सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 344 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji

1इस परिश्रम का ऐसा फल मिलेगा जो कभी खत्म नहीं होगा, ऐसा सुन्दर जीवन जियोगे जो सदा स्थिर रहेगा ॥ १०॥

2दसमी-दसों दिशाओं में आनन्द ही आनन्द विद्यमान है।

3दुविधा दूर हो जाती है और गोबिन्द मिल जाता है।

4ज्योति-स्वरूप का तत्व अनूप है।

5वह पवित्र एवं मलिनता रहित है जहाँ यह बसता है, वहाँ कोई छाया अथवा धूप नहीं ॥ ११॥

6एकादशी-यदि इन्सान एक परमात्मा की स्मृति में लीन रहे तो

7वह दोबारा योनियों के संकट में नहीं आता,

8उसका शरीर शीतल एवं निर्मल हो जाता है।

9प्रभु जो दूर कहा जाता है, उसे वह निकट ही पा लेता है॥१२॥

10द्वादशी - आकाश में बारह सूर्य चढ़ जाते है

11और दिन रात अनहद वाजे बजते है

12तीनो लोकों के पिता-प्रभु को देख लेता है।

13एक आश्चर्यजनक खेल बन जाता है कि वह मनुष्य साधारण पुरुष से प्रभु-रूप हो जाता है॥ १३॥

14त्रयोदशी-धार्मिक ग्रंथ कहते हैं कि

15आकाश-पाताल दोनों में प्रभु की पहचान करो।

16उसके लिए कोई ऊँचा अथवा निम्न और न ही आदर वाला अथवा निरादर वाला है।

17सर्वव्यापक राम सबके भीतर एक समान समाया हुआ है॥ १४॥

18चतुदर्शी-चौदह लोकों एवं

19रोम-रोम में मुरारी प्रभु बसता है।

20हे भाई ! अपना ध्यान सत्य एवं संतोष में लगाओो।

21ब्रह्म-ज्ञान की कथा कथन करो ॥ १५॥

22पूर्णिमा के दिन आकाश में पूर्ण चाँद होता है।

23इसकी किरणों की कला से सहज ही प्रकाश फैल जाता है।

24आदि, अंत एवं मध्य में प्रभु पूर्णतया स्थिर हो रहा है।

25कबीर सुखों के सागर में लीन हुआ है॥ १६ ॥

26ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

27राग गउड़ी सप्ताह के दिन कबीर जी के वार

28सप्ताह के सभी दिन हरि का गुणगान करो।

29हे भाई ! गुरु के चरणों में पहुँचकर ईश्वर का रहस्य प्राप्त करो ॥ १॥ रहाउ ॥

30रविवार-प्रभु की भक्ति प्रारम्म करो और

31शरीर रूपी मन्दिर में ही तृष्णाओं को वश में करो।

32जब दिन-रात मनुष्य की वृति अखंड स्थान पर लगी रहती है तो

33बांसुरी सहज ही अनहद बजाती है॥ १॥

34सोमवार-चन्द्रमा से अमृत टपकता है।

35जब (यह अमृत) चखा जाता है तो यह तुरन्त ही सारे विष (विकारों) को दूर कर देता है।

36गुरु की वाणी के प्रभाव से संयमित मन प्रभु के द्वार पर टिका रहता है और

37मतवाला मन उस अमृत का पान करता रहता है ॥ २ ॥

38मंगलवार-यथार्थ को देख और

39कामादिक पाँच चोरों के आक्रमण करने के ढंग को समझ।

40हे भाई ! अपने किले को छोड़कर बाहर कभी मत जाना (अर्थात् अपने मन को बाहर मत भटकने देना)

41अन्यथा प्रभु बहुत ही कुद्ध होगा ॥ ३॥

42बुधवार-मनुष्य अपनी बुद्धि से प्रभु-नाम का प्रकाश पैदा कर लेता है,

43हृदय कमल में प्रभु का निवास बना लेता है।

44गुरु से मिलकर उसे सुख एवं दुःख दोनों को एक समान समझना चाहिए।

45अपने हृदय के उल्टे कमल को लेकर सीधा करना चाहिए॥ ४ ॥

46वृहस्पति-मनुष्य को अपने पाप धो देने चाहिए (अर्थात् विकार दूर कर देने चाहिए)

47तीन देवताओं को छोड़कर उसे एक ईश्वर से मन लगाना चाहिए।

48वह माया की त्रिगुणात्मक नदियों में ही गोते खाते हैं,

49दिन-रात नीच कर्म करते हैं, गुणस्तुति से विहीन रहकर उन्हें धोते नहीं हैं॥ ५॥

50शुक्रवार—उसका यह व्रत सफलता प्राप्त कर जाता है जो सहनशीलता की कमाई करता है,

51और जो रात-दिन अपने आप से युद्ध करता है ।

52यदि प्राणी अपनी पाँचों ही ज्ञानेन्द्रियों को वश में कर ले तो

53किसी पर भी कभी उसकी मेर-तेर की दृष्टि नहीं पड़ती ॥ ६ ॥

54शनिवार-जो मनुष्य प्रभु-ज्योति की बत्ती को स्थिर रखता है, जो उसकी अन्तरात्मा में हैं,

55वह भीतर से बाहर उज्ज्वल हो जाती है और

56तब उसके तमाम दुष्कर्म मिट जाते हैं।॥ ७॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं