सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 347 · Raag Aasaa

1१ ऑ- निरंकार वही एक है। सति नामु - उसका नाम सत्य है। करता - वह सृष्टि व उसके जीवों की रचने वाला है। पुरखु - वह यह सब कुछ करने में परिपूर्ण (शक्तिमान ) है। निरभउ - उसमें किसी तरह का भय व्याप्त नहीं। अर्थात् - अन्य देव-दैत्यों तथा सांसारिक जीवों की भाँति उसमें द्वेष अथवा जन्म-मरण का भय नहीं है ; वह इन सबसे परे हैं। निरवैरु- वह वैर से रहित है। अकाल- वह काल (मृत्यु) से परे है; अर्थात्-वह अविनाशी है। मूरति - वह अविनाशी होने के कारण उसका अस्तित्व सदैव रहता है। अजूनी - वह कोई योनि धारण नहीं करता, क्योंकि वह आवागमन के चक्कर से रहित है। सैभं - वह स्वयं से प्रकाशमान हुआ है। गुर - अंधकार (अज्ञान) में प्रकाश (ज्ञान) करने वाला (गुरु)। प्रसादि- कृपा की बख्शिश। अर्थात्-गुरु की कृपा से यह सब उपलब्ध हो सकता है।

2रागु आसा महला १ घरु १ सो दरु ॥

3हे जगतपालक ! तेरा वह दर-घर कैसा है? जहाँ बैठकर तू सारी दुनिया की देखभाल व पोषण कर रहा है।

4तेरे द्वार पर नाना प्रकार के असंख्य नाद गूंज रहे हैं और केितने ही उनको वजाने वाले विद्यमान हैं।

5कितने ही तेरे राग हैं, जो रागिनियों के संग वहाँ गान किए जा रहे हैं और उन रागों को गाने वाले गंधपििद रार्गी भी कितने ही हैं जो तेरा यश गा रहे हैं।

6हे जग के रचयिता ! पवन, जल एवं अग्नि देव भी तेरा ही गुणानुवाद कर रहे हैं तथा जीवों के कर्मों का विश्लेपक धर्मराज भी तेरे द्वार पर तेरी ही महिमा गा रहा है।

7जीवों द्वारा किए जाने वाले कर्मों को लिखने वाले चित्र-गुप्त भी तेरा ही गुणानुवाद कर रहे हैं तथा धर्मराज चित्र-गुप्त द्वारा लिखे जाने वाले शुभाशुभ कर्मों का विचार करता है।

8हे परमेश्वर ! तेरे द्वारा प्रतिपादित शिव, ब्रह्मा व अनेकों देवियों जो शोभायमान हैं, तेरी ही महिमा गा रहे हैं।

9समस्त देवताओं व स्वर्ग का अधिपति इन्द्र अपने सिंहासन पर बैठा अन्य देवताओं के साथ मिलकर तेरे द्वार पर खड़ा तेरा ही यश गा रहा है।

10अनेक सिद्ध लोग समाधियों में स्थित हुए तेरी ही महिमा गा रहे हैं और विचारवान साधु भी विवेक से तेरा ही यशोगान कर रहे हैं।

11अनेक यति, सती एवं संतोषी भी तेरी ही महिमा-स्तुति गा रहे हैं और पराक्रमी योद्धा भी तेरी प्रशंसा के गीत गा रहे हैं।

12हे प्रभु ! दुनिया के समस्त विद्वान व महान जितेन्द्रिय ऋषि-मुनि युगों-युगों से वेदों को पढ़-पढ़ कर तेरा ही यशोगान कर रहे हैं।

13मन को मुग्ध करने वाली सुन्दर अप्सराएँ स्वर्ग लोक, मृत्युलोक एवं पाताल लोक में तेरा ही गुणगान कर रही हैं।

14तेरे उत्पन्न किए हुए चौदह रत्न, जगत के अड़सठ (६८) तीर्थ तथा उनमें विद्यमान संतजन भी तेरा यशोगान कर रहे हैं।

15बड़े-बड़े पराक्रमी योद्धा, महाबली एवं शूरवीर भी तेरा ही गुणानुवाद कर रहे हैं, तथा उत्पत्ति के चारों स्रोत (अण्डज, जरायुज, स्वेदज व उदभिज्ज) भी तेरी ही उपमा गा रहे हैं।

16हे विधाता ! नवखण्ड, मण्डल एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जो तूने बना-बना कर धारण कर रखे हैं, वे भी तेरी ही महिमा-स्तुति गा रहे हैं।

17वास्तव में वे ही तेरी कीर्ति को गा सकते हैं, जो तेरी भक्ति में लीन हैं, तेरे नाम के रसिया हैं और जो तुझे अच्छे लगते हैं।

18गुरु नानक देव जी कहते हैं कि अनेकानेक और भी कई ऐसे जीव हैं जो मुझे स्मरण नहीं हो रहे, जो तेरा ही यशोगान करते हैं, मैं कहाँ तक उनका विचार करूँ, अर्थात् यशोगान करने वाले जीवों की गणना मैं कहाँ तक करूँ।

19वह साहिब सच है, हमेशा के लिए सच है; वह सच है, और सत्य उसका नाम है।

20वह सत्यस्वरूप परमात्मा भूतकाल में था, वही सद्गुणी परमेश्वर वर्तमान में भी है। वह जगत का रचयिता भविष्य में सदैव रहेगा, वह परमात्मा न जन्म लेता है और न ही उसका नाश होता है।

21जिस सृष्टि रचयिता ईश्वर ने रंग-बिरंगी, तरह-तरह के आकार वाली एवं अनेकानेक जीवों की उत्पत्ति अपनी माया द्वारा की है,

22अपनी इस सृष्टि-रचना को कर-करके वह अपनी रुचि अनुसार ही देखता है अर्थात् उनकी देखभाल अपनी इच्छानुसार ही करता है।

23जगत के रचयिता को जो कुछ भी भला लगता है, वही कार्य वह करता है और भविष्य में भी करेगा, इसके प्रति उसको आदेश करने वाला उसके समान कोई नहीं है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं