गुरु ग्रंथ साहिब 342 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji
1वह (प्रभु के द्वार का) स्तुति करने वाला (माया-मोह के) बन्धनों का रहस्य पा लेता है॥२९॥
2भ-दुविधा को भेदने (दूर करने) से मनुष्य का प्रभु से मिलन हो जाता है।
3भय को नाश करके अब मेरी ईश्वर में श्रद्धा बन गई है।
4जिसे मैं अपने आप से बाहर ख्याल करता था, उसे अब मैं अपने भीतर समझता हूँ।
5जब मुझे इस भेद का ज्ञान हुआ तो मैंने जगत् के मालिक को पहचान लिया ॥ ३०॥
6म-यदि सृष्टि के मूल परमात्मा को अपने मन में बसा लिया जाए तो
7मन कुमार्गगामी होने से बच जाता है।
8जो जीव यह रहस्य पा लेता है, वह मन को समझ लेता है। (इसलिए) कोई भी मनुष्य अपनी आत्मा को प्रभु के साथ सम्मिलित करने में देरी न करे।
9जो मनुष्य सत्यस्वरूप परमात्मा को पा लेते हैं, वे प्रसन्नता में भीग जाते हैं।॥ ३१॥
10जीवात्मा का काम अपने मन के साथ है। जो मन को वश में करता है, वह मनोरथ की सफलता पा लेता है।
11कबीर जी कहते हैं-मेरा आदान-प्रदान केवल अपने मन से है। मुझे मन जैसा दूसरा कोई नहीं मिला ॥ ३२ ॥
12यह मन शक्ति है। यह मन शिव है।
13यह मन शरीर के पाँच तत्वों के प्राण हैं।
14अपने मन को वश में करके जब मनुष्य परम-प्रसन्नता की अवस्था में विचरता है
15तो वह तीनों लोकों के रहस्य बता सकता है॥ ३३ ॥
16य-(हे भाई !) यदि तुम कुछ जानते हो तो अपनी दुर्बुद्धि का नाश कर दो और अपने शरीर रूपी गांव को वश में करो।
17यदि तू इस युद्ध में लगकर पराजित नहीं होवोगे तो ही तेरा नाम शूरवीर हो सकता है॥ ३४ ॥
18र-जिस प्राणी ने माया के स्वाद को फीका-सा समझ लिया है,
19उसने भौतिक आस्वादनों से बचे रहकर वह आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है।
20जिसने यह लौकिक आस्वादन त्याग दिए हैं, उसे वह (ईश्वर के नाम का आनन्द) प्राप्त हो गया है,
21जिसने वह (नाम) रस पान किया है, उसे (यह माया वाला) आस्वादन अच्छा नहीं लगता ॥ ३५ ॥
22ल-अपने मन में मनुष्य को प्रभु से ऐसा प्रेम लगाना चाहिए कि
23वह किसी दूसरे के पास मत जाए और सत्य को प्राप्त करे और
24यदि वहाँ, वह उसके लिए प्रेम एवं प्रीति उत्पन्न कर ले,
25वह प्रभु को प्राप्त कर लेता है और प्राप्त करके उसके चरणों में लीन हो जाता है।॥ ३६ ॥
26व-बार-बार अपने प्रभु को स्मरण कर।
27प्रभु को स्मरण करने से तुझे जीवन रूपी बाजी में पराजित नहीं होना पड़ेगा।
28मैं उन भक्तजनों पर तन-मन से न्यौछावर हूँ जो प्रभु का यश गाते हैं।
29प्रभु को मिलने से सत्य प्राप्त होता है॥ ३७॥
30व-(हे भाई !) उस परमेश्वर के साथ जान-पहचान करनी चाहिए। उसे अनुभव करने से यह जीव उस जैसा ही हो जाता है।
31जब यह जीव एवं वह प्रभु एकरूप हो जाते हैं तो इस मिलन को कोई नहीं समझ सकता ॥ ३८ ॥
32स-उस मन को पूर्णतया साध लो।
33अपने आपको हरेक बात से रोको, जो मन को बहकाती है।
34जब प्रभु का प्रेम उत्पन्न हो जाता है तो मन प्रसन्न हो जाता है।
35वह तीन लोकों का राजा हर जगह मौजूद है॥३९॥
36ख-यदि कोई मनुष्य प्रभु की खोज में लग जाए और उसे खोज कर पा लेता है तो वह दोबारा जन्मता-मरता नहीं।
37जब मनुष्य प्रभु को खोजता, समझता एवं उसका चिन्तन करता है तो
38उसे भयानक संसार-सागर से पार होते देरी नहीं लगती॥ ४०॥
39स-जिस जीव-स्त्री की सेज को कंत - प्रभु सुशोभित करता है,
40वह अपने संदेह को दूर कर देती है।
41तुच्छ सुख को त्याग कर वह परम सुख को पा लेती है।
42तब यह पत्नी कही जाती है और वह इसका पति कहलाता है॥ ४१ ॥
43ह-ईश्वर कण-कण में विद्यमान है परन्तु मनुष्य उसके अस्तित्व को नहीं जानता।
44जब वह उसके अस्तित्व को अनुभव कर लेता है, तो उसकी आत्मा विश्वस्त हो जाती है।
45ईश्वर तो अवश्य है लेकिन इस विश्वास का लाभ तब ही होता है जब कोई प्राणी इस बात को समझ ले।
46तब यह प्राणी उस प्रभु का रूप हो जाता है, यह अलग अस्तित्व वाला नहीं रह जाता॥ ४२॥
47समूचा संसार यही कहता फिरता है कि मैं (माया) सँभाल लूं, मैं (माया) एकत्रित कर लूं।
48इस माया के कारण ही फिर प्राणी को बड़ी चिन्ता हो जाती है।
49परन्तु जब प्राणी लक्ष्मीपति प्रभु के साथ प्रीति लगाता है तो
50उसकी चिन्ता मिट जाती है और वह समस्त सुख प्राप्त कर लेता है॥ ४३॥
51ख-अनेकों ही मनुष्य मरते-खपते नाश हो गए हैं।
52इस तरह मरते-खपते आवागमन में पड़ा हुआ मनुष्य अभी तक प्रभु को स्मरण नहीं करता।
53अब यदि संसार के यथार्थ को समझकर मन प्रभु में टिक जाए तो
54जिस प्रभु से यह जुदा हुआ है, उसमें इसे बसेरा मिल सकता है॥ ४४ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं