गुरु ग्रंथ साहिब 343 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji
1मनुष्य ने बावन अक्षर जोड़ लिए हैं।
2परन्तु वह ईश्वर के एक शब्द को नहीं पहचान सकता।
3कबीर सत्य वचन कहता है कि
4पण्डित वही है, जो निडर होकर विचरता है।
5अक्षरों को जोड़ना पण्डित पुरुषों का काम-धंधा है।
6ज्ञानवान ज्ञानी मनुष्य यथार्थ को सोचता-समझता है।
7कबीर जी कहते हैं जैसी बुद्धि प्राणी के मन में है,
8वैसा ही वह समझता है॥ ४५ ॥
9ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
10रागु गउड़ी थित्तिं कबीर जी की ॥
11श्लोक ॥
12पन्द्रह तिथियाँ एवं सात सप्ताह के दिन हैं।
13कबीर कहता है-मैं उस ईश्वर का गुणानुवाद करता हूँ जो अनन्त है।
14साधक एवं सिद्ध जब प्रभु के रहस्य को समझ लेते हैं,
15वह स्वयं सृजनहार-स्वरूप एवं स्वयं ही प्रभु रूप हो जाते हैं।॥ १॥
16तिथि ॥
17अमावस्या के दिन अपनी अभिलाषाएँ त्याग कर
18अन्तर्यामी राम को (अपने हृदय में) स्मरण करो।
19इस प्रकार इसी जन्म में मोक्ष द्वार प्राप्त कर लोगे।
20(इस स्मरण के प्रभाव से) तुम्हारा यथार्थ तत्व जाग जाएगा, गुरु का शब्द अनुभवी रूप में संचरित होगा।॥ १॥
21जिस प्राणी का प्रेम गोविन्द के सुन्दर चरणों के साथ बन जाता है और
22संतों की कृपा से जिसका मन पवित्र हो जाता है, वह रात-दिन हरि का भजन करने में जागता रहता है॥ १॥ रहाउ ॥
23एकम तिथि के दिन हे भाई ! प्रियतम प्रभु का चिन्तन करो।
24अनन्त प्रभु हरेक ह्रदय में खेल रहा है।
25मृत्यु का भय उसे कभी स्पर्श नहीं कर सकता
26जो मनुष्य आदिपुरुष परमात्मा में लीन रहता है ॥ २॥
27द्वितीय-हे भाई ! समझ ले कि शरीर के अंग में (माया और ब्रह्म) दोनों खेल रहे हैं।
28माया एवं ब्रह्म कण-कण से अभेद हुए हैं।
29प्रभु न बढ़ता है और न ही घटता है
30वह अकुल, निरंजन एक ही है ॥ ३॥
31तृतीय-यदि प्रभु की स्तुति करने वाला मनुष्य माया के तीनों गुणों को सहज अवस्था में समान रखता है,
32वह मनुष्य परम पद प्राप्त कर लेता है, जो आनंद का स्रोत है।
33सत्संगति में रहकर मनुष्य के भीतर यह विश्वास पैदा होता है कि
34भीतर-बाहर सर्वत्र उस प्रभु का ही प्रकाश है॥ ४॥
35चतुर्थीं-हे प्राणी ! अपने चंचल मन को वश में करके रख और
36काम, क्रोध की संगति में मत बैठ ।
37जो ईश्वर समुद, पृथ्वी में सर्वत्र आप ही मौजूद है,
38वह स्वयं ही अपना जाप करता है॥ ५॥
39पंचमी-यह संसार पाँच मूल अंशों का विस्तार है।
40स्वर्ण (धन) एवं स्त्री की तलाश इसके दो धन्धे हैं।
41कोई विरला पुरुष ही प्रभु-प्रेम का सुधारस पान करता है।
42वह दोबारा बुढ़ापा एवं मृत्यु का दु:ख सहन नहीं करता॥ ॥
43षष्ठी-मनुष्य की पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ एवं छठा मन-यह सारा साथ संसार (के पदार्थों की लालसा) में भटकता फिरता है,
44जब तक प्राणी ईश्वर के स्मरण में नहीं लगता, तब तक यह साथ (इन भटकावों में से) हटता नहीं।
45हे बन्धु ! दुविधा मिटाकर सहनशीलता धारण करो और
46धर्म-कर्म का यह लम्बा विवाद त्याग दे ॥ ७ ॥
47सप्तमी-हे भाई ! गुरु की वाणी में श्रद्धा धारण करो और
48इसके द्वारा प्रभु (के नाम) को अपने हृदय में पिरो लो।
49इस प्रकार दुविधा दूर हो जाएगी और दुःख-क्लेश मिट जाएँगे और
50वैकुंठी सरोवर का सुख प्राप्त करोगे॥ ८ ॥
51अष्टमी-यह शरीर आठ धातुओं का बना हुआ है।
52इसमें महानिधि अगाध प्रभु बस रहा है।
53ज्ञान को जानने वाला गुरु यह रहस्य बतलाता है।
54सांसारिक मोह से हटकर मनुष्य अमर प्रभु में बसता है॥ ९॥
55नवमी-हे भाई ! शारीरिक इन्द्रियों को वश में रखो,
56इनसे उठती हुई तृष्णाओं पर अंकुश लगाओ।
57लोभ तथा मोह इत्यादि विकार भुला दो।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं