सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 326 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji

1उससे पहले मैंने ऐसे बहुत से शरीरों में निवास किया था॥

2हे राम ! जब मैं अपनी माता के गर्भ में डाला गया था १॥ रहाउ ॥

3मैं कभी योगी, कभी यती, कभी तपस्वी एवं कभी ब्रह्मचारी बना और

4कभी मैं छत्रपति राजा बना और कभी भिखारी बना॥ २॥

5शाक्त इन्सान मर जाएँगे परन्तु साधु सभी जीवित रहेंगे

6और अपनी जिव्हा से राम-अमृत का पान करेंगे ॥ ३॥

7कबीर का कथन है कि हे मेरे प्रभु ! मुझ पर कृपा करो,

8अब मैं थक-टूट गया हूँ, अब मुझे पूर्ण ज्ञान दीजिए॥ ४ ॥ १३ ॥

9गउड़ी कबीर जी की नालि रलाइ लिखिआ महला ५ ॥

10हे कबीर ! मैंने यह अदभुत कौतुक देखा है

11कि मनुष्य दहीं के अम में जल का मन्थन कर रहा है॥ १॥ रहाउ॥

12गधा हरी अंगूरी चरता है और

13प्रतिदिन उठकर वह हँसता, हींगता रहता है आखिरकार मर जाता है (अर्थात् मूर्ख जीव मनभावन विकार भोगता है, इस प्रकार हैंसता तथा ही-ही करता रहता है अंतः जन्म-मरण के चक्र में पड़ जाता है) ॥ १ ॥

14मतवाला भैसा अनियंत्रित होकर भागता फिरता है।

15वह नाचता, कूदता, खाता और आखिरकार नरक में पड़ जाता है॥ २॥

16हे कबीर ! यह अदभुत खेल प्रकट हो गई है।

17भेड़ हमेशा अपने लेले को चूंघती है।

18राम का नाम उच्चरित करने से मेरी बुद्धि उज्ज्वल हो गई है।

19हे कबीर ! गुरु ने मुझे यह ज्ञान प्रदान किया है॥ ४॥ १॥ १४॥

20गउड़ी कबीर जी पंचपदे ॥

21जैसे मछली जल को त्यागकर बाहर निकल आती है (तो पीड़ित होकर प्राण त्याग देती है, वैसे ही)

22मैंने भी पूर्व जन्मों में तपस्या नहीं की थी।॥ १॥

23हे मेरे राम ! अब बताओ, मेरी क्या गति होगी ?

24लोग मुझे कहते हैं कि जब मैं बनारस छोड़ गया तो मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई ?॥ १॥ रहाउ॥

25मैंने अपनी समस्त आयु शिवपुरी (काशी) में गंवा दी है।

26मृत्यु के समय (काशी) छोड़कर मगहर चला आया हूँ॥ २॥

27मैंने कई वर्ष काशी में रहकर तप किया।

28अब जब मृत्यु का समय आया तो मगहर आकर निवास कर लिया है॥ ३॥

29मैंने काशी और मगहर को एक समान समझ लिया है,

30आोच्छी भक्ति से कोई किस प्रकार भवसागर से पार हो सकता है ?॥ ४॥

31हे कबीर ! मेरा गुरु (रामानंद), गणेश एवं भगवान शिव सभी जानते हैं कि

32कबीर श्री राम के नाम का जाप करता हुआ मर गया ॥ ५॥ १५॥

33गउड़ी कबीर जी ॥

34जिस सुन्दर शरीर के अंगों पर इत्र एवं चन्दन मला जाता है,

35वह आखिरकार लकड़ियों से जला दिया जाता है॥ १॥

36इस शरीर एवं धन पर क्या अभिमान करना हुआ ?

37ये यहाँ पृथ्वी पर पड़े रह जाते हैं और प्राणी के साथ परलोक को नहीं जाते ॥ १॥ रहाउ ॥

38जो व्यक्ति रात सोने में बिता देते हैं और दिन में काम करते हैं

39और एक क्षणमात्र भी भगवान का नाम याद नहीं करते॥ २॥

40जिनके हाथ में डोर है और मुख में पान चबा रहे हैं,

41ऐसे व्यक्ति मृत्यु के समय चोरों की भाँति कसकर बाँधे जाते हैं।॥ ३॥

42जो इन्सान गुरु की मति लेकर प्रेमपूर्वक भगवान के गुण गाता है,

43वह केवल प्रभु-परमेश्वर को ही याद करके सुख हासिल करता है॥ ४॥

44जिस व्यक्ति के भीतर कृपा धारण करके प्रभु अपना नाम बसा देता है,

45वह हरि-परमेश्वर की महक एवं सुगन्ध को अपने हृदय में बसा लेता है॥ ५॥

46कबीर जी कहते हैं कि हे मूर्ख जीव ! (अपने परमेश्वर को) याद कर,

47चूंकि राम ही सत्य है और दुनिया के शेष धन्धे क्षणभंगुर हैं। ६॥ १६॥

48गउड़ी कबीर जी तिपदे चारतुके ॥

49यम (मृत्यु) की तरफ जाने की बजाय अब मैंने राम का पक्ष ले लिया है।

50जिससे मेरे दुःख मिट गए हैं और मैं सुखपूर्वक विश्राम करता हूँ।

51मेरे शत्रु भी बदलकर मेरे मित्र बन गए हैं।

52भगवान से टूटे हुए शाक्त पुरुष बदलकर भद्रपुरुष बन गए हैं।॥ १॥

53अब मुझे समस्त सुख एवं मंगल प्रतीत हो रहे हैं,

54जब से मैंने गोविन्द को अनुभव किया है, मेरे भीतर सुख-शांति हो गई है॥ १॥ रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं