गुरु ग्रंथ साहिब 324 · Raag Gauree · Bhagat Kabeer Ji
1हे मेरे मालिक ! तू सतिगुरु है और मैं तेरा नया चेला हूँ।
2कबीर जी कहते हैं - हे प्रभु ! अब तो जीवन के अन्तिम क्षण हैं, अपने दर्शन प्रदान कीजिए॥ ४॥ २ ॥
3गउड़ी कबीर जी ॥
4जब मैंने यह जान लिया है कि एक ईश्वर ही सर्वव्यापक है
5तो लोगों को इस बात का क्यों दुख अनुभव होता है।॥ १॥
6मैं अपमानित हूँ और मैंने अपनी इज्जत गंवा दी है।
7इसलिए मेरे पीछे कोई न लगे ॥ १॥ रहाउ ॥
8यदि मैं बुरा हूँ तो चित्त में ही बुरा हूँ।
9मैंने किसी के साथ भी साझ (मेल मिलाप) नहीं रखी ॥ २ ॥
10मान एवं अपमान की मुझे कोई शर्म नहीं परन्तु
11आपको तब पता लगेगा, जब आपका पर्दाफाश होगा ॥ ३॥
12कबीर जी कहते हैं - मान-प्रतिष्ठा उसी की है, जिसे ईश्वर स्वीकृत करता है।
13इसलिए सब कुछ त्यागकर केवल राम का भजन करो ॥ ४॥ ३॥
14गउड़ी कबीर जी ॥
15यदि नग्न घूमने से ईश्वर से मिलन हो सकता है
16तो वन के सभी मृग मुक्त हो जाने चाहिएँ॥ १॥
17तब तक तेरा नग्न रहने से क्या बनेगा तथा शरीर पर (मृग की) खाल लपेटने से क्या मेिलना है?
18(हे जीव !) जब तक तुम राम को याद नहीं करते, ॥ १॥ रहाउ॥
19यदि सिर मुंडाने से सिद्धि मिल सकती है तो
20कोई भी भेड़ अब तक मुक्त क्यों नहीं हुई?॥ २॥
21हे भाई ! यदि ब्रह्मचारी बनने से भवसागर से पार हुआ जा सकता है तो
22हिजड़े को क्यों परमगति नहीं मिली ? ॥ ३॥
23कबीर जी कहते हैं- हे मेरे मानव भाईयो ! ध्यानपूर्वक सुनो,
24राम नाम के बिना किसी को मुक्ति नहीं मिली है। ४॥ ४॥
25गउड़ी कबीर जी ॥
26जो व्यक्ति प्रातः काल एवं सायंकाल के समय स्नान ही करते हैं
27तथा सोचते हैं कि हम पावन हो गए हैं, वे ऐसे हैं जैसे जल में मेंढक रहते हैं।॥ १॥
28यदि उनके मन में राम के नाम का प्रेम नहीं है तो
29वह सभी अपने कर्मो का हिसाब देने हेतु धर्मराज के वश में पड़ते हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
30जो व्यक्ति अपनी काया से प्रेम करते हैं और अनेक रूप धारण करते हैं,
31वे कभी स्वप्न में भी दया अनुभव नहीं करते॥ २॥
32अनेकों बुद्धिमान लोग एवं चार चरण (सत्य, तप, दया एवं दान) भी यहीं कहते हैं
33कि संतजन ही वास्तव में संसार-सागर में सुख पाते हैं।
34हे कबीर ! हम इतने संस्कार क्यों करें ?
35शेष सब कुछ छोड़कर केवल नाम के महारस का पान कीजिए॥ ४॥ ५॥
36कबीर जी गउड़ी ॥
37उसका जप, तपस्या, व्रत एवं पूजा करने का कोई अभिप्राय नहीं
38जिस व्यक्ति के हृदय में ईश्वर के सिवाय किसी दूसरे का प्रेम है ॥ १॥
39हे भाई ! मन को भगवान के साथ लगाना चाहिए।
40किसी चतुराई से चतुर्भुज प्रभु प्राप्त नहीं होता। रहाउ॥
41(हे भाई !) लोभ एवं लोकाचार,
42काम, क्रोध एवं अहंकार को त्याग दो॥ २॥
43कर्मकाण्ड करने से मनुष्य अहंकार में फँस जाता है।
44ऐसे मनुष्य मिलकर पत्थर की ही पूजा करते हैं।॥ ३॥
45हे कबीर ! भक्ति करने से ही भगवान मिल सकता है।
46भोलेपन से ही रघुराम मिलता है॥ ४॥ ६॥
47गउड़ी कबीर जी ॥
48माँ के गर्भ में प्राणी को यह पता नहीं होता कि मैं किस कुल एवं जाति का हूँ
49प्रभु के अंश से ही समस्त जीव-जन्तु उत्पन्न हुए हैं। ॥ १॥
50हे पण्डित ! कहो, तुम ब्राह्मण कब से बन चुके हो ?
51अपने आपको ब्राह्मण कह-कहकर अपना अनमोल जीवन बर्बाद मत कर ॥ १॥ रहाउ॥
52यदि (हे पण्डित !) तुम सचमुच ब्राह्मण हो और तुमने ब्राह्मणी माता के गर्भ से जन्म लिया है
53तो किसी दूसरे मार्ग द्वारा क्यों नहीं उत्पन्न हुए ? ॥ २॥
54(हे पण्डित !) तुम ब्राह्मण कैसे हो ? और हम किस तरह शूद्र हैं?
55हमारे शरीर में कैसे रक्त ही है? तुम्हारे शरीर में किस प्रकार (रक्त के स्थान पर) दूध है ? ॥ ३॥
56हे कबीर ! जो ब्रहा का चिंतन करता है
57हम केवल उसी को ब्राह्मण कहते हैं ॥ ४ ॥ ७ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं