गुरु ग्रंथ साहिब 341 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji
1झ-हे जीव ! तू दुनिया (के मोह) में उलझ गया है और अपने आपको इससे मुक्त करवाना नहीं जानता।
2तुम संकोच कर रहे हो और ईश्वर को स्वीकृत नहीं हुए।
3दूसरों को संतुष्ट करवाने के लिए तुम क्यों वाद-विवाद करते हो ?
4क्योंकि झगड़ा करने से झगड़ा ही तुझे मिलेगा ॥ १५॥
5ञ-वह परमात्मा तेरे निकट तेरे हृदय में बसता है, उसे छोड़कर तू दूर कहाँ जाता है ?
6जिस प्रभु के लिए मैंने सारा जगत् खोजा है, उसे मैंने निकट ही प्राप्त कर लिया है॥ १६॥
7ट-ईश्वर का कठिन मार्ग मनुष्य के हृदय में ही है।
8कपाट खोलकर तू क्यों उसके महल में नहीं पहुँचता ?
9सदा स्थिर प्रभु को देखकर तुम डगमगा कर कहीं नहीं जाओगे।
10तुम प्रभु से लिपटे रहोगे और तेरा हृदय प्रसन्न होगा ॥ १७ ॥
11ठ-(हे जीव !) इस माया की मृगतृष्णा के जल से अपने आपको दूर रख।
12बड़ी मुश्किल से मैंने अपने मन को धैर्यवान किया है।
13जिस छलिए ने सारे जगत् को छल कर निगल लिया है।
14मैंने उस छलिया (प्रभु) को छल लिया है, मेरा ह्रदय अब सुख में है॥ १८ ॥
15ड-जब प्रभु का डर उत्पन्न हो जाता है तो दूसरे डर निवृत्त हो जाते हैं।
16उस डर में दूसरे डर लीन रहते हैं।
17जब मनुष्य प्रभु के डर को त्याग देता है तो उसे दूसरे डर आकर लिपट जाते हैं।
18यदि वह निडर हो जाए तो उसके मन के डर दौड़ जाते हैं।॥ १६ ॥
19ढ-ईश्वर तो तेरे समीप ही है, तू उसे कहाँ ढूंढता है?
20बाहर ढूंढते-ढूंढते तेरे प्राण भी थक गए हैं।
21सुमेर पर्वत पर भी चढ़कर और ईश्वर को ढूंढते-ढूंढते जब मनुष्य अपने देहि में आता है (अर्थात् अपने भीतर देखता है),
22तो वह ईश्वर इस (देहि रूपी) किले में ही मिल जाता है, जिसने यह देहि-रूपी किला रचा है॥ २० ॥
23ण-रणभूमि में जूझता हुआ जो व्यक्ति विकारों को वश में करने की सामथ्र्य हासिल कर लेता है,
24जो न झुकता है और न ही विकारों से मेल करता है,
25संसार उसी व्यक्ति को तकदीर वाला मानता है,
26क्योंकि वह मनुष्य एक मन को मारता है और इन अधिकतर विकारों को त्याग देता है॥ २१॥
27त-यह नश्वर दुनिया एक ऐसा सागर है, जिसे पार करना विषम है,
28जिसमें से पार हुआ नहीं जा सकता (क्योंकि) नेत्र, कान, नाक इत्यादि ज्ञानेन्द्रियाँ दुनिया के रसों में डूबे रहते हैं,
29परन्तु जब दुनिया के रस देहि के भीतर ही नाश हो जाते हैं
30तब (प्राणी की) आत्मा परम ज्योति में लीन हो जाती है, तब सत्य स्वरुप परमात्मा मिल जाता है॥ २२ ॥
31थ-परमेश्वर अथाह है। उसकी गहराई जानी नहीं जा सकती।
32प्रभु अनन्त है परन्तु यह शरीर स्थिर नहीं रहता (अर्थात् मिट्टी हो जाता है)
33थोड़ी-सी भूमि पर मनुष्य नगर का निर्माण प्रारम्भ कर देता है।
34स्तम्भों के बिना वह महल को तहराना चाहता है॥ २३ ॥
35द-जो यह जगत् दिखाई दे रहा है, यह समूचा नाशवान है,
36(हे भाई !) तू सदा ईश्वर में वृति लगा, जो (इन नेत्रों से) दिखाई नहीं देता है।
37लेकिन जब दसम द्वार में ज्ञान की कुंजी लगाई जाती है
38तो दयालु ईश्वर के दर्शन किए जा सकते हैं।॥ २४॥
39ध-यदि मनुष्य निम्न मण्डल से उच्च मण्डल को उड़ान भर ले तो सारी बात समाप्त हो जाती है।
40धरती एवं गगन में ईश्वर का बसेरा है।
41जब धरती को त्याग आत्मा गगन में जाती है तो
42आत्मा एवं परमात्मा मिल जाते हैं और सुख प्राप्त होता है॥ २५॥
43न-प्रभु को देखते प्रतीक्षा में मेरी रात्रि एवं दिन गुजरते हैं।
44इस तरह देखने से (प्रतीक्षा में) मेरे नेत्र रक्त समान लाल हो गए हैं।
45दर्शन की अभिलाषा करते-करते जब अंततः दर्शन होता है तो
46वह इष्ट-प्रभु दर्शन के अभिलाषी अपने भक्त को अपने साथ मिला लेता है॥ २६॥
47प-परमात्मा अपार है और उसका पार जाना नहीं जा सकता।
48मैंने परम ज्योति (प्रभु) से प्रेम लगा लिया है।
49जो कोई मनुष्य अपनी पाँचों-ज्ञानेन्द्रियों को वश में कर लेता है,
50वह पाप एवं पुण्य दोनों से मुक्ति पा लेता है॥ २७॥
51फ-फूल के बिना ही फल उत्पन्न हुआ है।
52यदि कोई मनुष्य उस फल की फांक को देख ले और उस फांक का चिन्तन करता है,
53वह (जन्म-मरण) आवागमन में नहीं पड़ता।
54फल की वह फांक समस्त शरीरों को फाड़ देती है॥ २८ ॥
55ब-जब बूंद से बूंद मिल जाती है तो
56यह बूंदें पुनः अलग नहीं होती।
57प्रभु का सेवक बनकर जो मनुष्य प्रेमपूर्वक प्रभु-भक्ति करता है,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं