सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 31 · Siree Raag

1श्रीरागु महला ३ ॥

2जो स्वेच्छाचारी जीव नाम-अमृत को छोड़ कर विषय-विकार रूपी विष में मोहित हैं, सत्य वाहिगुरु के अतिरिक्त अन्य कोई पार्थिव पूजा करते हैं।

3वे मायातीत होकर अपने मूल कर्त्तव्य से विमुख हो रहे हैं और अपने मानव-जन्म का तात्पर्य नहीं समझते तथा अपनी आयु नित्य ही दुखों में व्यतीत करते हैं।

4ऐसे जीव अज्ञानी होकर उस परमात्मा को स्मरण नहीं करते और वे माया में ग्रसे हुए विषय रूपी सागर में बिना जल के ही डूब कर मर रहे हैं।॥ १॥

5हे जीव ! गुरु की शरण में रह कर हरि-प्रभु का चिन्तन करो।

6जब गुरु का उपदेश अंतर्मन में प्रविष्ट हो जाता है तो फिर कभी हरि-प्रभु भूल नहीं पाता॥ १॥ रहाउ॥

7जीव के माया निर्मित तन में अहंकार रूपी विकार भरा हुआ है।

8इसलिए जीव स्वेच्छाचारी होकर जन्म-मरण के चक्र में फंस कर परमात्मा समक्ष अपनी प्रतिष्ठा को गंवा रहा है।

9सतिगुरु की सेवा करने से सदैव सुख की प्राप्ति होती है और आत्म-ज्योति का परमात्म-ज्योति से मिलन हो जाता है ॥ २॥

10सतिगुरु की सेवा अति सुखदायी है, जिससे मनवांछित फल प्राप्त होता है।

11सतिगुरु की सेवा के परिणाम स्वरूप संयम, सत्य व तप प्राप्त होते हैं और तन पवित्र हो जाता है तथा जीव हरि-नाम को हदय में धारण कर लेता है।

12हरि-प्रभु से मिलन होने पर जीव आत्मिक सुख अनुभव करता है और प्रायः रात-दिन आनंद में रहता है॥ ३॥

13जो जीव सतिगुरु की शरण में आए हैं, मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ।

14उस सत्य-स्वरूप परमात्मा की सभा में सत्य को ही सम्मान प्राप्त होता है, ऐसा जीव सहज ही उस सत्य में समा जाता है।

15नानक देव जी कथन करते हैं कि परमात्मा से मिलाप तो केवल अकाल-पुरुष की कृपा-दृष्टि एवं गुरु-उपदेश द्वारा ही संभव है॥ ४॥ १२॥ ४५ ॥

16श्रीरागु महला ३ ॥

17स्वेच्छाचारी जीव के लिए सद्कर्म इस प्रकार व्यर्थ होते हैं, जैसे किसी दुहागिन स्त्री के तन पर किया हुआ श्रृंगार व्यर्थ है।

18क्योंकि उसकी शय्या पर उसका स्वामी तो आता नहीं और वह नित्य ही ऐसा करके अपमानित होती है।

19अर्थात्-स्वेच्छाचारी जीव द्वारा नाम-सिमरन रूपी सद्कर्म न करने पर परमात्मा उसके समीप नहीं आता और वह पति-परमात्मा का स्वरूप प्राप्त नहीं करता, क्योंकि उसे परमात्मा का घर-द्वार दिखाई ही नहीं देता ॥ १॥

20हे भाई ! एकाग्र मन होकर नाम-सिमरन करो।

21संतों की संगति में मिल कर रहो, उस सत्संगति में नाम-स्मरण करने से आत्मिक सुख की प्राप्ति होगी॥ १॥ रहाउ॥

22गुरुमुख जीव सदा सुहागिन स्त्री की भाँति होता है, क्योंकि उसने पति-परमात्मा को अपने हृदय में धारण करके रखा होता है।

23उसके बोल मीठे होते हैं और उसका स्वभाव विनम्र होता है, उसी कारण उस हृदय रूपी शय्या पर पति-परमात्मा का रमण प्राप्त होता है।

24जिनको गुरु का अनंत प्रेम प्राप्त हुआ है, वह गुरुमुख जीव सुहागिन व शोभा वाली स्त्री के समान है॥ २॥

25सद्कर्मो के कारण जीव का जब भाग्योदय होता है तभी उसे सौभाग्य से सतिगुरु की प्राप्ति होती है।

26गुरु के मिलाप द्वारा अंतर्मन से दुख देने वाला अहम् दूर हो जाता है तथा आत्मिक सुख प्राप्त होता है।

27जो जीव गुरु की आज्ञानुसार व्यवहार करता है, उसके जीवन में कभी कोई कष्ट नहीं आता ॥ ३॥

28गुरु की आज्ञा में नाम-अमृत होता है, उस नाम-अमृत को ज्ञान द्वारा ही पाया जा सकता है।

29जिस जीव ने हृदय में से अहंत्व का त्याग किया है, उसी ने गुरु द्वारा नाम अमृत प्राप्त करके उसका पान किया है।

30नानक देव जी कथन करते हैं कि जो जीव गुरुमुख होकर नाम-सिमरन करते हैं, उनका सत्य-स्वरूप परमेश्वर से मिलन होता है ॥४॥१३॥४६॥

31श्रीरागु महला ३ ॥

32जब जीव रूपी स्त्री परमात्मा को अपना पति मानती है तो वह अपना सर्वस्व उसको अर्पण कर देती है।

33फिर जो कर्म सुहागिर्ने करती हैं, वही कर्म तुम भी करो।

34इससे स्वाभाविक ही सत्य स्वरूप परमात्मा रूपी पति से मिलाप होगा और वह परमात्मा-पति तुझे सत्य प्रतिष्ठा प्रदान करेगा ॥ १॥

35हे जीव ! परमात्मा का चिन्तन गुरु के बिना नहीं हो सकता।

36बेशक प्रत्येक जीव उस परमात्मा को पाने की कामना करे, किन्तु गुरु के बिना उस परमात्मा की भक्ति प्राप्त नहीं होती ॥ १॥ रहाउ॥

37जीव रूपी स्त्री द्वैत-भाव में फँस कर चौरासी लाख योनियों के चक्र में भटकती है।

38गुरु उपदेश के बिना उसे शांति नहीं मिलती और वह दुखों में ही जीवन रूपी रात व्यतीत करती है।

39गुरु के शब्द बिना वह पति-परमात्मा को प्राप्त नहीं कर पाती और वह अपना जन्म यूं ही व्यर्थ गंवा देती है॥ २॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं