सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 322 · Raag Gauree · Guru Arjan Dev Ji

1निर्वाण अवस्था वाली जीवन पदवी पाने के लिए एक पवित्र प्रभु की आराधना करो।

2दूसरा कोई स्थान नहीं, (क्योंकि) किसी दूसरे से हमारी कैसे संतुष्टि हो सकती है?

3मैंने सारा संसार देख लिया है, ईश्वर के नाम के अलावा कोई सुख नहीं।

4यह तन एवं धन नष्ट हो जाएँगे परन्तु कोई विरला पुरुष ही इसे समझता है।

5हे नश्वर प्राणी ! तुम क्या कर रहे हो ? रंग-रूप एवं रस सब व्यर्थ हैं।

6(परन्तु प्राणी के भी क्या वश ?) ईश्वर जिस पुरुष को स्वयं कुमार्गगामी करता है, वह उसकी शक्ति को नहीं समझता।

7जो मनुष्य पवित्र प्रभु के प्रेम में मग्न रहते हैं, वे सत्यनाम का गायन करते हैं।

8नानक का कथन है कि हे प्रभु ! जो भी जीव तुझे अच्छे लगते हैं, वे तेरे द्वार पर शरण हेतु आ जाते हैं।॥ २॥

9पउड़ी॥

10जो व्यक्ति ईश्वर का सहारा लेते हैं, उनका जन्म-मरण का चक्र मिट जाता है।

11जो ईश्वर के भजन कीर्तन में सचेत रहते हैं, वे इस जीवन में सत्कृत हो जाते हैं।

12जिन लोगों को संतों की संगति प्राप्त होती है, वे बड़े भाग्यवान हैं।

13परन्तु यदि परमेश्वर का नाम भूल जाए तो यह जीवन धिक्कार योग्य है तथा यह कच्चे धागे की भाँति टूट जाता है।

14हे नानक ! संतों की चरण-धूलि लाखों-करोड़ों प्रयागराज इत्यादि तीर्थो से अधिक पावन है॥ १६॥

15श्लोक महला ५ ॥

16जिस हृदय में हरि-परमेश्वर के प्रेम का निवास है, वह हृदय ऐसा है जैसे ओस-मोतियों से जड़ित घास वाली धरती सुन्दर रंग वाली हो जाती है।

17हे नानक ! जिस पुरुष पर गुरु नानक प्रसन्न हो जाता है, उसके तमाम कार्य सहज ही (सफल) हो जाते हैं॥ १ ॥

18महला ५॥

19दसों दिशाओं में नदियों, पर्वतों एवं जंगलों पर

20उड़ती-उड़ती चील ने जहाँ शव देखा वहीं आ बैठी ॥ २ ॥

21पउड़ी ॥

22मैं उस सत्य के पुंज ईश्वर का चिन्तन करूँ, जिससे सर्व सुख एवं फल माँगे जाते हैं।

23उस पारब्रह्म को अपने साथ-साथ ही देखें और उसके नाम का ध्यान करता रहूँ।

24मैं सबकी चरण-धूलि होकर उस ईश्वर में समा जाऊँ।

25मैं किसी भी प्राणी को दुःख न दूँ और प्रतिष्ठा से अपने वास्तविक घर में जाऊँ।

26हे नानक ! मैं दूसरों को भी सुनाता हूँ कि विश्व का रचयिता परमात्मा पतित जीवों को भी पवित्र करने वाला है॥ १७ ॥

27श्लोक दोहा महला ५॥

28मैंने उस एक ईश्वर को अपना साजन बनाया है जो सर्वकला सम्पूर्ण है।

29मेरी आत्मा उस पर न्यौछायर है और वह परमेश्वर ही मेरे मन एवं तन की यथार्थ दौलत है॥ १॥

30महला ५॥

31हे मेरे प्रियतम ! यदि तू मेरा हाथ थाम ले तो मैं तुझे कभी भी छोड़ नहीं सकूंगा।

32जो मनुष्य ईश्वर को त्याग देते हैं, ऐसे दुर्जन इन्सान नरक की असहनीय पीड़ा में पड़ते हैं।॥ २॥

33पउड़ी॥

34सारे खजाने उस ईश्वर के घर में हैं। परमात्मा जो कुछ करता है, वही होता है।

35संतजन उसका भजन-सिमरन करके जीते हैं, और वह उनके पापों की तमाम मैल स्वच्छ कर देता है।

36ईश्वर के चरण-कमल हृदय में बसाने से तमाम संकट दूर हो जाते हैं।

37जो मनुष्य पूर्ण गुरु से साक्षात्कार करता है, वह जन्म-मरण के चक्र में विलाप नहीं करता।

38नानकं को भी प्रभु के दर्शनों की तीव्र लालसा है लेकिन अपनी कृपा-दृष्टि से ही वह दर्शनों की देन प्रदान करता है॥ १८॥

39श्लोक डखणा महला ५॥

40यदि तू थोड़ा-सा भी भ्रम दूर कर दे और अपने प्रियतम (परमात्मा) के साथ मुहब्बत करे

41तो जहाँ कहीं भी जाओगे, वहाँ ईश्वर तुझे मौजूद दिखेगा ॥ १॥

42महला ५ ॥

43जो व्यक्ति साधारण खेल खेलना जानते हों (लेकिन) सुन्दर घोड़े पर सवार होकर बन्दूक के हत्थे पकड़ते हों

44(उन्हें ऐसा समझो कि) उड़ान तो मुर्गे की उड़ना जानते हों और हंसों के साथ उड़ने के लिए मन को उत्साह देते हों ॥ २ ॥

45पउड़ी॥

46हे मित्र ! जो व्यक्ति अपनी रसना से भगवान के नाम का उच्चारण करता है और कानों से सुनता है, ऐसे व्यक्ति का उद्धार हो जाता है।

47जो हाथ श्रद्धा से भगवान का यश लिखते हैं, वे बड़े पवित्र हैं।

48ऐसा पुरुष अठसठ तीर्थों के स्नान का फल पा लेता है और यह मान लिया जाता है कि उसने पुण्यकर्म कर लिए हैं।

49वह संसार-सागर से पार हो जाता है और माया रूपी विकारों के किले को विजय कर लेता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं