गुरु ग्रंथ साहिब 327 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji
1इस शरीर में करोड़ों ही रोग थे।
2ईश्वर का नाम-सिमरन करने से अब वे भी सहज सुख एवं समाधि में बदल गए हैं।
3मेरे मन ने अपने यथार्थ स्वरूप को पहचान लिया है,
4अब इसे ईश्वर ही ईश्वर दृष्टिमान हो रहा है, रोग एवं तीनों ताप प्रभावित नहीं कर सकते॥ २॥
5अब मेरा मन हटकर सनातन (ईश्वर का रूप) हो गया है,
6इस बात का तब ज्ञान होता है, जब यह मन माया में विचरण करता हुआ भी माया के मोह से सर्वोच्च हो गया।
7हे कबीर ! अब मैं सहज सुख में समा गया हूँ।
8इसलिए अब न मैं स्वयं किसी दूसरे से भयभीत होता हूँ और न ही किसी दूसरे को भयभीत करता हूँ॥ ३॥ १७॥
9गउड़ी कबीर जी ॥
10(प्रश्न) जब किसी महापुरुष का शरीर प्राण त्याग देता है तो आत्मा कहाँ चली जाती है?
11(उत्तर-) यह पवित्रात्मा शब्द के प्रभाव से अमर प्रभु में लीन हो जाती है।
12जो राम को समझता है, वही उसके स्वाद को अनुभव करता है,
13जैसे गूंगे मनुष्य का मन शक्कर खाने से संतुष्ट हो जाता है॥ १॥
14ऐसा ज्ञान ईश्वर ही प्रकट करता है।
15हे मन ! प्रत्येक श्वास से नाम-स्मरण कर, यही सुषुम्ना नाड़ी का अभ्यास है॥ १॥ रहाउ॥
16ऐसा गुरु धारण कर जो तुझे पुनः गुरु धारण करने की आवश्यकता न पड़े;
17ऐसा शब्द उच्चारण कर चूंकि जो तुझे और उच्चारण न करना पड़े।
18ऐसा ध्यान लगाओ कि फिर ध्यान लगाने की आवश्यकता ही न रहे।
19इस विधि से मरो कि तुझे जन्म-मरण के चक्र में न पड़ना पड़े॥ २ ॥
20मैंने अपने मन का ध्यान बदल दिया है इस प्रकार मैं गंगा और यमुना को मिला रहा हूँ।
21इस प्रकार (मैं उस मन-रूपी त्रिवेणी) संगम में स्नान कर रहा हूँ, जहाँ (गंगा, जमुना, सरस्वती वाला) जल नहीं है,
22अब मैं इन नेत्रों से सबको एक समान देख रहा हूँ। यही मेरा जीवन-व्यवहार है।
23एक ईश्वर का चिन्तन कर, और चिन्तन की आवश्यकता नहीं॥ ३ ॥
24जैसे जल, अग्नि, पवन, धरती एवं आकाश,
25ईश्वर के चरणों में लगकर मैं इस प्रकार का जीवन-आचरण कर रहा हूँ
26कबीर जी कहते हैं कि तू निरंजन प्रभु का ध्यान कर,
27जिससे उस घर में पहुँच जहाँ से लौटकर न आना पड़े॥ ४॥ १८ ॥
28गउड़ी कबीर जी तिपदे ॥
29अपने वजन जितना सोना दान देने से भगवान प्राप्त नहीं होता।
30मैंने तो अपना मन मूल्य के रूप में देकर राम को प्राप्त किया है॥ १॥
31अब मुझे आस्था हो गई कि राम मेरा अपना ही है,
32मेरा मन सहज स्वभाव उससे प्रसन्न है॥ १॥ रहाउ॥
33जिस ईश्वर के गुण बतला-बतलाकर ब्रह्मा ने भी अन्त नहीं पाया,
34यह ईश्वर मेरी राम-भक्ति से मेरे हृदय (घर) में बैठ गया है॥ २॥
35हे कबीर ! मैंने अपनी चंचल मति त्याग दी है,
36केवल राम की भक्ति ही मेरे अपने भाग्यों में आई हैI॥ ३॥ १॥ १९॥
37गउड़ी कबीर जी ॥
38जिस मृत्यु से सारी दुनिया भयभीत हुई रहती है,
39उस मृत्यु का यथार्थ गुरु के शब्द द्वारा प्रकट हो गया है (केि मृत्यु वास्तव में क्या है)॥ १॥
40अब मैं कैसे जन्म-मरण (के चक्र) में पडूंगा ?
41मेरे मन ने मृत्यु को वश में कर लिया है। जो लोग राम को नहीं जानते, वे बार-बार जन्मते -मरते रहते हैं।॥ १॥ रहाउ॥
42दुनिया में प्रत्येक प्राणी मृत्यु ‘मृत्यु' कह रहा है,
43केवल वही (मनुष्य) अमर होता है, जो ज्ञान द्वारा मरता है॥ २॥
44हे कबीर ! मेरे मन में आनंद उत्पन्न हो गया है।
45मेरी दुविधा का नाश हो गया है और परमानंद हृदय में स्थित है। ३॥ २० ॥
46गउड़ी कबीर जी ॥
47इस शरीर में कोई (विशेष) स्थान नहीं मिला जहाँ आत्मा को पीड़ा होती है तो फिर मैं औषधि कहाँ इस्तेमाल करूं ?
48मैंने अपने शरीर की खोज कर ली है, परन्तु मुझे कोई ऐसा स्थान नहीं मिला॥ १॥
49जिसे पीड़ा अनुभव हुई है, वही इसे जानता है।
50राम की भक्ति के बाण बड़े तीक्ष्ण हैं।॥ १॥ रहाउ॥
51मैं समस्त नारियों (जीव-स्त्रियों) को एक दृष्टि से देखता हूँ
52परन्तु मैं क्या जानूं कि कौन-सी नारी (जीव-स्त्री) पति-प्रभु की प्रिया है॥ २॥
53हे कबीर ! जिस जीव-स्त्री के माथे पर शुभ भाग्य हैं,
54पति-प्रभु सबको छोड़कर उसे आ मिलता है।॥ ३॥ २१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं