गुरु ग्रंथ साहिब 345 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji
1लेकिन जब तक मनुष्य के हृदय में सांसारिक मोह की वासना है,
2तब तक वह प्रभु-चरणों की शरण में लग नहीं सकता।
3कबीर जी कहते हैं-जब राम का सिमरन करते करते मनुष्य का प्रेम राम के साथ हो जाता है तो
4उसका हृदय पावन हो जाता है॥ ८ ॥ १॥
5रागु गउड़ी चेती बाणी नामदेउ जीउ की
6ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
7राम ने वे पत्थर भी सागर पर तार दिए हैं (जिन पर राम का नाम लिखा हुआ था)
8तेरे नाम का जाप करने से मैं तेरा सेवक कैसे (संसार-सागर से) पार नहीं होऊंगा ? ॥ १॥ रहाउ॥
9हे प्रभु ! तुमने गनिका (वेश्या) को बचा लिया, तुमने कुरूप कुब्जा का कोढ़ दूर किया और पापों में ग्रस्त अजामल को पार कर दिया,
10(श्रीकृष्ण के) चरणों में निशाना लगाने वाले शिकारी तथा कई विकारी व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर गए।
11जिन्होंने राम का नाम याद किया है, मैं उन पर तन-मन से बलिहारी जाता हूँ॥ १॥
12हे परमात्मा ! दासी-पुत्र विदुर तेरा भक्त लोकप्रिय हुआ; सुदामा (जिसका तूने दारिद्रय दूर किया), उग्रसेन को शासन प्रदान किया।
13हे नामदेव के स्वामी ! तेरी दया से वे (संसार-सागर रो) पार हो गए हैं, जिन्होंने कोई जप नहीं किया, कोई तपस्या नहीं की, जिनकी कोई उच्च जाति नहीं थी और जिनके कर्म भी शुभ नहीं थे॥ २॥ १॥
14रागु गउड़ी रविदास जी के पदे गउड़ी गुआरेरी
15ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥
16हे प्रभु ! मुझे दिन-रात यह चिन्ता लगी रहती है कि मेरी संगति बुरी है (अर्थात् नीच लोगों के साथ मेरा रहन-सहन है),
17मेरे कर्म भी कुटिल हैं और मेरा जन्म भी नीच जाति में से है॥ १॥
18हे मेरे राम ! हे गुसाई ! हे मेरे प्राणों के सहारे !
19मुझे मत भुलाओ, मैं तेरा सेवक हूँ॥ १॥ रहाउ ॥
20हे प्रभु ! मेरी विपत्ति दूर कीजिए और मुझ सेवक को अपनी श्रेष्ठ प्रीति प्रदान कीजिए।
21मैं तेरे चरण नहीं छोडूंगा, चाहे भेरे शरीर की शक्ति भी चली जाए॥ २॥
22हे रविदास ! मैंने तेरी शरण ली है, हे प्रभु !
23अपने सेवक को शीघ्र मिल एवं विलम्ब मत कर ॥ ३॥ १॥
24बेगमपुरा (उस) शहर का नाम है।
25उस स्थान पर कोई दुःख एवं क्लेश नहीं।
26वहाँ सांसारिक धन नहीं और न ही उस धन को चुंगी लगने का भय है।
27वहाँ न कोई खौफ, न भूल, न ही प्यास और न ही कोई गिरावट है॥ १॥
28हे मेरे भाई ! मुझे वहीं वराने के लिए सुन्दर वतन मिल गया है।
29वहाँ सदा सुख-मंगल ही है॥ १॥ रहाउ ॥
30प्रभु की सत्ता दृढ, स्थिर एवं सदैव ही है।
31दूसरा अथवा तीसरा कोई नहीं, सब एक जैसे हैं,
32यह शहर हमेशा मशहूर है और समृद्ध है।
33वहाँ धनवान एवं तृप्त लोग रहते हैं।॥ २॥
34वे उस मालिक के मन्दिर के जानकार हैं, इसलिए उन्हें कोई नहीं रोकता।
35जिस तरह उनको भला लगता है, वैसे ही वहाँ विचरण करते हैं।
36बैंधनों से मुक्त हुआ चमार रविदास कहता है-
37जो मेरे शहर का वासी है, वह मेरा मित्र है॥ ३ ॥ २ ॥
38ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
39गउड़ी बैरागणि रविदास जीउ ॥
40प्रभु का मार्ग बड़ा विषम एवं पहाड़ी है और मेरा बैल निर्गुण (छोटा-सा) है।
41प्रियतम प्रभु के समक्ष मेरी वन्दना है-हे मुरारी ! मेरी पूँजी की तुम स्वयं रक्षा करना॥ १॥
42क्या कोई राम का व्यापारी है, जो मेरे साथ मिलकर चले ? मेरा माल (नाम-धन) भी लदा हुआ जा रहा है॥ १॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं