गुरु ग्रंथ साहिब 337 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji
1लेकिन जीव सब झुठलाकर झूठा परपंच करके बैठ जाता है॥ २॥
2कई मनुष्यों ने पाँच लाख की सम्पति जोड़ ली है,
3मृत्यु आने पर उनकी भी शरीर-रूपी गागर टूट जाती है॥ ३॥
4कबीर जी कहते हैं--हे अभिमानी जीव ! तेरी जीवन की जो बुनियाद रखी गई है,
5वह एक पलक में ही नाश होने वाली है॥ ४॥ १॥ ९ ॥ ६०॥
6गउड़ी ॥
7हे मेरी आत्मा ! ऐसे राम का नाम जपो, जैसे धुव एवं भक्त प्रहलाद ने श्री हरि की आराधना की थी॥ १॥
8हे दीनदयालु! तेरे भरोसे पर
9मैंने अपना सारा परिवार ही तेरे नाम रूपी जहाज पर चढ़ा दिया है॥ १॥ रहाउ॥
10जब प्रभु को अच्छा लगता है तो वह (इस सारे परिवार से) अपना हुक्म मनवाता है,
11और इस प्रकार परिवार सहित इस जहाज को विकारों की लहरों से पार कर देता है॥ २॥
12गुरु की कृपा से मेरे भीतर ऐसी बुद्धि प्रकट हो गई है
13कि मेरा जन्म-मरण का चक्र ही मिट गया है। ३॥
14हे कबीर ! तू सारंगपाणि प्रभु का भजन कर,
15इस लोक एवं परलोक में सर्वत्र केवल वही दाता है॥ ४॥ २ ॥ १o ॥ ६१॥
16गउड़ी ९ ॥
17माँ का गर्भ छोड़कर जब प्राणी दुनिया में आता है तो
18(माया रूपी) हवा लगते ही मालिक-प्रभु को विस्मृत कर देता है॥ १॥
19हे मेरे मन ! भगवान की महिमा-स्तुति कर॥ १॥ रहाउ॥
20(हे मन !) जब तू गर्भ योनि में उल्टा लटका हुआ तपस्या करता था
21तो तू पेट की अग्नि में रहता था॥ २ ॥
22जीव चौरासी लाख योनियों में भटकता हुआ इस दुनिया में आया है।
23लेकिन दुनिया में भी खाली घूमते हुए फिर कोई स्थान नहीं मिलता ॥ ३॥
24हे कबीर ! सारंगपाणि प्रभु का भजन कर,
25जो न जन्मता दिखता है और न मरता हुआ सुना जाता है।॥ ४॥ १॥ ११॥ ६२॥
26गउड़ी पूरबी ॥
27(हे जीव !) स्वर्ग में निवास के लिए कामना नहीं करनी चाहिए और न ही नरक में वास करने से डरना चाहिए।
28जो कुछ होना है, वह निश्चित ही होगा। इसलिए अपने मन में कोई आशा मत रख॥ १॥
29(हे जीव !) भगवान की महिमा-स्तुति करते रहना चाहिए,
30इस प्रकार नाम रूपी सर्वश्रेष्ठ खजाना प्राप्त होता है॥ १॥ रहाउ॥
31क्या लाभ जप का, क्या तपस्या का, क्या संयम का, क्या व्रत का एवं क्या लाभ स्नान करने का।
32जब तक भगवान के साथ प्रेम एवं उसकी भक्ति की युक्ति ही नहीं आती ? ॥ २॥
33संपति देखकर खुश नहीं होना चाहिए और न ही विपत्ति देखकर रोना चाहिए।
34जो कुछ भगवान करता है वही होता है, जैसे संपति है वैसे ही विपत्ति है॥ ३॥
35कबीर जी कहते हैं-अब यह ज्ञान हुआ है (कि ईश्वर) संतों के हृदय में बसता है,
36वही सेवक सेवा करते हुए भले लगते हैं, जिनके हृदय में ईश्वर बसता है॥ ४॥ १॥ १२ ॥ ६३॥
37गउड़ी ॥
38हे मन ! अंतकाल तेरा कोईसहायक नहीं बनेगा, चाहे (दूसरे रिश्तेदारों का) भार खींचकर अपने सिर पर ले ले।
39जैसे पक्षियों का बसेरा वृक्षों पर होता है, वैसे ही इस दुनिया का निवास है॥ १॥
40हे भाई ! मैंने राम रस का पान किया है
41जिस रस से मुझे दूसरे रस (स्वाद) भूल गए हैं। ॥ रहाउ॥
42किसी दूसरे की मृत्यु पर विलाप करने का क्या अभिप्राय, जब हमने आप ही सदा निवास नहीं करना।
43जो-जो इन्सान जन्म लेता है, उसकी मृत्यु हो जाती है, फिर तो इस दुःख कारण मेरे भूत-प्रेत ही रोएँ॥ २ ॥
44जब इन्सान महापुरुषों की संगति में लगता है और नाम-अमृत पान करता है तो उसकी आत्मा उसमें लीन हो जाती है, जिससे वह उत्पन्न हुई थी।
45कबीर जी कहते हैं-मैंने अपने हृदय में राम को स्मरण किया है और उसे ही प्रेमपूर्वक याद करता हूँ॥ ३॥ २॥ १३॥ ६४॥
46रागु गउड़ी ॥
47आहें भरती और अश्रुओं से भरी ऑखों से जीव-स्त्री पति-प्रभु का मार्ग देखती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं