गुरु ग्रंथ साहिब 323 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! ऐसे अनन्त परमात्मा का चिन्तन कर, जो अपने साथ लगाकर तुझे (संसार सागर से) पार कर देगा ॥ १६॥
2श्लोक महला ५॥
3दुनिया के ऐसे धन्धे नुक्सानदायक हैं, जिनके कारण एक ईश्वर चित्त में नहीं आता।
4हे नानक ! वे शरीर विकारों से नाश हो जाते हैं, जिन्हें जगत् का मालिक परमात्मा भूल जाता है॥ १॥
5महला ५॥
6उस सृष्टि के रचयिता प्रभु ने प्रेत से देवता बना दिया है।
7ईश्वर ने गुरु के समस्त सिक्खों का उद्धार कर दिया है और उनके कार्य संवार दिए हैं।
8झूठे निंदकों को पकड़कर ईश्वर ने धरती पर पटका कर मारा है और अपने दरबार में उनको झूठा घोषित कर दिया है।
9नानक का प्रभु महान है। वह स्वयं ही इन्सान को पैदा करता है और संवारता है॥ २ ॥
10पउड़ी ॥
11प्रभु अनन्त है, उसका कोई अन्त नहीं जाना जा सकता, सब कुछ वही करता है, उसने ही यह सृष्टि बनाई है।
12अगम्य एवं अगोचर प्रभु समस्त जीवों का आधार है।
13अपना हाथ देकर वह सबकी रक्षा करता है। वह सब जीवों का भरण-पोषण करता है।
14वह स्वयं मेहरबान एवं क्षमाशील है। उस सच्चे मालिक का जाप करने से प्राणी (भवसागर) से पार हो जाता है।
15नानक का कथन है, हे प्रभु! जो कुछ तुझे उपयुक्त लगता है, केवल वही भला है, हम प्राणी तेरी शरण में हैं।॥ २० ॥
16श्लोक महला ५॥
17जिस व्यक्ति का सहारा वह परमात्मा आप है, उसे कोई भूख नहीं रहती।
18हे नानक ! भगवान के चरणों में लगने से प्रत्येक प्राणी का उद्धार हो जाता है॥ १॥
19महला ५ ॥
20जो पुरुष याचक बनकर प्रभु-परमेश्वर से नाम की देन माँगता है, उसकी प्रार्थना वह स्वीकार कर लेता है।
21हे नानक ! जिस पुरुष का यजमान (स्वयं) परमात्मा है, उसे थोड़ी-सी भी भूख नहीं रहती ॥ २॥
22पउड़ी।
23जिस व्यक्ति का मन गोविन्द के साथ मग्न हो जाता है, उसके लिए उसका नाम ही उत्तम भोजन एवं पहरावा बन जाता है।
24हरि के नाम के साथ उसका प्रेम बन जाता है, यही उसके लिए हाथी एवं घोड़े हैं।
25उसके लिए तो सहर्ष भगवान के नाम का ध्यान ही राज्य, सम्पति एवं अनन्त प्रसन्नता होती है।
26ढाढी ने ईश्वर के द्वार की ही याचना करनी है, जो उसने कभी नहीं त्यागना।
27हे नानक ! उसके मन एवं शरीर में सदैव उमंग बनी रहती है, तथा वह हमेशा ईश्वर से मिलन की ही अभिलाषा करता है॥ २१॥ १॥
28रागु गउड़ी भगतां की बाणी
29ੴ सतिनामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
30गउड़ी गुआरेरी श्री कबीर जीउ के चउपदे १४ ॥
31अब मुझ तृष्णा में जल रहेको राम नाम रूपी अमृत (जल) मिल गया है।
32राम नाम रूपी अमृत (जल) ने मेरे जलते शरीर को शीतल कर दिया है॥ १॥ रहाउ॥
33कुछ लोग अपने मन को वश में करने के लिए वनों में जाते हैं
34परन्तु तृष्णाग्नि को बुझाने हेतु नाम रूपी अमृत (जल) भगवान के बिना नहीं मिलता ॥ १॥
35जिस तृष्णा की अग्नि ने देवते एवं मनुष्य जला दिए हैं,
36राम नाम रूपी अमृत ने भक्तों को उस तृष्णाग्नि से बचा लिया है॥ २॥
37भवसागर में ही एक सुखों का सागर है।
38मैं नाम रूपी अमृत पान करता जाता हूँ परन्तु अमृत समाप्त नहीं होता॥ ३॥
39कबीर जी कहते हैं - उस भगवान का ही भजन करो चूंकि
40राम नाम रूपी अमृत ने मेरी तृष्णा मिटा दी है॥ ४॥ १॥
41गउड़ी कबीर जी ॥
42हे माधव ! तेरे नाम रूपी अमृत के लिए मेरी प्यास नहीं मिटती।
43तेरा नाम-अमृत पान करते हुए तीव्र लालसा उत्पन्न हो रही है॥ १॥ रहाउ॥
44हे ईश्वर ! तू जल की निधि है और मैं उस जल की एक मछली हूँ।
45मैं (मछली) जल में ही रहती हूँ और जल के बिना नाश हो जाती हूँ॥ १॥
46हे भगवान ! तू मेरा पिंजरा है और मैं तेरा तोता हूँ,
47यम-रूपी विडाल मेरा क्या बिगाड़ सकता है ? ॥ २॥
48हे प्रभु ! तू सुन्दर वृक्ष है और मैं एक पक्षी हूँ।
49(मुझ) भाग्यहीन को अब तक तेरे दर्शन नहीं हुए॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं