सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 338 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji

1उसका हृदय प्रसन्न नहीं और भगवान के दर्शनों की आशा में वह अपने चरण पीछे नहीं हटाती॥ १॥

2हे काले कौए ! उड़ जा,

3चूंकि जो मैं अपने प्रियतम प्रभु को शीघ्र मिल जाऊँ॥ १॥ रहाउ॥

4कबीर जी कहते हैं जीवन पदवी प्राप्त करने के लिए भगवान की भक्ति करनी चाहिए।

5नारायण के नाम का ही एकमात्र सहारा होना चाहिए और जिह्म से राम को ही स्मरण करना चाहिए॥ २ ॥ १॥ १४॥ ६५॥

6रागु गउड़ी ११ ॥

7जिस मुरली मनोहर के आसपास तुलसी के सघन पौधे थे तथा जो तुलसी के वन में प्रेमपूर्वक गाएँ चराता गा रहा था,

8उसका दर्शन करके गोकुल की ग्वालिनी मुग्ध हो गई और कहने लगी, हे प्रियवर! मुझे छोड़कर किसी अन्य स्थान पर मत जाना॥ १॥

9हे सारिंगधर प्रभु! मेरा मन तेरे चरणों से लगा हुआ है,

10लेकिन तुझे वही मिलता है जो भाग्यशाली होता है॥ १॥ रहाउ॥

11वृंदावन मन को लुभाने वाला है, जहाँ मनोहर कृष्ण गौएँ चराता था।

12हे सारिंगधर ! मेरा नाम कबीर है, जिसका ठाकुर तू है॥ २ ॥ २ ॥ १५॥ ६६॥

13गउड़ी पूरबी १२ ॥

14कुछ व्यक्ति अनेक प्रकार के वस्त्र पहनते हैं। जंगल में बसेरा करने की क्या लाभ ?

15यदि धूप इत्यादि जलाकर देवताओं की पूजा कर ली तो क्या लाभ हुआ ? और यदि अपने शरीर को (तीर्थो के) जल में डुबा लिया तो क्या लाभ हुआ ?॥ १॥

16हे मन ! मैं जानता हूँ कि तुम (इस दुनिया से) चले जाओगे।

17हे मूर्ख प्राणी ! एक परमेश्वर को समझ।

18जो कुछ भी प्राणी अब देखता है, वह उसे दोबारा नहीं देखेगा परन्तु तो भी वह माया से लिपटा हुआ है। १॥ रहाउ॥

19कोई ज्ञान-चर्चा कर रहा है, कोई मनन कर रहा है, कोई दूसरों को उपदेश दे रहा है, लेकिन यह समूचा जगत् माया का जंजाल ही है।

20कबीर जी कहते हैं-एक राम का नाम-सिमरन किए बिना यह दुनिया माया ने ज्ञानहीन बनाई हुई है॥ २॥ १॥ १६॥ ६७॥

21गउड़ी १२ ॥

22हे मेरे मन ! भ्रम छोड़ दे और प्रत्यक्ष तौर पर नृत्य कर। चूंकि यह सब माया के झगड़े हैं।

23वह कैसा शूरवीर है जो आमने-सामने लड़ाई से डरता है और वह नारी सती नहीं हो सकती जो घर के बर्तन एकत्रित करने लग जाती है?॥ १॥

24हे मूर्ख मन ! डगमगाना त्याग दे।

25जिस नारी ने हाथ में सिंदूर लगाया हुआ नारियल ले लिया उसे तो अब जल कर ही सिद्धि प्राप्त होगी॥ १॥ रहाउ ॥

26सारी दुनिया काम, क्रोध एवं माया में लीन है। इस तरह यह दुनिया नाश हो रही है।

27कबीर जी कहते हैं तू राजा राम को मत त्याग, जो सर्वोपरि है॥ २॥ २॥ १७ ॥ ६८ ॥

28गउड़ी १३ ॥

29हे भगवान ! तेरा हुक्म मुझे मंजूर है और पुनः इस पर विचार नहीं करता।

30हे प्रभु ! तू ही दरिया है और तू ही मल्लाह है। तुझ से ही मेरा कल्याण है॥ १॥

31हे मनुष्य ! प्रभु की भक्ति स्वीकार कर,

32चाहे तेरा मालिक तुझ पर क्रोधित होवे अथवा तुझ से प्रेम करे॥१ ॥ रहाउ ॥

33(हे भगवान !) तेरा नाम ही मेरा ऐसे आधार है, जैसे फूल जल में खिला रहता है।

34कबीर जी कहते हैं-मैं तेरे घर का गुलाम हूँ, चाहे जीवित रखो, चाहे जीवन लीला समाप्त कर दो ॥ २ ॥ १८ ॥ ६९॥

35गउड़ी ॥

36हे जिज्ञासु ! चौरासी लाख जीवों की योनियों में भटक-भटक कर (श्रीकृष्ण का पालनहार पिता) नन्द बहुत थक गया था।

37उसकी भक्ति पर खुश होकर श्रीकृष्ण ने उसके घर अवतार धारण किया। तब उस बेचारे नन्द का भाग्य उदय हुआ।॥ १॥

38हे जिज्ञासु ! तुम कहते हो कि श्री कृष्ण नन्द का पुत्र था, वह नन्द स्वयं किसका पुत्र था ?

39जब यह धरती, आकाश एवं दसों दिशाएँ नहीं होते थे, तब यह नन्द कहाँ था ? ॥ १॥ रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं