सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 329 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji

1अपने मन को मार कर कौन सिद्ध बना है ? ॥ १॥

2वह कौन-सा मुनि है, जिसने अपने मन को मार दिया है?

3कहो, मन को नष्ट करके वह किसका कल्याण करता है ? ॥ १॥ रहाउ॥

4मन के द्वारा ही हरेक मनुष्य बोलता है।

5मन को मारे बिना प्रभु की भक्ति नहीं होती॥ २॥

6हे कबीर ! जो पुरुष इस भेद को समझता है,

7वह अपने मन में ही तीन लोकों के स्वामी मधुसूदन के दर्शन कर लेता है॥ ३॥ २८

8गउड़ी कबीर जी ॥

9वे झिलमिलाते तारे जो अन्तरिक्ष में नजर आ रहे हैं,

10किस चित्रकार ने चित्रित किए हैं ? ॥ १॥

11हे पण्डित ! बताओं, अन्तरिक्ष केिसके सहारे कायम है।

12इस बात को जानने वाला कोई भाग्यवान ही है॥ १॥ रहाउ॥

13सूर्य एवं चन्द्रमा (दुनिया में) उजाला करते हैं।

14इस सृष्टि में ईश्वर की ज्योति का ही प्रकाश फैला हुआ है।॥ २॥

15हे कबीर ! (इस रहस्य को) केवल वही मनुष्य समझेगा,

16जिसके हृदय में राम है और मुँह में भी केवल राम ही है॥ ३॥ २६॥

17गउड़ी कबीर जी ॥

18हे भाई ! यह स्मृति वेदों की पुत्री है।

19वह मनुष्यों हेतु (मानों कर्मकाण्ड की) जंजीरें एवं रस्सियों लेकर आई है॥ १॥

20इसने स्वयं ही अपने नगर में श्रद्धालु कैद कर लिए हैं।

21इसने मोह की फांसी में फॅसाकर मृत्यु का तीर खिंचा हुआ है।॥ १॥ रहाउ॥

22यह स्मृति-रूपी रस्सी श्रद्धालुओं से काटने पर भी नहीं काटी जा सकती और न ही यह टूटती है।

23यह नागिन बनकर दुनिया को निगल रही है॥ २॥

24हे कबीर ! हमारी ऑखों के समक्ष देखते ही देखते इस स्मृति ने सारी दुनिया को लूट लिया है,

25लेकिन मैं राम का सिमरन करके इससे छूट गया हूँ॥ ३॥ ३०॥

26गउड़ी कबीर जी ॥

27में अपने मन रूपी घोड़े को प्रशंसा-निंदा से वर्जित करने की पूंजी देकर प्यार की लगन की लगाम डालता हूँ

28और ईश्वर को हर जगह समझना -यह कार्ती डालकर मन को भगवान के देश की उड़ान भरता हूँ॥ १॥

29अपने स्वरूप के ज्ञान-रूपी घोड़े पर सवार हो जाओ तथा

30बुद्धि-रूपी चरण को सहज के रकाब में रखो॥ १॥ रहाउ॥

31हे मन रूपी घोड़े ! चल, तुझे स्वर्ग की सैर कराऊँ,

32यदि जिद्द करोगे तो मैं तुझे प्रेम की चाबुक मारूंगा॥ २॥

33हे कबीर ! ऐसे चतुर सवार, वेदों एवं कतेब से तटस्थ रहते हैं॥ ३॥ ३१ ॥

34गउड़ी कबीर जी ॥

35जिस मुख से पाँचों ही अमृत पदार्थ खाए जाते थे,

36(मरणोपरांत) उस मुख को अपने सामने ही लकड़ी जलाकर लगा दी जाती है।॥ १॥

37हे मेरे राम ! मेरा यह दुःख दूर कर दो ,

38यह जो तृष्णाग्नि जलाती है तथा बार-बार गर्भ का वास है॥ १॥ रहाउ॥

39(मरणोपरांत) यह सुन्दर शरीर अनेकों ढंग एवं विधियों से खत्म किया जाता है।

40कोई मनुष्य इसे अग्नि में जला देता है और कोई इसे मिट्टी में दफन कर देता है॥ २॥

41कबीर जी कहते हैं कि हे भगवान ! मुझे अपने चरणों के दर्शन करवा दीजिए,

42तदुपरांत चाहे यमराज को ही भेज देना॥ ३॥ ३२॥

43गउड़ी कबीर जी ॥

44भगवान स्वयं ही अग्नि है और स्वयं ही वायु है।

45यदि मालिक स्वयं ही (प्राणी को) जलाने लगे तो कौन रक्षा कर सकता है॥ १॥

46राम के नाम का जाप करते हुए चाहे नि:संदेह मेरा शरीर ही जल जाए?

47मेरा मन राम के नाम में मग्न रहता है॥ १॥ रहाउ॥

48न किसी का कुछ जलता है, न किसी का कोई नुक्सान होता है,

49परमेश्वर स्वयं ही सर्वत्र नटखट खेल कर रहा है॥ २ ॥

50हे कबीर ! तू ('राम’ के) दो अक्षर उच्चरित कर,

51यदि मेरा मालिक है तो मुझे भवसागर से बचा लेगा ॥ ३॥ ३३॥

52गउड़ी कबीर जी दुपदे ॥

53न ही मैंने योग विद्या की तरफ अपना ध्यान अथवा मन लगाया।

54फिर वैराग्य के बिना माया से मुक्ति नहीं हो सकती ॥ १॥

55मेरा जीवन कैसे व्यतीत होगा,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं