गुरु ग्रंथ साहिब 332 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji
1ज्ञान की अन्धेरी के पश्चात जो (नाम की) वर्षा होती है, उसमें तेरा भक्त भीग जाता है।
2कबीर जी कहते हैं- जब मैं सूर्य को उदय होता देखता हूँ तो मेरे हृदय में उजाला ही उजाला हो जाता है॥ २॥ ४३ ॥
3गउड़ी चेती
4ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
5कुछ लोग न कभी भगवान का यश सुनते हैं और न ही कभी भगवान के गुण गाते हैं,
6परन्तु अपनी व्यर्थ बातों से ही (मानो) आसमान को गिरा लेते हैं। १ ॥
7ऐसे लोगों को उपदेश देने का कोई अभिप्राय नहीं,
8जिन्हें भगवान ने अपनी भक्ति से वंचित रखा हुआ है, उनसे सदैव ही डरना चाहिए॥ १॥ रहाउ॥
9वे लोग स्वयं तो अंजुलि भर जल भी नहीं देते परन्तु
10उनकी निंदा करते हैं, जिन्होंने गंगा बहा दी है॥ २॥
11उठते-बैठते वे कुटिल चालें चलते हैं,
12वे तो स्वयं नष्ट हो गए हैं और दूसरों को भी नष्ट करते हैं।॥ ३॥
13व्यर्थ वाद-विवाद के बिना वह अन्य कुछ नहीं जानते।
14वह ब्रह्मा जी की बात भी नहीं मानते॥ ४॥
15ऐसे लोग आप कुमार्गगामी हुए हैं और दूसरों को भी गुमराह ही करते हैं,
16वे मानो मन्दिर में आग लगाकर सो रहे हैं।॥ ५॥
17वे स्वयं तो एक ऑख वाले काने हैं लेकिन दूसरों की हँसी उड़ाते हैं।
18हे कबीर ! ऐसे लोगों को देखकर मुझे लज्जा आती है॥ ६॥ १॥ ४४॥
19रागु गउड़ी बैरागणि कबीर जी
20ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
21मनुष्य अपने पूर्वजों (माता-पिता) की उनके जीवित रहने तक तो सेवा नहीं करते परन्तु (उनके) मरणोपरांत पितरों का श्राद्ध करवाते हैं।
22बताओ, बेचारे पितर भला श्राद्धों का भोजन कैसे पाएँगे ? इसे तो कौए-कुते खा जाते हैं।॥ १॥
23कोई मुझे बताओ कि सुख-खुशी क्या है?
24सारी दुनिया (इसी दुविधा में) सुख-मंगल कहती मरती जा रही है (कि श्राद्ध कराने से घर में सुख मिलता है) आत्मिक सुख किस प्रकार प्राप्त हो सकता है? ॥ १॥ रहाउ॥
25लोग मिट्टी के देवी-देवता बनाकर उस देवी या देवता के समक्ष जीवों की बलि देते हैं।
26(हे भाई !) इसी प्रकार तुम्हारे मृत पितर कहे जाते हैं, जो कुछ वह लेना चाहते हैं, कह कर नहीं ले सकते॥ २॥
27लोग जीवित जीवों को मारते हैं और निर्जीव (मिट्टी के बनाए हुए) देवताओं की पूजा करते हैं। अंतकाल (मृत्यु के समय) तुम्हें बहुत मुश्किल होगा।
28आप राम के नाम की गति नहीं जानते, (इससे) आप भयानक संसार सागर में डूब जाओगे ॥ ३॥
29हे नश्वर प्राणी ! तुम लोग देवी-देवताओं की पूजा करते हो। अपने भरोसे में डावांडोल होते रहते हो और पारब्रह्म को नहीं समझते।
30कबीर जी कहते हैं-आप लोग कुलरहित भगवान को याद नहीं करते और माया के विकारों में फंसे रहते हो ॥ ४ ॥ १॥ ४५ ॥
31गउड़ी ॥
32मनुष्य को विकारों की ओर से जीवित ही मरे रहना चाहिए और विकारों की ओर से मरकर प्रभु-नाम के द्वारा दोबारा जीना चाहिए। इस प्रकार वह निर्गुण प्रभु में लीन हो जाता है।
33वह माया में रहता हुआ भी माया-रहित परमात्मा में रहकर दोबारा भयानक संसार-सागर में नहीं पड़ता॥ १॥
34हे मेरे राम ! ऐसे दूध मंथन किया जा सकता है।
35गुरु का उपदेश लेकर मन को स्थिर रख। इस विधि से प्रभु नाम का अमृत पान किया जा सकता है॥ १॥ रहाउ ॥
36गुरु के बाण ने वज़ कलियुग को छेद दिया है और प्रकाश की अवस्था मुझ पर प्रकाशमान हुई है।
37शक्ति के अंधेरे के कारण रस्सी को सॉप समझने की मेरी दुविधा दूर हो गई है और मैं अब प्रभु के निहचल मन्दिर में निवास करता हूँ॥ २॥
38हे मेरे भाई ! उस माया ने तीर के बिना ही धनुष खींचा है और इस संसार को छेद दिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं