सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 33 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1सतिगुरु के मिलन से प्रायः हृदय में परमात्मा का भय रहता है और वह स्वयं ही मन में आकर निवास करता है॥ १॥

2हे जीव ! गुरुमुख होकर कोई विरला ही इस भेद को जान सकता है।

3इस भेद को समझे बिना कर्म करने से सम्पूर्ण जीवन को व्यर्थ गंवाना है॥ १॥ रहाउ ॥

4जिसने नाम-रस को चखा है, उसी ने इसका स्वाद पाया है, अर्थात्-जिस जीव ने प्रभु-नाम का सिमरन किया, उसी ने इसका आनंद अनुभव किया है, नाम-रस चखे बिना तो वह भ्रम में ही भटकते हैं।

5परमात्मा का सत्य नाम अमृत समान है, उसका आनंद वर्णन नहीं किया जा सकता।

6जिस जीव ने इस नामामृत का पान किया, यह पीते ही उस प्रभु के दरबार में स्वीकृत हो गया तथा वह परिपूर्ण पारब्रह्म में अभेद हो गया ॥ २ ॥

7यह नाम भी यदि वह प्रभु स्वयं कृपालु होकर प्रदान करे तो मिलता है अन्यथा और कुछ नहीं किया जा सकता।

8उस देने वाले प्रभु के हाथ में ही यह बख्शिश है लेकिन उस दाता को गुरु द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

9जीव ने पूर्व जन्म में जो कर्म किए हैं, उनके अनुसार ही अब फल प्राप्त हुआ है और जो वर्तमान में कर्म वह कर रहा है, उस अनुसार फल भविष्य में प्राप्त होगा ॥ ३ ॥

10संयम, सत्य और इन्द्रिय-निग्रह ये सभी नाम के अंतर्गत आते हैं, नाम के बिना मन निर्मल नहीं होता।

11सौभाग्य से ही जीव के मन में नाम बसता है, जिससे परमात्मा से मिलाप होता है।

12नानक देव जी कथन करते हैं कि जो जीव स्वाभाविक ही प्रभु के प्रेम-रंग में रमण करता है, वही हरि-गुणों को प्राप्त करता है ॥ ४॥ १७ ॥ ५0॥

13श्रीरागु महला ३ ॥

14बेशक यदि जीव शरीर द्वारा साधना कर ले,कठिन तप कर ले, किन्तु यह सब कर लेने से उसके अंतर्मन से अहंत्व नहीं मिट जाता।

15आत्म-ज्ञान हेतु किए जाने वाले बाह्य कर्म भी कर ले, तब भी वह कभी प्रभु-नाम प्राप्त नहीं कर सकता।

16परंतु जो जीव गुरु-उपदेश द्वारा जीवित मरता है अर्थात मोह -माया से अनासक्त होता है, उसके हृदय में आकर ही प्रभु का नाम बसता है॥ १॥

17हे मेरे जीव रूपी मन ! सुनो, तुम सतिगुरु की शरण में जाओ।

18गुरु की कृपा द्वारा ही माया के मोह से बचा जा सकता है और विषय-विकारों से लिप्त भवसागर को पार किया जा सकता है॥ १॥ रहाउ॥

19समस्त जीव त्रिगुणात्मक माया की ओर भागते हैं और इसमें जो द्वैत-भाव है, वही विकारों की उत्पत्ति करने वाला है।

20वेद-शास्त्रादि को पढ़ने वाला पंडित भी मोहपाश में बँधा हुआ है, तथा माया के वश में होने के कारण परमात्मा को भी नहीं बूझता।

21सतिगुरु के मिलाप द्वारा त्रिकुटी छूट जाती है तथा में पहुँच कर मोक्ष-द्वार की प्राप्ति होती है॥ २॥

22यदि गुरु के उपदेश द्वारा ज्ञान-भक्ति रूपी मार्ग पर जीव चले तो मोह रूपी गर्द(धुंद) दूर हो जाती है।

23यदि जीव गुरु के उपदेश में लीन होकर माया के मोह से मृत हो जाए तो वह भवसागर से तर जाता है।

24गुरु की कृपा द्वारा ही मानव जीव सत्य नाम वाले परमात्मा को मिल सकता है ॥ ३ ॥

25यह चंचल मन अत्यंत बलशाली है, किसी भी यत्न से यह मन जीव को नहीं छोड़ता।

26द्वैत-भाव वालों को यह मन कष्ट देता है तथा बहुत यातना देता है।

27गुरु जी कथन करते हैं कि जो जीव गुरु उपदेश द्वारा अहंत्व को गंवा कर नाम-सिमरन में लीन रहते हैं, वे यमों की यातना से बच गए हैं ॥ ४॥ १८ ॥ ५१॥

28श्रीरागु महला ३ ॥

29जब परमेश्वर कृपा करता है, तब गुरु की प्राप्ति होती है, और गुरु हरिनाम को दृढ़ करवा देता है।

30गुरु के बिना हरिनाम को किसी ने भी प्राप्त नहीं किया और नामहीन व्यक्तियों ने अपना जन्म व्यर्थ गंवाया है।

31अपने मन की बात मान कर जो व्यक्ति कर्म करते हैं, उन्हें परमात्मा की सभा में सज़ा मिलती है॥ १॥

32हे मन ! तू द्वैत-भाव को दूर कर दे।

33क्योंकि तेरे अंदर हरि का वास है, उसकी प्राप्ति के लिए गुरु की सेवा करो, तभी सुखों की प्राप्ति होगी॥ रहाउ॥

34जब जीव सत्य-स्वरूप परमात्मा से प्रेम करता है तो उसके वचन एवं कर्म सत्य हो जाते हैं।

35परमात्मा का नाम मन में बस जाए तो अहम् व क्रोधादि समस्त विकार निवृत्त हो जाते हैं।

36निर्मल मन से प्रभु के नाम का ध्यान करने से ही जीव मोक्ष द्वार को प्राप्त करता है॥ २॥

37अहंकार में ही सम्पूर्ण जगत् नष्ट होता है तथा पुनःपुनः आवागमन के चक्र में पड़ा रहता है।

38स्वेच्छाचारी जीव गुरु-उपदेश को नहीं जानते, इसलिए वे अपना सम्मान गंवा कर चले जाएँगे।

39गुरु-सेवा द्वारा प्रभु नाम प्राप्त होता है और उस सत्य स्वरूप परमात्मा में लीन होते हैं। ॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं