पारब्रह्म हो, तुम तीनों लोकों में अंतरहित हो, मैं तुम्हारे गुणों को मुख से कथन कैसे करूँ।

12सतगुरु जी कथन करते हैं कि जो जीव आप का अंतर्मन से सिमरन करते हैं, सेवा-भाव से समर्पित होते हैं उन पर मैं न्यौछावर होता हूँ॥ २॥

13हे निरंकार ! जो आपका मन व वाणी द्वारा ध्यान करते हैं, वो मानव-जीव युगों-युगों तक सुखों का भोग करते हैं।

14जिन्होंने आपका सिमरन किया है वे इस संसार से मुक्ति प्राप्त करते हैं और उनका यम-पाश टूट जाता है।

15जिन्होंने भय से मुक्त होकर उस अभय स्वरूप अकाल पुरुष का ध्यान किया है उनके जीवन का समस्त (जन्म-मरण व यमादि का) भय वह समाप्त कर देता है।

16जिन्होंने निरंकार का चिन्तन किया, सेवा-भाव से उस में लीन हुए, वे तुम्हारे दुखहर्ता रूप में ही विलीन हो गए।

17हे नानक ! जिन्होंने नारायण स्वरूप निरंकार का सिमरन किया, वे धन्य ही धन्य हैं, मैं उन पर कुर्बान होता हूँ॥ ३॥

18हे अनंत स्वरूप ! तेरी भक्ति के खजाने भक्तों के हृदय में अनंतानंत भरे हुए हैं।

19तेरे भक्त तीनों काल तेरी प्रशंसा के गीत गाते हैं कि हे परमेश्वर ! तू अनेकानेक व अनंत स्वरूप हैं।

20संसार में तेरी नाना प्रकार से आराधना और जप-तपादि द्वारा साधना की जाती है।

21अनेकानेक ऋषि-मुनि व विद्वान कई तरह के शास्त्र, स्मृतियों का अध्ययन करके तथा षट्-कर्म, यज्ञादि धर्म कार्यों द्वारा तुम्हारा स्तुति-गान करते हैं।

22हे नानक ! वे समस्त श्रद्धालु भक्त संसार में भले हैं जो निरंकार को अच्छे लगते हैं॥ ४॥

23हे अकालपुरुष ! तुम अपरिमेय पारब्रह्म अनन्त स्वरूप हो, तुम्हारे समान अन्य कोई भी नहीं है।

24युगों-युगों से तुम एक हो, सदा सर्वदा तुम अद्वितीय स्वरूप हो और तुम ही निश्चल रचयिता हो।

25जो तुम्हें भला लगता है वही घटित होता है, जो तुम स्वेच्छा से करते हो वही कार्य होता है।

26तुमने स्वयं ही इस सृष्टि की रचना की है और स्वयं ही रच कर उसका संहार भी करते हो।

27हे नानक ! मैं उस स्रष्टा प्रभु का गुणगान करता हूँ, जो समस्त सृष्टि का सृजक है अथवा जो समस्त जीवों के अन्तर्मन का ज्ञाता है॥ ५॥ २ ॥

28ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

29रागु आसा महला १ चउपदे घरु २ ॥

30हे निरंकार स्वरूप ! (शास्त्रों व विद्वानों से) सुन कर तो प्रत्येक कोई तुझे बड़ा कहता है।

31किंतु कितना बड़ा है, यह तो तभी कोई बता सकता है यदि किसी ने तुझे देखा हो अथवा तुम्हारे दर्शन किए हों।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं